किसान मज़दूर विरोधी भूमि अध्यादेश 2015 का विरोध- जंतर मंतर पर जलेंगी प्रतियां
किसान मज़दूर विरोधी भूमि अध्यादेश 2015 का विरोध- जंतर मंतर पर जलेंगी प्रतियां
किसान मज़दूर विरोधी भूमि अध्यादेश 2015 का विरोध
नई दिल्ली। तमाम विरोधों के बावजूद क़रपोरेट घरानों की खिदमत की अपनी नीति पर कायम रहते हुए मोदी सरकार ने दोबारा भूमि अधिग्रहण अध्यादेश 3 अप्रैल को लाया है।
कई राजनीतिक दलों व जनसंगठनों ने इस अध्यादेश को किसान - मज़दूर विरोधी बताते हुए आगामी 6 अप्रैल को इसके विरोध में आंदोलन का ऐलान करते हुए और अध्यादेश की प्रतियां जलाने की घोषणा की है।
दिल्ली फोरम के संयोजक संजीव कुमार ने एक वक्तव्य में कहा है कि देश के कई किसान - मज़दूर संगठनों, जन आंदोलनों ने मिलकर देशव्यापी "भूमि अधिकार आंदोलन" शुरू किया है और इसके तहत पूरे देश में अध्यादेश के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेंगे। इसी कड़ी में सोमवार, अप्रैल 6 को 4 बजे जंतर मंतर,दिल्ली पर किसान और मज़दूर विरोध प्रदर्शन करेंगे और अध्यादेश की प्रतियां जलाएंगे। उन्होंने कहा कि 1894 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अंतर्गत जबरन, अनुचित और अन्यायपूर्ण तरीके से जमीन अधिग्रहण के अनुभवों के आधार पर, विविध जन आंदोलनों के लम्बे संघर्ष के बाद भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 में समुचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार संसद द्वारा अधिनियमित किया गया था। एक दशक तक चले अभूतपूर्व देशव्यापी परामर्श, संसद में और बीजेपी के नेतृत्व वाली दो स्थायी समितियों में बड़े पैमाने पर बहस के बाद ही 2013 का यह भूमि अधिग्रहण अधिनियम बना, उस वक्त वर्तमान लोकसभा अध्यक्ष और स्थायी समिति की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के साथ बीजेपी तहेदिल से अधिनियम के समर्थन में थी,और खुलकर इस कानून के प्रावधानों का समर्थन कर रही थी. और अब एक झटके में लोकतान्त्रिक ढांचे को अनदेखा करके, 2013 के अधिनियम के सभी लाभों को खत्म करते हुए, 1894 के कानून पर वापस आने वाला एक अध्यादेश मोदी सरकार ले आई है. इससे, मोदी सरकार लोगों के हितों की पूरी अनदेखी करते हुए, किसी भी कीमत पर कॉर्पोरेट के हितों का विस्तार करने के अपने संकल्प की पुष्टि ही की है, और साथ ही इसमें इस बात का संकेत भी मिलता है कि मौजूदा कॉर्पोरेट-सरकार संबंधों में किसी भी तरह के पारम्परिक लोकतान्त्रिक और भारतीय संविधान के ढांचे के मूल्यों से परेशान नहीं किया जायेगा।
उन्होंने कहा कि 2015 का भूमि अध्यादेश पूरी तरह से, समुचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013, का और अन्यायपूर्ण भूमि अधिग्रहण के खिलाफ सालों के संघर्ष का मजाक बना रहा है।


