रामेंद्र जनवार
अखिलेश यादव ने मुजफ्फरनगर में कहा है कि शुगर मिल चाहे कितने भी घाटे में हों गन्ना किसानों की पाई-पाई चुकाएँगे....
इस वक्तव्य का सीधा सन्देश तो यह है मुख्यमंत्री को मिलमालिकों के घाटे की पहले चिन्ता है और भूख से लड़ रहे किसान की उसके बाद.... वह भी दिखावे के तौर पर क्योंकि चुनाव सर पर हैं और गद्दी सरकती हुई दिखाई दे रही है तब...

शर्म तो बेच खाई लगती है इन धन्नासेठों से थैलियाँ वसूलने वाले नेताओं ने।
अरे किसान ने अपनी हाड़तोड़ मेहनत से गन्ना पैदा किया है और उसे मिल तक पहुँचाया है। उसका भुगतान तो उसे गन्ना आपूर्ति करते ही तुरन्त मिलना चाहिए था, लेकिन किसान मर रहा है और उनको मिलमालिकों का घाटा पहले दिखाई देता है।

मुसलमानों के वोट पर अपनी राजनीति की रोटियाँ सेंक रहे हो और बड़े पैमाने पर गन्ना उत्पादन कर रहे मुस्लिम किसान इस बार ईद तक नहीं मना सके, लेकिन आपको मिलमालिकों का घाटा पहले दिखाई दे रहा है।

पाँच साल में आप एक नया पैसा बढ़ाना तो दूर, पूरा भुगतान तक तो करा नहीं सके
याद कीजिए मायावती के पिछले कार्यकाल के अन्त में जब किसान गन्ने की शवयात्राएँ निकालने लगा था, आत्महत्याएँ करने लगा था, तब आपके पूज्य पिताजी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में गन्ने का मूल्य 400 ₨ प्रति क्विन्टल करने की घोषणा की थी। दस्तावेजी सबूत है अपना ही पिछला चुनावी घोषणापत्र 2012 का उठाकर देख लीजिए। याद आ जाएगा टीपू जी।
पाँच साल में आप एक नया पैसा बढ़ाना तो दूर, पूरा भुगतान तक तो करा नहीं सके और अब कह रहे हैं पाई-पाई चुकाएँगे.....कब ? आखिर कब...?? बेहतर यही है कि बोरिया बिस्तर लपेट लीजिए और मिलमालिकों से मिली थैलियाँ भीतर करके निकलने की तैयारी कीजिए... आपकी और आपके पापा जी की हकीकत अब किसान तो अच्छी तरह जान चुके हैं.....
रामेंद्र जनवार की फेसबुक टाइमलाइन से साभार