यही तो लोकतंत्र की माया है । शायद इसीलिए किसी ने , शायद विंस्टन चर्चिल ने कहा था कि लोकतंत्र बहुत बुरा तंत्र है , पर इससे बेहतर कोई तंत्र हो तो बताइए । लोकतंत्र वह नहीं है जो किताबों में अब्राहम लिंकन के बहाने पढ़ाया जाता है । जनता का ,जनता के लिए और जनता से । यह भी लोकतंत्र का कमाल है कि अकसर यहां जनता सायकॅलॉजी का पी हो जाती है । सायलेंट – शांत । हम जैसे कलमघिस्सु , जाति – धर्म- नेता – पार्टी की मेहरबानी या बेवकूफी से निर्वाचित – मनोनीत जन प्रतिनिधि जनता की आवाज हो जाते हैं । मगर लोकतंत्र में कुछ कुछ होता है ।
कुछ कुछ होते हुए राडिया टेप भी हो जाता हैं । टेप का ऐसा खुलासा होता है कि लगता है कि ऐसा पहली बार हुआ है । कल तक जिस बात को सब जानते थे , अचानक वह खासम खास हो जाता है । आदतन लोकतंत्र कारज धीरे होत , काहे होत अधीर भी है । यह ‘धीरज – धरम – मित्र अरु नारी / आफत काल परखिए चारी ‘ भी है । उन पाठकों से माफी जिन्हें सही या हुबहू तुलसी वाणी याद है और उनसे भी जो नारी के नाम से कुछ कुछ करने लगते हैं । और कुछ नहीं तो हवा में चिल्लाने लगते हैं । बेचारी लोकतंत्र का इतना बलात्कार कर चुके होते हैं कि बलात्कार को भी कुछ कुछ होता है ।
यह कुछ कहां कहां नहीं होता है । यह मन्नू भाइ सोनियावाल को नहीं होता है ।