कुछ सोचना होगा और कुछ फैसले लेने होंगे पेशावर के बाद-बच्चों, सपनों, भविष्य और मानवता के हक़ में
कुछ सोचना होगा और कुछ फैसले लेने होंगे पेशावर के बाद-बच्चों, सपनों, भविष्य और मानवता के हक़ में
पेशावर की बर्बरता हमें गाज़ा और जाफना की ही नहीं, गुजरात की भी याद दिलाती है।
2014 का वर्ष पेशावर में 132 बच्चों के बर्बर सामूहिक संहार के साथ अवसान की ओर अग्रसर है। इस सदी के इतिहास में यह वर्ष पूरी दुनिया में बड़े पैमाने पर बच्चों की हत्या के लिए याद किया जायेगा। गाज़ा पर हमले के 50 दिनों के दौरान ज़ायनवादी फासिस्टों ने दो हज़ार से भी अधिक लोगों को मौत के घाट उतारा जिनमें 504 बच्चे थे। सीरिया और इराक में इस्लामिक स्टेट का ताण्डव अभी भी जारी है। अब तक हज़ारों परिवार उनकी बर्बरता के शिकार हो चुके हैं, सैकड़ों बच्चे मारे जा चुके हैं और हज़ारों अनाथ हो चुके हैं। मोसुल से लेकर कोबानी तक, और विशेषकर यज़ीदियों और कुर्दों के साथ, आई.एस. के आतंकियों ने जो बर्बरता दिखाई है, इतिहास में वैसी मिसालें बहुत कम मिलेंगी।
क्या ये महज़ कुछ पागल या धर्मान्ध लोग हैं, जो इस क़दर इंसानियत को शर्मसार करने पर तुले हुए हैं? क्या हम मध्यकालीन धर्मयुद्धों और नरसंहारों के युग में वापस पहुँच गये हैं? पेशावर की घटना के लिए धर्म और धर्मान्धता को जिम्मेदार ठहराने की प्रवृत्ति सोशल मीडिया में आम दीखती है। लेकिन प्रश्न इससे कहीं अधिक बुनियादी है। हमें लाक्षणिक परिघटना या आभासी प्रवृत्तियों की पड़ताल करके सारभूत यथार्थ तक पहुँचना होगा। प्रश्न यह है कि धार्मिक कट्टरपंथ और धार्मिक कट्टरपंथी आतंकवाद के नये फासिस्ट दानव के दुनिया के विभिन्न हिस्सों में प्रचण्ड उभार के मूल कारण क्या हैं? इसे समझने के बाद ही इससे निजात पाने के वास्तविक और व्यावहारिक रास्ते की सही समझदारी हासिल की जा सकती है।
सबसे पहले, इस आम ऐतिहासिक सच्चाई को समझने की ज़रूरत है कि जब कभी भी इतिहास की प्रगति रुक जाती है तो प्रतिक्रिया की अंधी शक्तियाँ पूरे सामाजिक-राजनीतिक जीवन पर हावी हो जाती हैं। विपर्यय के अँधेरे में पुनरुत्थान की प्रेरक शक्तियाँ लोगों को पीछे की ओर लौटने का विकल्प सुझाती हैं, लोग विज्ञान की ओर पीठ कर लेते हैं और उनका मुँह स्वत: धर्म और अन्धविश्वास की ओर हो जाता है। तब शासक पूँजीपति वर्ग के लिए आसान हो जाता है कि वह तरह-तरह से धार्मिक कट्टरपंथ की राजनीति को हवा देकर अपना उल्लू सीधा कर सके तथा धार्मिक आधार पर जनता को बाँटने की कोशिश को अंजाम देता रहे। एक या दूसरे किस्म का धार्मिक कट्टरपंथ जब साम्राज्यवाद या देशी पूँजीवाद के लिए ही भस्मासुर बन जाता है, तो फिर आतंकवाद-विरोधी युद्ध के नाम पर शासक वर्गों के आतंकवाद का दूसरा रूप सामने आता है और वह भी आम जनता को ही अपना निशाना बनाता है।
दूसरी बात, यूँ तो पूँजीवाद ने सामंतवाद से निर्णायक पराजय के बाद ही धर्म से "पवित्र गठबंधन" कर लिया था, लेकिन विशेषकर साम्राज्यवाद के दौर में तर्कणा और जनवाद से उसकी दूरी बढ़ती चली गयी और धर्म की राजनीति का वह ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने लगा। विश्व पूँजीवाद के असाध्य ढाँचागत संकट के इस दौर में बुर्जुआ जनवाद का सामाजिक स्पेस ज़्यादा से ज़्यादा संकुचित होता चला गया है और समाज में तरह-तरह की निरंकुश स्वेच्छाचारी प्रवृत्तियों के फलने-फूलने की मुफ़ीद ज़मीन तैयार हुई है। धार्मिक कट्टरता की चहुँमुखी बढ़ोत्तरी का यह एक अहम कारण है। जहाँ तक धर्म का सवाल है, पूँजीवादी समाज में इसने एक नया आधार प्राप्त किया है। हमारे जीवन को चलाने वाली माल-उत्पादन की अदृश्य सत्ता का विरूप प्रतिबिम्बन ईश्वर की अदृश्य सत्ता के रूप में होता है जो धार्मिक मिथ्याभासी चेतना का मूल आधार है। अत: धर्म के उन्मूलन का सवाल पूँजीवाद के उन्मूलन के साथ जुड़ा हुआ है और धर्म-विरोधी भौतिकवादी विश्वदृष्टिकोण का प्रचार एक दीर्घकालिक विचारधारात्मक कार्यभार है। धार्मिक कट्टरपंथ एक दीगर मुद्दा है। यह जनता की वर्गीय एकजुटता को तोड़ता है और उसके जनवादी अधिकारों पर चोट करता है। इसलिए हमारा फौरी राजनीतिक-सामाजिक कार्यभार व्यापक जनता के बीच सेक्युलरिज्म की ज़मीन पर खड़े होकर धार्मिक कट्टरपंथ और पूँजी की शक्तियों के विरुद्ध मेहनतकश जनसमुदाय और मध्यवर्ग की व्यापक जुझारू एकजुटता कायम करने का बनता है। धर्म-विरोधी प्रचार एक विचारधारात्मक कार्यभार है और यह केवल समाज के उन्नत चेतना वाले संस्तर के बीच ही प्रभावी हो सकता है।
धार्मिक कट्टरपंथ और धार्मिक आतंकवाद-विरोधी मुहिम तभी कारगर हो सकती है, जब हम जनता को यह समझा सकें कि ये ताक़तें किस प्रकार देशी पूँजीवाद की और साम्राज्यवाद की सेवा करती हैं। भारत में हिन्दुत्ववाद की समूची असलियत जनता के सामने तभी उजागर की जा सकती है जब हम लोगों को यह समझा पाने में सफल हों कि हिन्दुत्ववादी किस प्रकार देशी पूँजीपतियों और साम्राज्यवादियों की सेवा करते हैं और नवउदारवादी नीतियों के प्रति बेहद कट्टरता के साथ वफ़ादार हैं। इसी प्रकार, वहाबी, सलाफ़ी या तकफ़ीरी ब्राण्ड इस्लामी कट्टरपंथ एवं आतंकवाद की कलई तभी उघाड़ी जा सकती है जब इस सच्चाई को सामने लाया जाये कि इनको पैदा करने और बढ़ावा देने में हर जगह निरपवाद रूप से साम्राज्यवाद की अहम भूमिका रही है। अफ़गानिस्तान से लेकर मध्यपूर्व तक मुजाहिदीन, तालिबान, लश्करे-तैयबा, अल क़ायदा, आईएसआईएस, बोको हरम, अल शबाब आदि-आदि — इन सभी को कभी-न-कभी अमेरिका और पश्चिमी साम्राज्यवादी ताक़तों ने ही पालने-पोसने और बढ़ावा देने का काम किया। जब साम्राज्यवाद के लिए इनकी भूमिका समाप्त हो जाती है और अपना स्वतंत्र समर्थन आधार और महत्वाकांक्षाएं पैदा हो जाने के बाद ये ताक़तें साम्राज्यवाद के लिए भस्मासुर बन जाती हैं तो साम्राज्यवादी दरिन्दे शान्ति का मसीहा बनकर "आतंकवाद-विरोधी युद्ध" के नाम पर पिछड़े देशों में पैठ बनाने और उनकी प्राकृतिक संपदा लूटने का बहाना ढूंढ़ लेते हैं। दोनों ही सूरतों में शिकार जनता ही होती है। इसलिए, पेशावर जैसी हैवानियत की भर्त्सना करते हुए यदि हम केवल धार्मिक कट्टरता को कोसते हैं और साम्राज्यवाद के खूनी कुचक्रों की निशानदेही नहीं कर पाते, तो असली गुनहगार की शिनाख्त नहीं हो पाती है। यदि ऐसी बर्बरता के लिए धर्म को ही दोषी ठहरा दिया जाता है, तो धर्म को धार्मिक कट्टरता में तब्दील करके इस्तेमाल करने वाली साम्राज्यवादी शक्तियाँ और पूँजीवादी सत्ताएँ, जो असली अपराधी हैं, जनता की निगाह में नहीं आ पातीं। धार्मिक कट्टरपंथी तो संगठित फासिस्ट गिरोह हैं, जिनके असली गॉडफ़ादर या तो साम्राज्यवादी हैं, या फिर देशी पूँजीपति शासक वर्ग हैं या फिर दोनों ही हैं।
पेशावर की बर्बरता, गाज़ा में ज़ायनवादी बर्बरता, मध्यपूर्व में आईएस की बर्बरता, अफ़गानिस्तान में मुजाहिदीनी और तालिबानी बर्बरता, और अफ्रीका में बोको हरम की बर्बरता की ही अगली कड़ी है। इन सभी बर्बरताओं का असली जन्मदाता और संरक्षक कभी-न-कभी या तो अमेरिकी साम्राज्यवाद रहा है, या अभी भी है। लेकिन यही क्यों, श्रीलंका में लिट्टे के सफाये के नाम पर हज़ारों बच्चों और स्त्रियों तक का जो क़त्लेआम किया गया और जो ज़ुल्म ढाये गये, उन्हें क्या वहाँ की तमिल जनता कभी भूल सकती है? बंगलादेश और म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर भी ऐसे ही अमानुषिक अत्याचार होते रहे हैं। भारत में अकेले 2002 के गुजरात दंगों के दौरान ही न केवल सैकड़ों बच्चे क़त्ल कर दिये गये या ज़िन्दा आग में झोंक दिये गये, बल्कि गर्भस्थ शिशुओं तक को पेट फाड़कर बाहर निकालकर त्रिशूलों पर टाँगकर घुमाया गया था। पेशावर की बर्बरता हमें गाज़ा और जाफना की ही नहीं, गुजरात की भी याद दिलाती है। हिन्दुत्ववादी तालिबान पाकिस्तानी-अफ़गानी तालिबान से किसी भी मायने में कमतर नहीं हैं। धार्मिक कट्टरपंथी आतंकवाद आज पूरी दुनिया में विश्व पूँजीवाद द्वारा जनता के विरुद्ध लगातार बर्बर युद्ध चलाने का सर्वप्रमुख तरीका है। कहीं साम्राज्यवाद इसका सहारा लेकर पिछड़े देशों की जनता के विरुद्ध युद्ध छेड़ता है, तो कहीं देशी पूँजीपति वर्ग इसके ज़रिये अपनी ही जनता को निशाना बनाता है। धार्मिक कट्टरपंथ और आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष देशी-विदेशी पूँजी के वर्चस्व के विरुद्ध संघर्ष का एक अहम मोर्चा है।
मासूम बच्चों का क़त्लेआम इस ऐतिहासिक सच्चाई का एक क्रूर रूपक है कि अपने चरम मानवद्रोही रूप में पूँजी की शक्तियाँ हमारे भविष्य की हत्या कर रही हैं, हमारे सपनों का शिकार कर रही हैं। हमें यदि अपने बच्चों को बचाना है, अपने भविष्य को बचाना है, अपने सपनों को बचाना है, तो पलायन, निराशा, किंकर्तव्यविमूढ़ता, समझौतों, दुनियादारी और दुविधा की मन:स्थिति से उबरकर अँधेरे की शक्तियों के विरुद्ध फैसलाकुन लड़ाई में उतरने की तैयारी करनी ही होगी। हर ऐसी हृदयद्रावक घटना पर शोक प्रकट करने के बाद ज़िन्दगी में कुछ भी न बदलना, कोई भी बड़ा फ़ैसला न लेना, कुछ भी न करना और फिर यूँ ही पहले की तरह जीते चले जाना- यह यदि आदत बन जाये, तो धीरे-धीरे एक संवेदनशील व्यक्ति भी चालाक, बेरहम, नाटकीय व्यक्ति बन जाता है, या फिर एक कातर, दयनीय तुच्छ जीव।
O- कात्यायनी


