8 मई हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान में 'विज्ञान से ही सुलझेगी कृषि समस्या' शीर्षक के साथ वैज्ञानिक प्रो एस शांताराम का लेख प्रकाशित हुआ है। उस लेख में प्रो. ने देश के लोगों को 1980 में अपनाए गए हरित क्रान्ति से सबक लेकर अब जेनेटिक इंजीनिरिंग से देश की मौजूदा कृषि व खाद्यान्न समस्या से निपटने की सलाह दी है। साथ ही देश में जी एम बीजों एवं उसके प्रयोगों को लेकर होते रहे विरोधों को उपेक्षित करने का भी सलाह भी दिया है। उन्होंने कहा है कि "पर्यावरण के बदलाव, तथा संसाधनों में होती जा रही कमी के चलते कृषि उत्पादकता को बढ़ाने की समस्या का समाधान विज्ञान की मदद से खासकर जेनेटिक इंजीनियरिंग के मदद से ही सुलझाया जा सकता है।“ प्रो. साहब ने इस जेनेटिक इंजीनियरिंग अर्थात् जी एम बीजों एवं अन्य तकनीकों की मदद से नए चमत्कारी कृषि उत्पादन में वृद्धि की चर्चा की है। उन्होंने अमेरिका कैलिफोर्निया विश्व विद्यालय की बायोटेक्नोलोजिस्ट पामेला रोनाल्ड द्वारा 2006 में प्रचलित धान के बीज को जेनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा ऐसे बीजों में बदल जाने का उदाहरण दिया है, जिसका पौधा बाढ़ के पानी में दो सप्ताह तक खड़ा रह सकता है। इसी तरह उन्होंने उदाहरणस्वरूप जेनेटिक इंजीनियरिंग द्वारा विटामिन ए से भरपूर नये धान के बीज- गोल्डन राईस को विकसित किए जाने की चर्चा भी की है, जिसको जी एम बीजों के भारी विरोध के चलते अपनाया नहीं जा सका।
प्रो. साहब एवं अन्य वैज्ञानिकों को हर मामला विशुद्ध रूप से विज्ञान के नए शोधों-खोजों को स्वीकार करने या अस्वीकार करने का ही नजर आता है। इसीलिए उन्होंने अपने लेख में इस समर्थन व विरोध को लेकर एक सामान्य दर्शन प्रस्तुत कर दिया है कि विज्ञानं के विकास में शायद हमेशा ही ऐसा होता रहा है। हर दौर में कुछ न कुछ ऐसे लोग रहे हैं, जो विज्ञानं से भय खाते हैं और इसे पसंद नहीं करते। वे वैज्ञानिक विकास को रोकने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं।
प्रो. साहब की यह बात सामान्य रूप से ठीक है, लेकिन प्रो. साहब मौजूदा दौर के वैज्ञानिक विकास को देखते हुए इस दौर की आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों पर बिलकुल ध्यान नहीं दे रहे हैं। गिनती के चंद वैज्ञानिकों को छोड़कर आमतौर पर वैज्ञानिक अपने इस अकागी वैज्ञानिक दृष्टिकोण का शिकार पहले भी रहे हैं।
इसीलिए विज्ञानं व तकनीक के क्षेत्र में महान क्रांतिकारी परिवर्तनों के प्रणेता होते हुए भी वे आम तौर पर क्रांतिकारी युग पुरुषों की श्रेणी में नही आ पाए, हालांकि पहले के तमाम वैज्ञानिकों ने अपनी खोजों अनुसन्धानों को एक सामाजिक एवं मानवीय आवश्यकता के रूप में ही समझा व जाना है। उस समय उनके द्वारा ऐसा करने का एक प्रमुख कारण यह भी था कि वह दौर आज जैसे बाजारवादी समाज का दौर नहीं था। उस युग में ज्ञान-विज्ञान और उसकी सेवाओं का आज जैसा बाजार मूल्य और बाजारवादी आकर्षण नही खड़ा था।
आधुनिक बाजारवाद ने न केवल उपयोग एवं उपभोग के तमाम मालों- सामानों को अपितु ज्ञान - विज्ञान के हर क्षेत्र को यहाँ तक कि धर्म, ज्ञान व उपदेश को भी बिकाऊ माल में परिवर्तित कर दिया है। जो बिक जाए वही ज्ञान विज्ञानं सार्थक है, उपयोगी है जो न बिक सके वह व्यर्थ है, गलत एवं अनुपयोगी है। बताने की जरूरत नहीं है कि वर्तमान युग में वैज्ञानिक एवं तकनीकी खोजों को कराने और फिर उसका प्रयोग व बिक्री बाजार के लिए इस्तेमाल करने उसका प्रचार करने का काम स्वयं वैज्ञानिक नहीं करते। इस समूची प्रक्रिया को चलाने-बढ़ाने में देश-दुनिया की धनाढ्यतम हस्तियां कम्पनियां लगी हुई हैं। अमेरिका जैसे देशों का वैश्विक वर्चस्व बुनियादी रूप से तकनीकी खोजों पर निर्भर है। दुनिया के वैज्ञानिक इन्हीं कम्पनियों और उन्हें हर तरह से बढ़ावा देती सरकारों के उच्च स्तरीय दास बनकर रह गए हैं। उन्हीं के निजी हितों-निर्देशों के अनुसार वे वैज्ञानिक एवं तकनीकी खोजों को अंजाम देते रहते हैं। उसे आगे बढ़ते या फिर रोकते भी रहे हैं।
वस्तुत: इसी कारण वे सामाजिक स्थितियों प्रभावों को नजरअंदाज करते हुए वैज्ञानिक खोजों के पक्ष में लिखते बोलते रहते हैं। वैज्ञानिक एस शांताराम का यह लेख भी इसी का उदाहरण है। वैज्ञानिक महोदय यह भी नहीं देख पा रहे हैं कि आधुनिक बीजों खादों दवाओं वाली हरित क्रान्ति ने किसानों की उपज बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें और उनकी खेती को बाजार के साधनों का मोहताज बना दिया है। साधनों की बढ़ती लागत ने उन्हें आमतौर पर बैंकों व प्राइवेट महाजनों का भारी कर्जदार बना दिया है। बहुसंख्यक किसानों में खासकर सीमांत एवं छोटे किसानों में अभावग्रस्तता करने के लिए दरिद्रता बढ़ाने के साथ उन्हें लाखों की संख्या में आत्महत्या करने के लिए विवश कर दिया है। इसका सबसे बड़ा एवं प्रमुख कारण हरित क्रान्ति की खेती के आधुनिक संसाधनों वैज्ञानिक एवं तकनीकी खोजों पर ( एवं वैज्ञानिकों पर भी ) बाजार की धनाढ्य शक्तियों का मालिकाना रहा है। उन संसाधनों को खड़ा करने के पीछे उनका उद्देश्य खेती के संतुलित वैज्ञानिक विकास का नहीं अपितु उससे अधिकाधिक लाभ कमाने का रहा है।
इसीलिए आधुनिक खेती और उसके संसाधन तथा वैज्ञानिक खोजें किसानों के सहयोगी नहीं बल्कि उनके शोषण व लूट का जरिया बनते रहे हैं। उसी के फलस्वरूप अब खेतियों के टूटने और उत्पादन गिरने का सिलसिला भी बढ़ने लगा है।
जेनेटिक इंजीयरिंग और उसके जरिए कृषि के और ज्यादा विकास का भी यही हाल होना है। इससे भी बुरा होना है आधुनिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी ससाधनों का वर्तमान निजीवादी मालिकाना बनाए रखकर पहले से कर्जा में फंसे किसानों और उनकी टूटती खेतियों को किसी वैज्ञानिक तकनीकी अनुसन्धान से नहीं सुधरा जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि किसानों के पास के संसाधन तथा कृषि के तकनीकी विकास एवं उसमें लगे वैज्ञानिक इंजीयरिंग बाजार की लुटेरी ताकतों से मुक्त हो। तभी और केवल वैज्ञानिकों की उपलब्धियों को विज्ञान की उपलब्धियां कहने के साथ जनसाधारण के हितों की मानवता के हितों की उपलब्धियां कहने बताने का वास्तविक नैतिक अधिकार होगा। विडम्बना यह है कि वैज्ञानिकों एवं अनुसंधानकर्ताओं का समाज उच्च वेतनों सुविधाओं एवं पद प्रतिष्ठाओं की अंधी दौड़ में ऐसे किसी सामाजिक परिवर्तन को उपेक्षा की दृष्टि से देखने लग गया है। यह स्थिति विज्ञानं व वैज्ञानिकों के और धनाढ्य वर्गीय दासत्व को ही परिलक्षित करती है।
सुनील दत्ता
सुनील दत्ता - स्वतंत्र पत्रकार - समीक्षक