आशीष वशिष्ठ

65वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश को भरोसा दिलाया कि ‘सरकार मजबूत लोकपाल कानून बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन इसके लिए अनशन करना गलत है। लोकपाल कानून बनाना संसद का काम है।’ लेकिन अहम बात यह है कि कानून लिखा और संसद में पेश हो चुका है। ऐसे में प्रधानमंत्री देश की जनता से किये वायदे को कैसे निभाएंगे यह विचारणीय है। वहीं संसद के बाहर सड़क पर अन्ना और पूरा देश सरकारी लोकपाल बिल का विरोध कर रहा है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि सिविल सोसायटी जिस सख्त और सशक्त कानून का निर्माण करवाना चाहती है वो कानून का रूप कैसे लेगा। पीएम जिस मजबूत कानून की बात कर रहे हैं उसे लगभग पूरे देश की जनता ने अस्वीकार कर दिया है। ऐसे में अगर पीएम सिविल सोसायटी और जनता द्वारा अस्वीकृत बिल को ही मजबूत सिद्व करने के फिराक में हैं, तो फिर पीएम किसी गलतफहमी का शिकार हैं। प्रधानमंत्री आज अगर यह सोच रहे हैं कि वो हर बार की तरह इस बार भी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर चाशनी मंे डूबा सरकारी भाषण पढ़कर फारिग हो जाएंगे तो उन्होंने इस बार मजबूत लोकपाल कानून का इरादा जता कर मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाल दिया है।

मनमोहन सिंह ने लाल किले से लोकपाल कानून के बारे में जो कुछ कहा उसका लबोलुआब यह है कि सरकार मजबूत लोकपाल कानून बनाने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन इसके लिए अनशन करना गलत है। लोकपाल के दायरे में जुडिशरी को लाना गलत होगा। इससे जुडिशरी की स्वतंत्रता पर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने जन लोकपाल बिल को लागू कराने वाले समर्थकों को सलाह दी कि आप अपने विचार राजनीतिक पार्टियों तक पहुंचाएं, लेकिन अनशन नहीं करें। सुनने में पीएम की बाते जितनी सरल और सीधी लगती हैं असल में वो उतनी सीधी हैं नहीं। पीएम ने अपने संबोधन में उन्हीं बातों को जोड़ा जिन मुद्दों पर सरकार और सिविल सोसायटी के बीच गहरे मतभेद थे। सरकारी ड्राफ्ट के अनुसार प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे से बाहर रहेंगे। इसके अलावा लोकपाल की चयन समिति में पांच सत्ताधारी पक्ष के होंगे और सात राजनीतिक नुमाइंदे होंगे। लोकपाल को हटाने का भी अधिकार सरकार के पास रहेगा। जबकि सीबीआई सरकार के नियंत्रण में रहेगी। प्रधानमंत्री के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच सीबीआई के पास रहेगी।

सांसद भी लोकपाल के दायरे से बाहर रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज लोकपाल के दायरे से बाहर रहेंगे। निचली अदालत भी लोकपाल के दायरे से बाहर रहेगी। सिविल सोसाइटी की तरफ से पेश जन लोकपाल विधेयक के मसौदे में फोन टेप, रोगेटरी लेटर जारी करने और भ्रष्टाचार की गुंजाइश कम करने के लिए कामकाज के तौर तरीकों में बदलाव को लेकर सिफारिशें की गई हैं। लेकिन सरकार की तरफ से पेश लोकपाल बिल के मसौदे में इन मुद्दों का जिक्र तक नहीं है। जन लोकपाल बिल में इस बात का भी जिक्र है कि लोकपाल की एक बेंच भारतीय टेलीग्राफ एक्ट के सेक्शन पांच के तहत एक मान्यता प्राप्त संस्था होगी जिसे टेलीफोन और इंटरनेट जैसे माध्यमों के जरिए भेजे जा रहे संदेशों और डेटा की निगरानी करने और उसे इंटरसेप्ट करने का अधिकार हासिल होगा। कुल मिलाकर छह महत्वपूर्ण बिंदुओं जिनमें लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री, सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जज, निचली न्यायपालिका को लाए जाने को लेकर तीखे मतभेद सिविल सोसायटी और सरकार के बीच गहरे मतभेद हैं सरकार का पक्ष है कि वो ऐसा नहीं चाहती है कि संविधान की मूल भावना को ठेस पहंुचे।

सिविल सोसायटी पर गंभीर आरोप लगाते हुए सरकार ने कहा कि वह ऐसी किसी समानांतर सरकार बनने नहीं दे सकती जो किसी के प्रति भी जवाबदेह नहीं हो। इस तथ्य से इंकार नही किया जा सकता है। लेकिन सिविल सोसायटी जो कुछ भी रही है उसमें देश के आम आदमी की सहमति और भावनाएं भी जुड़ी हैं। लेकिन जिस तरह से सरकारी पक्ष आरंभ से सिविल सोसायटी के वजूद और ताकत को चैलेंज देता आया है, क्या उसको उचित ठहराया जा सकता है? सिविल सोसायटी और सरकार के बीच खींचतान, बयानबाजी और तनातनी किसी से छिपी नहीं है। संयुक्त मसौदा कमेटी में सिविल सोसायटी के सदस्यों को शामिल करवाने के लिए अन्ना को अनशन का सहारा लेना पड़ा था। ऐसे में सरकार से किसी मजबूत कानून की उम्मीद करना बेमानी ही है। और जब प्रधानमंत्री देशवासियों को यह कहते हैं कि सरकार एक मजबूत लोकपाल कानून बनाने को प्रतिबद्व हैं तो पीएम किस आधार पर ये बात कहते हैं, वो बात समझ से परे हैं। क्योंकि संसद में पेश कानून किसी भी दृष्टिकोण से मजबूत और सख्त दिखाई नहीं देता है। जिन छह बिंदुओं पर सरकार और सिविल सोसायटी के बीच सहमति नहीं बन पाई थी, जब वही बिंदु संसद में प्रस्तुत कानून में शामिल नहीं है तो लोकपाल कानून मजबूत कैसे बन पाएगा, ये बात समझने वाली है।

अगर प्रधानमंत्री दिल से यह चाहते हैं कि देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक लगाने के लिए एक मजबूत लोकपाल कानून की दरकार है तो उन्हें खुलेमन से सिविल सोसायटी के सुझावों पर ध्यान देना चाहिए। संवैधानिक तौर पर सिविल सोसायटी की जो बातें मानने योग्य हों सरकार को उन्हें प्रस्तावित कानून में अवश्य शामिल करना चाहिए। बेमतलब की बयानबाजी और खींचतान से न तो देश का भला होगा और ना ही एक मजबूत कानून बन पाएगा। मानाकि संसद सर्वोच्च है, सारी शक्तियां उसमें निहित है। लेकिन संसद और उसके सदस्य देश के आम आदमी की वोट से ही शक्ति पाते हैं। आज लगभग सारा देश अन्ना के साथ जन लोकपाल बिल की मांग कर रहा है ऐसे में सरकार आम आदमी की आवाज सुनने की बजाय कानूनी दांव-पेंच, षडयंत्र और बयानबाजी में मशगूल है। अगर माननीय प्रधानमंत्री जी अगर आप देश की जनता को वास्तव में एक मजबूत लोकपाल कानून का तोहफा देना चाहते हैं तो आम आदमी की भावनाओं को समझिए क्योंकि आज देश की जनता आप से एक मजबूत लोकपाल कानून की ही मांग कर रही है, कुछ और नही।