कैसे सुधरेगी कतवारू सरीखे आदिवासियों की माली हालत?
कैसे सुधरेगी कतवारू सरीखे आदिवासियों की माली हालत?
बेरोजगार महेंद्र के कंधों पर उसकी पत्नी प्रभावती समेत चार परिवारोंकी जिम्मेदारी है। कतवारू की छोटी बेटी कक्षा दो में पढ़ती है, लेकिन गरीबी के कारण उसकी पढ़ाई भी बाधित होती रहती है। कतवारू के सिंर पर इस समय पांच लोगों की जिम्मेदारी है। भूमिहीन करमा लोक कलाकार करवारू मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालता है। लेकिन रोजगारके अभाव में घर का चुल्हा जल पाएगा कि नहीं यह चिंता उसे सालती रहता है। कहने को तो वह रौंप गांव का निवासी है लेकिन 10 अप्रैल 2007 को बने उसके जाब कार्ड संख्या 31630020500231 में एक दिन भी रोजगार नहीं मिला है। ना ही उसे बेरोजगारी भत्ता ही मिला है
भूखमरी से डेढ़ दर्जन से अधिक बच्चों की मौत का गवाह बन चुकी घसिया बस्ती के कतवारू ने कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी को आदिवासियों की धरोहर धनुष-तीर और टोपी भले ही सौंप कर मीडिया का सितारा बन गया हो, लेकिन उसके जैसे कलाकारों की माली हालत जस की तस बनी है। मिट्टी की दिवाल पर फूस के छाजन से बने घर में शाम का चुल्हा जल भी पाएगा कि नहीं यह चिंता दिन रात कतवारू सरीखे राष्ट्रीय कलाकारों को सालती रहती है। 55 वर्षीय कतवारू की गरीबी और उपलब्धियों की बात करें तो कतवारू के परिवार में उसकी 0 वर्षीय पत्नी कंचन के साथ एक पुत्र महेंद्र (25 वर्ष), दो पूत्रियां राजकुमारी (20 वर्ष) एवं गीता (12वर्ष) हैं। महेंद्र की शादी हो चुकी है। बेरोजगार महेंद्र के कंधों पर उसकी पत्नी प्रभावती समेत चार परिवारोंकी जिम्मेदारी है। कतवारू की छोटी बेटी कक्षा दो में पढ़ती है, लेकिन गरीबी के कारण उसकी पढ़ाई भी बाधित होती रहती है। कतवारू के सिंर पर इस समय पांच लोगों की जिम्मेदारी है। भूमिहीन करमा लोक कलाकार करवारू मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालता है। लेकिन रोजगारके अभाव में घर का चुल्हा जल पाएगा कि नहीं यह चिंता उसे सालती रहता है। कहने को तो वह रौंप गांव का निवासी है लेकिन 10 अप्रैल 2007 को बने उसके जाब कार्ड संख्या 31630020500231 में एक दिन भी रोजगार नहीं मिला है। ना ही उसे बेरोजगारी भत्ता ही मिला है। यहीं हालत उसे बेटे केनाम बने जाब कार्ड संख्या 31630020050232 की है। कतवारू के परिवार में अन्त्योदय कार्ड है, जिसके चलते वह महिने में 35किलो राशन तोपा लेता है लेकिन अन्य खरचे उसे भारी पड़ रहे हैं। चुर्क पुलिस चौकी के मड़कुड़ी गांव से घसिया परिवार के लोग आज से करीब दो दशक पूर्व आकर जब यह बस्ती बनाई थी तो उससमय इनकी आंखों में आशाओँ की एक चमक थी जो आज धीमी पड़ती जा रही है। सोनांचल संघर्ष वाहिनी के संयोजक रोशनलाल यादव घसिया बस्ती के आदिवासियों को उनका हक दिलाने के लिए कोशिश कर रहे हैंय़ बीती 18 मई को राहुल गांधी को धनुष-तीर और टोपी भेंट करने का विचार रोशन लाल के दिमाग की उपज थी। जिसके माध्यम से वे राहुल गांधी के पास सोनभद्र के आदिवासियों की आवाज कतवारू के माध्यम से पहुंचा सके। इस योजना को मूर्त रूपदेने के लिए कोन थाना क्षेत्र के पड़रछ गांव निवासी राम नरेश चेरो ने धनुष-तीर का निर्माण किया था। आदिवासी टोपी चोपन ताना क्षेत्र के पटवध गांव निवासी मुन्ना धइकार ने बनाया था। धनुष को धागों से सुसज्जित करने का काम खुद रोशनलाल यादव ने किया था। आदिवासियों की कलाओं में अनेक विधाएं आज भी हैं और सोनभद्र में इन कलाओं के कलाकार मौजूद हैं औरमाली हालत में जी रहे हैं। झूमर नृत्य की राष्ट्रीय स्तर की कलकार 65 वर्षीय रुकमनिया सरीखे लोककलाकारों की हालत भी सोनभद्र में कतवारू सरीका ही है, लेकिन कोई भी इनकी ओर ध्यान देने की कोशिश नहीं कर रहा है। जबकि ये कलाकार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के साथ दिल्ली में भोजन कर चुके हैं।


