कौन देगा जनता के सवालों के जवाब
कौन देगा जनता के सवालों के जवाब
बीजेपी में 2014 लोकसभा में भारी बहुमत पाने के बाद जुमलों व झूठे आश्वासनों की नई परंपरा शुरू हुई है जो बड़े स्तर पर केंद्रीय मंत्रियों से लेकर छोटे स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं तक पैर पसार चुकी है। अमित शाह से नरेंद्र तोमर जी के बयानों में ही नहीं, आप छोटे स्तर पर पार्टी के कार्यकर्ता से मिलिए, वो भी यही कर रहे हैं।
2 दिन पहले जब जोधपुर के ही एक वरिष्ठ भाजपाई ने फेसबुक पर भाजपा की उपलब्धियों का पोस्ट डाला तो काफी लोगों ने जोधपुर को स्मार्ट सिटी में शामिल नहीं करने का कारण पूछा तो पहले तो वे गोल मोल जवाब देते रहे और फिर बोला कि अभी 98 शहर घोषित हुए हैं, 2 में जोधपुर का नाम होगा, उन्हें यह भी नहीं मालूम कि वह 2 शहर जम्मू कश्मीर के लिए हैं।
जो कार्यकर्ता जमीन पर वोट मांगता है,दिलवाता है, नेताओं से सीधे सम्पर्क साधता है, से भी अब बड़े नेताओं व टेलीविजन डिबेट टाइप के जवाब आने लगे हैं। लोगों के ईमानदार जवाब देने के लिए कोई बचा नहीं है अब।
किसी भी पार्टी का कार्यकर्ता ही उस पार्टी का कार्यकाल तय करता है,बिना जमीनी कार्यकर्ताओं के झुंड के किसी भी चुनाव को नहीं साधा जा सकता। अंतिम इंसान और सत्ता के गलियारों के बीच की कडियों का टूटते हुए नजर आना किसी भी लोकतंत्र के लिए सुखद नहीं हो सकता।
दिल्ली में आआपा और केन्द्र में बीजेपी को कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज के बिना इतना व्यापक बहुमत हासिल हो सकता था क्या? जीत के बाद पार्टियों व सरकारों के साथ इन जमीनी कार्यकर्ताओं का भी आवाम से मोहभंग को कमतर नहीं आंका जा सकता।
चुनाव से पहले जिनके हाथों में झण्डे व जुबान पर नारों के साथ गालों पर पार्टी के चुनाव चिह्न उकेरे ये अतिउत्साहित युवा हमारे दरवाजों पर बातों व वायदों, उपलब्धियों और भरोसे की गारंटी के साथ दस्तक देते हैं, दरअसल सत्ता के बाद ये भी आश्वासनों में फँस जाते हैं और हमें पार्टी से उम्मीद रखने का प्रयास करने का भी कहते रहते हैं। युवा कार्यकर्ता राजनीतिक पार्टियों का सबसे बड़ा हथियार है, जिनकी ऊर्जा का इस्तेमाल किस तरह पार्टियां करती है ये हम सब पिछले कई चुनावों में देख चुके हैं।
राजनीतिक दलों के हथियार युवा कार्यकर्ता और युवाओं का औजार सोशल मीडिया,जो प्रचार का सबसे बड़ा उपकरण हैं बिहार चुनाव में भी देखियेगा। उस पर भी ये लोग आजकल लोगों के जायज सवालों के जवाब नहीं दे रहे, जमीनी कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर भी लोगों के जवाबों की बजाय पार्टीलाइन को ज्यादा महत्व दे रहे हैं।
रवि शर्मा


