क्या गुजरात में वो ’कुख्यात’ दौर लौट रहा है?
क्या गुजरात में वो ’कुख्यात’ दौर लौट रहा है?
हरे राम मिश्र
हाल ही में गुजरात पुलिस के आतंकवाद निरोधी दस्ते यानी एटीएस ने आईएसआईएस से संपर्क रखने के आरोप में गुजरात के राजकोट और भावनगर से वसीम और नईम रमोदिया नाम के दो युवकों को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार किए गए दोनों युवक सगे भाई हैं। सौराष्ट्र विश्वविद्यालय में क्रिकेट के अंपायर रह चुके रिटायर्ड पिता आरिफ रमोदिया की संतान वसीम कम्यूटर विज्ञान में एमसीए और नईम बीसीए पास है।
गुजरात एटीएस के पुलिस अधीक्षक केके पटेल ने मीडिया को ब्रीफ करते हुए बताया कि दोनों सगे भाइयों ने जांच टीम को भारत में आईएसआईएस के नेटवर्क के बारे में कई महत्वपूर्ण जानकारियां दी हैं। पटेल के मुताबिक हिरासत में लिए गए दोनों संदिग्ध राजकोट के त्रिकोण बाग और गुंडावाड़ी इलाके में बम विस्फोट की योजना बना रहे थे। एटीएस के मुताबिक इसमें वसीम की पत्नी शाहजीन की गतिविधियां भी संदिग्ध हैं लेकिन फिलहाल अभी उसे गिरफ्तार नहीं किया गया है।
पुलिस के मुताबिक पिछले दो साल से इन पर नजर रखी जा रही थी। पकड़े गए युवकों के निशाने पर प्रसिद्ध चोटिला मंदिर था और हाल ही में वसीम ने मंदिर की रेकी भी की थी। एटीएस का दावा है कि गिरफ्तार किए गए युवक देश के आंतरिक हिस्सों में आतंकी हमले की साजिश रच रहे थे। एटीएस के बयान के मुताबिक यह दोनों युवक गुजरात में पटाखा फैक्ट्रियों से विस्फोटक जमा करने का प्लान बना रहे थे। जांच एजेंसियों ने इनसे पूछताछ के बाद बताया है कि अहमदाबाद समेत गुजरात के कई हिस्सों में उनके जैसे और चालीस संदिग्ध फैले हुए हैं, जो आईएसआईएस की दुनिया भर में चलने वाली गतिविधियों से जुड़े हैं।
पुलिस अधीक्षक केके पटेल के मुताबिक एनआईए ने पिछले साल यूपी से मुफ्ती कासम काजमी को गिरफ्तार किया था। उससे भी दोनों भाइयों के संपर्क होने की बात सामने आयी थी। उसकी काल डिटेल से वसीम का नंबर मिला था। इसे ट्रेस करने पर पुलिस को पता चला कि वसीम लादेन और बगदादी को रोल मॉडल मानता है।
एनआईए पिछले साल हैदराबाद, केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र के अलग-अलग शहरों से कई संदिग्ध लोगों को पकड़ चुकी है।
आईएसआईएस से जुड़े लोगों की यह पहली गिरफ्तारी नहीं है। इससे पहले भी देश के अन्य राज्यों से इस तरह की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। इनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान, तेलंगाना, केरल, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तराखंड, जम्मू कश्मीर, बिहार, दिल्ली, बंगाल व कर्नाटक आदि शामिल हैं।
जैसा कि गुजरात पुलिस ने अपने बयान में कहा है कि अभी गुजरात में चालीस अन्य युवक आईएसआईएस के संपर्क में हैं, इसलिए यह संभावना जतायी जा रही है कि जल्द ही गुजरात से और गिरफ्तारियां आईएसआईएस से संपर्क रखने के नाम पर होंगी।
सरकार और सुरक्षा एजेंसियों द्वारा इस्लामिक चरमपंथ की समझ और उससे निपटने का अपना एक व्यवस्थागत तरीका है जिस पर सवाल और बहस की एक अलग दिशा है। लेकिन, गुजरात पुलिस के गिरफ्तारी वाले इस दावे पर कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने सवाल उठाते हुए इसे उत्तर प्रदेश में हो रहे विधान सभा चुनाव में भाजपा की जीत के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने वाला बताया है। उनके मुताबिक पुलिस की युवकों से विष्फोटक और अन्य बरामदगी दावा निहायत ही हास्यास्पद है। उनके मुताबिक पटाखों के बारूद से विस्फोटक बनाने की कहानी बेहद ही सतही और हास्यास्पद है।
यही नहीं, जिन चालीस अन्य की सक्रियता के बारे में पुलिस ने यह बयान दिया है उससे मुस्लिम समाज में मनोवैज्ञानिक दबाव, दहशत और एक तरह का अपराध बोध भी पैदा होगा।
आलोचकों का कहना है कि गुजरात पुलिस के पिछले काले कारनामों और मुसलमानों के प्रति उसके ’पूर्वाग्रह’ के चलते गुजरात पुलिस की विश्वसनीयता ’संदिग्ध’ हो चुकी है। इशरतजहां प्रकरण के बाद जो खुलासे हुए थे उसने गुजरात पुलिस के सांप्रदायिक चरित्र और ’हिन्दुत्व’ के प्रति उसकी वफादारी की कलई खोलकर रख दी थी। इसलिए पुलिस की इस कार्यवाही पर कोई यकीन नहीं किया जा सकता।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि भारत में आतंकवाद के नाम पर पुलिस द्वारा फर्जी तरीके से युवकों को फंसाने, हत्या करने, हिरासत में उत्पीड़न करने और अपने संवैधानिक दायित्वों को किनारे कर राजनैतिक फायदे के लिए प्रशासनिक मशीनरी द्वारा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, गुजरात पुलिस की एटीएस और एसटीएफ को कभी भी उपेक्षित नहीं किया जा सकेगा।
इशरत जहां के फर्जी एनकाउंटर के बाद, जिस तरह से पुलिस के लोग और डीजी स्तर के अधिकारी तक जेल गए, इस तरह की घटनाओं पर एकदम ब्रेक ही नहीं लग गया बल्कि पुलिस ने यह सब करने से एकदम ’तौबा’ कर लिया था।
गुजरात के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता दिवंगत मुकुल सिन्हा और उनकी टीम ने जो संघर्ष किया, उससे पुलिस के लोगों में एक तरह से खौफ भर गया था। लेकिन, मानवाधिकर कार्यककर्ताओं को अब ऐसा लगता है कि नरेन्द्र मोदी के दिल्ली की सत्ता में आने के बाद वह गुजरात में वह ’कुख्यात’ दौर फिर से वापस लौटने लगा है।
आतंकवाद के नाम पर फंसाए गए बेगुनाह नौजवानों का अदालत में मुफ्त में मुकदमा लड़ने और चैदह बेगुनाहों को रिहा करवाने वाले रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुऐब एडवोकेट कहते हैं कि भारत में आतंकवाद की पूरी फिलॉसिफी को समझने के लिए हमें राज्य मशीनरी की सांप्रदायिक मानसिकता को समझना होगा। आतंकवाद के नाम पर हर गिरफ्तारी देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करती है। उनके मुताबिक इस बात से कोई इनकार नहीं है कि इस देश में किसी खास विचारधारा के लिए सांप्रदायिक धु्रवीकरण का एक औजार पुलिस, खुफिया और जांच एजेंसियां बन गई हैं।
आज जिन गिरफ्तारियों के बल पर गुजरात की एटीएस अपनी पीठ ठोंक रही है वह मामला अदातल में कितनी देर तक टिकेगा यह कतई नहीं कहा जा सकता। लेकिन जिन युवकों को गिरफ्तार किया गया है उन्हें व उनके परिवार को सामाजिक स्तर पर कितनी जलालत झेलनी पड़ती है, इसका अंदाजा किसी को नहीं होता है।
वे आगे कहते हैं कि भले ही यह अदालत से बाइज्जत बरी हो जाएं, समाज की निगाह में अब ये अछूत ही रहेंगे।
मोहम्मद शुऐब कहते हैं कि जांच एजेंसियों की ’एकांउंटबिलिटी’ तय किए बिना इन मामलों में अब इंसाफ नहीं हो सकता।
मोहम्मद शुऐब एडवोकेट आगे अखबारों की कतरने दिखाते हुए कहते हैं कि आतंकवाद के नाम पर पुलिस द्वारा फर्जी तरीके से फंसाने और मुसलमानों को बदनाम करने के कई किस्से आजकल अखबारों में दिखाई देते हैं। लेकिन संबंधित राज्य की सरकारें जानबूझ कर इन मामलों अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेती हैं।
वह बताते हैं कि बेस्ट बेकरी कांड में हिमायत बेग पर फर्जी मामला बनाकर उसका जीवन तबाह कर दिया गया, लेकिन किसी से भी सवाल नहीं हुआ। यही नहीं दिल्ली ब्लास्ट करने के आरोप में पकडे गए लोगों में से दो लोग बाइज्जत बरी हुए लेकिन जेल में बिताए गए उनके बारह साल के बर्बाद हुए जीवन की जिम्मेदारी कौन लेगा? उन्होंने खुद कई लोगों को अदालत से बाइज्जत बरी करवाया है लेकिन सामाजिक स्तर पर उनका सब कुछ बर्बाद हो चुका था।
मोहम्मद शुऐब एनआईए पर भी सवाल उठाते हुए उसकी सांप्रदायिकता को रेखांकित करते हुए पब्लिक प्रोसिक्यूटर रोहिनी सॉलियन के उस बयान का जिक्र करते हैं जिसमें एनआईए उन्हें साध्वी प्रज्ञा के खिलाफ नरम रुख अपनाने को कहती है, ताकि उनकी जमानत करवायी जा सके।
यहां यह बात ध्यान रखने लायक है कि भारत में आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए लोगों का ’कन्विक्शन’ रेट बहुत ही कम है। पुलिस की गिरफ्तारी और कहानी अदालत और न्याय के तराजू पर कितनी विश्वसनीय है, यह सदैव सवालों के घेरे में रहता है।
दरअसल जांच एजेंसियों पर खास राजनैतिक मकसद के तहत मुसलमानों को बदनाम करने और सामाजिक ध्रुवीकरण के लिए काम करने का आरोप लगता रहा है। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की निगाह में भारत में एजेंसियां अब अपने मूल काम ’निष्पक्ष’ विवेचना और संबैधानिक दायित्वों को तिरोहित कर ’हिन्दुत्व’ को मजबूत करने के लिए माहौल बनाने में लगी हुई हैं।
आतंकवाद के मामलों में मीडिया की रिपोर्टिंग और उसकी सांप्रदायिकता पर अध्ययन कर चुके मसीहुद्दीन संजरी कहते हैं कि ऐसे मामलों में अखबारों की रिपोर्टिंग भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त होती है और पीड़ित व्यक्ति का सबसे ज्यादा मीडिया ट्रायल होता है। ऐसा लगता है जैसे आतंकवाद के मामले में गिरफ्तारियों और खबरों के प्रकाशन को लेकर एक अजीब किस्म की हड़बड़ाहट होती है।
अगर अखबारों में छपी खबरों का बारीक विष्लेषण किया जाए तो इस संदर्भ में सूत्रों के हवाले से छपी खबरों में गंभीर किस्म का विरोधाभास दिखायी देता है। मसीहुद्दीन संजरी कहते हैं कि भारत को खतरा केवल इस्लामिक चरमपंथ से ही नहीं है बल्कि हिन्दूवादी चरमपंथ से भी है। लेकिन इस दिशा में मीडिया और जांच एजेंसियां दोनों ही बेहद ’बायस्ड’ विचार रखती हैं।
खुद एनआईए पर सांप्रदायकि मांइंडसेट के तहत काम करने के आरोप लगे हैं। ऐसे आरोप लगना किसी भी जांच एजेंसी के लिए बहुत शर्मनाक है लेकिन इन आरोपों की अपनी सच्चाइयां होती हैं।
गुजरात दंगों के बाद, अक्षरधाम मंदिर पर हुए कथित आतंकी हमले की असलियत पर ’ऑपरेशन अक्षरधाम’ जैसी किताब लिख चुके राजीव यादव गुजरात पुलिस के सांप्रदायिक चरित्र पर बात करते हुए कहते हैं कि गुजरात पुलिस के दावे भले ही कुछ कहें लेकिन आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मुसलमानों की गैर कानूनी हिरासत, उनका उत्पीड़न करने के मामले में गुजरात पुलिस की एसटीएफ और एटीएस ब्रांच ’कुख्यात’ रही है।
राजीव यादव कहते हैं कि अक्षरधाम मंदिर मामले में एटीएस और एसटीएफ ने जिस अदूरदर्शी और पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर काम किया है उस पर कई सवालिया निशान सर्वोच्च अदालत ने स्वयं उस समय लगाए थे जब 2014 में अक्षरधाम हमले के संदिग्ध आरोपियों को बेगुनाह मानकर रिहा किया था।
राजीव यादव आगे कहते हैं कि सोहराबुद्दीन शेख, कौसर बी, इशरत जहां समेत चार लोगों के फर्जी एनकाउंटर की जांच से ऐसे तथ्य सामने आए जिसने गुजरात पुलिस के ’प्रोफेशनलिज्म’ और निष्पक्षता को बेनकाब कर दिया।
राजीव यादव कहते हैं कि गुजरात पुलिस की विश्वसनीयता इस हद तक गिर गई है कि वह गुजरात में विश्व हिंदू परिषद का एक पुर्जा और ’हिन्दुत्व’ का मोहरा बन चुकी है। उसके किसी भी दावे पर यकीन नहीं किया जा सकता।
दरअसल स्थानीय पुलिस को जो भी खुफिया इनपुट भेजे जाते हैं, कार्यवाही के लिए वे कितने विश्वसनीय होते हैं यह भी हमेशा सवालों के घेर में रहा है। इशरत जहां की हत्या के बाद आईबी के अफसर राजेन्द्र कुमार के खिलाफ जिस तरह के आरोप लगे थे उसने भी आईबी को संसद के प्रति जवाबदेह बनाने की जरूरत दर्शायी थी। लेकिन सरकार द्वारा इस दिशा में कोई पहल नहीं की गई। कहने का मतलब यह है कि समूचे तंत्र की ’एकाउंटबिलिटी’ पर बहस से राजनीति को एक घबराहट होती है।
पुलिसिया आतंक और मुसलमानों के प्रति एजेंसियों का पूर्वाग्रह किस तरह से मुस्लिम नौजवानों को बर्बाद कर रहा है इसका एक सर्वोत्तम उदाहरण जस्टिस निमेष आयोग की रिपोर्ट है।
उत्तर प्रदेश में मायावती के शासन में आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से गिरफ्तार किए गए बयासील नौजवानों में से चैदह बाइज्जत भले ही बरी हो गए, लेकिन लंबी अदालती प्रक्रिया में उनका सबकुछ तबाह हो गया।
मसीहुद्दीन संजरी कहते हैं कि इस देश में आतंकवाद केवल लॉ एंड आर्डर का मामला नहीं है और जब यह वोट की दिशा और राजनैतिक दलों का भविष्य तय करता हो तब जांच एजेंसियों पर यह विशेष जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने ’प्रोफेशनलिज्म’ का ईमानदारी से इस्तेमाल करें और प्रकरण में सही-गलत का पता लगाएं।
मोहम्मद शुऐब कहते हैं कि देश की जांच एजेंसियां आतंकवाद के मामलों में ’पूर्वाग्रह’ से ग्रस्त हैं। यह बात समाजवादी पार्टी ने 2012 के अपने चुनावी घोषणापत्र में मानी थी और उत्तर प्रदेश में सरकार बनने पर उन्हें रिहा करने का वादा किया था। लेकिन बाद में इस दिशा में कोई काम नहीं हुआ।
एजेंसियों के पास प्रोफेशनलिज्म’ और ईमानदारी नहीं
कुल मिलाकर भारत में आतंकवाद के मामले में सरकार और जांच एजेंसियां चाहे जिस तरह का दावा करें लेकिन एक बात तो तय है कि इस प्रकरण में जिस ’प्रोफेशनलिज्म’ और ईमानदारी की जरूरत होती है वह एजेंसियों के पास नहीं है। इसके लिए बुनियादी स्तर पर सुधार करना होगा ताकि आतंकवाद के मामलों में इंसाफ और न्याय की पूरी प्रक्रिया को जवाबदेह बनाया जा सके। शायद गुजरात में हुई इस गिरफ्तारी पर सवाल उठाने वाले इसी ओर इशारा कर रहे हैं क्योंकि उनकी सारी बहस लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों को महफूज रखने पर खत्म हो रही है।


