क्रूर समाज पर सफ़ेद धब्बा. श्मशान में तब्दील तातेहरा गुम्मखान पुरवा.... क्योंकि ये उनका देश नहीं है!
क्रूर समाज पर सफ़ेद धब्बा. श्मशान में तब्दील तातेहरा गुम्मखान पुरवा.... क्योंकि ये उनका देश नहीं है!
सोनी क्रूर समाज पर सफ़ेद धब्बा छोड़ गयी. श्मशान में तब्दील तातेहरा गुम्मखान पुरवा.... क्योंकि ये उनका देश नहीं है!
बहराइच से लौटकर राजीव यादव की रिपोर्ट
जरा ध्यान से देखिये ये वो तख़्त था, जिस पर छह साल की सोनी सोती थी और ये जो धर्म की आग से कालिख हुए तख़्त पर सफ़ेद धब्बा है, ये कुछ और नहीं सोनी की लाश का धब्बा है।
सोनी जाते-जाते इस क्रूर समाज पर ये सफ़ेद धब्बा छोड़ गयी कि तुम मेरे लिए रोना नहीं क्यों कि तुम सभी मेरे कातिल हो।
उसे क्या मालूम था कि जिस तख़्त पर वो लेटी हुई है वो उसकी चिता है। उसके धर्म के मुताबिक उसे दफन होना था पर वो जलकर राख होकर वो इस क्रूर समाज पर एक सफ़ेद धब्बा लगाकर चली गयी।
उसे मालूम था कि हम रोते नहीं और सोनी की मौत पर तो बिलकुल नहीं रोने का अधिकार है क्यों कि वो मेरे धर्म की नहीं थी न....
उसकी दादी जो चारा लेने गईं थीं, उनको न मालूम था कि उनकी पोती साम्प्रदायिकता का चारा बन जायेगी और इस सबसे बड़े लोकतंत्र में सबसे ज्यादा साम्प्रदायिक हिंसा में मारे गए मुसलमानों के नामों की फेहरिस्त में शामिल हो जायेगी।
सोनी के घर से सटे कब्रिस्तान को देख कई बार सोच में आ जाता है कि क्या कभी सोनी ने अब्बू-अम्मी से पूछा होगा कि ये क्या है और क्या उसे मालूम भी रहा होगा कि इसमें मुर्दे दफ़न किये जाते हैं।
पर सोनी क्या ये जानती होगी कि कुछ धर्म प्रेमी इससे खुश होंगे कि उसे इस धरती में दो गज जमीन नहीं नसीब हुयी क्यों कि ये उसका देश नहीं है..
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धार्मिक उन्माद के विजय के बाद श्मशान में तब्दील बहराइच का तातेहरा गुम्मखान पुरवा गांव ....क्योंकि ये उनका देश नहीं है!!
यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश
यह जल्लादों का उल्लास-मंच नहीं है मेरा देश
यह विस्तीर्ण शमशान नहीं है मेरा देश
यह रक्त रंजित कसाईघर नहीं है मेरा देश
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इस मोड़ से शुरू होता है बहराइच के तातेहरा गांव के गुम्माखान पुरवा की तबाही का मंजर।
जहां एक धर्म को मानने वालों ने दूसरे धर्म को मानने वालों के आशियानों को खाक कर दिया। बरतन जरूर दिख रहे हैं पर चूल्हे के बजाय साम्प्रदायिकता की आग में झुलसे इन बेढब बर्तनों से यहाँ रहने वालों के हालात ही नहीं डर को भी देखा जा सकता है, जिनके कानों में आज भी वो दहशतजदा करने वाले नारे गूंज रहे हैं कि ये देश उनका नहीं है।
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यह किसी अली का घर नहीं सुलग रहा है बल्कि देश सुलग रहा है ,जल रहा है...
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