बिना राजनीति किये तुम अपना नास्तिक झंडा भला कैसे बुलंद कर सकते हो?
डाकिंस-सैम हैरिस और भगत सिंह में बुनियादी फर्क है, मैं दूसरे का पक्षधर हूँ
शमशाद इलाही “शम्स”
'बस ऐवैई' का यूं ठुस हो जाना स्वाभाविक था। तुम इस काबिल नहीं थे कि इस झिलझिली सोच के साथ तुम नास्तिक सम्मेलन कर लोगे, बिना यह समझे कि इर्द गिर्द वातावरण में एक भी चीज ऐसी नहीं जो अराजनैतिक हो, फिर बिना राजनीति किये तुम अपना नास्तिक झंडा भला कैसे बुलंद कर सकते हो?
बावजूद इसके कि स्वामी बालेन्दु साहब से मेरे गहरे वैचारिक मतभेद थे, जिसके चलते मैंने उनसे दूरी बना ली, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन्हें उनके मानवीय अधिकारों से वंचित कर दिया जाए।

मैं संविधान की बात नहीं कर रहा, उन्हें और उनके तमाम मित्रों को देश-दुनिया में कहीं भी जब चाहे एकत्र होने का, मौज मस्ती करने का अधिकार है। लेकिन भारत जैसे सऊदी अरब को समझने के लिए जिस राजनीतिक समझ की जरूरत है, वह और उनके मित्रगण इस ठोस वास्तविकता से आज खुद रू-ब-रू हो गए।

खालिस नास्तिकता जहनी बंजरपन है, मैं न उसका वकील हूँ न अनुयाई।
छोड़ दीजिये स्वामी शब्द, जय सियाराम, आश्रम, उजड़ी खुजडी भंगडी साधू कट दाढी या पहनावा, जो सभी दोयम दर्जे वाले घटिया अतीत के 21वीं सदी में परोसे जा रहे प्रतीक हैं, मैं उन्हें सिरे से ख़ारिज करता हूं।
साथ में सिर्फ नास्तिक होने का ढोल पीटकर समाज को अराजनीतिक करने की मंशा किसी तवज्जो के काबिल भी नहीं, लेकिन फिर भी वृन्दावन में नास्तिक सम्मेलन के विरोध में हरे-भगवे सामाजिक कीड़े मकौड़े सभी एक घाट पर आ कर जिस तरह हू-हू किये हैं, वह देखने योग्य है।
भारतीय राज्य के मर्म में हिन्दू राज्य है, जिसका फासीवादी चरित्र दिन-ब-दिन स्पष्ट हो रहा है। इस खतरे को समझने की कोशिश पहले हो, तब ही इसके विरुद्ध कोई संघर्ष संभव है। जाहिर है नास्तिक तबके के बस का यह कार्यभार नहीं।

यदि इस काण्ड में कोई जान चली गयी होती तो उसके नतीजे में जयसियाराम-आश्रम दुकान तत्काल भंग कर दी गयी होती।
तुम बिना प्रतिक्रिया समझे क्रिया करोगे तो सवाल पैदा ही होंगे? क्या वास्तविक मंशा क्रिया की थी या सिर्फ प्रतिक्रिया देखने की?
अगर कुछ अभी भी करने का मद्दा या कुव्वत बाक़ी है तो ऐसा समाज-राज्य बनाने के लिए संघर्ष करो जिसमें नास्तिक सहित सभी सम्मान से रह सकें। और भोले बंधुओं- यह काम समाज, राज्य के ढाँचे को पलटे बिना संभव नहीं।
डाकिंस-सैम हैरिस और भगत सिंह में बुनियादी फर्क है, मैं दूसरे का पक्षधर हूँ.