खेल बेटा, चाँद से- यह नहीं वह सपना !
खेल बेटा, चाँद से- यह नहीं वह सपना !
मोहन श्रोत्रिय
प्रधानमन्त्री बनना उनका सपना नहीं है। ऐसा उन्होंने कहा शिक्षक दिवस के एक कार्यक्रम में। पर लाल किला उनका सपना है, वह चाहे कितना ही प्रतिवाद करें, यह सपना तो उनका हर वक़्त का सपना है ही - सोते/जागते, उठते/ बैठते।
पन्द्रह अगस्त को इस सपने का रहस्योद्घाटन हो गया था, जब ध्वनि-साम्य के कारण उन्होंने लल्लन कॉलेज को चुना लाल किले के बरक्स। अब छत्तीसगढ़ के मुख्यमन्त्री उनके सपने में रंग भरने जा रहे हैं। मात्र दो करोड़ की लागत से बन रही है लाल किले की यह अनुकृति।
कृष्ण की ज़िद "चंद्र खिलौना" पा जाने की थी। माँ ने सस्ते ही में पूरी कर दी, एक परात में पानी भर दिया, और चाँद का प्रतिबिम्ब दिखा दिया। खेल बेटा, चाँद से ! पानी को हिला और देख, चाँद कभी इधर-कभी उधर होते रहकर खुश करता रहेगा, तुझे ! पर अब समय बदल गया है। महँगाई भी आसमान छू रही है। सो ऐसे में, दो-चार करोड़ रुपये क्या मायने रखते हैं ज़िद/ सपने को पूरा करने के लिये?
तो अब इन्तज़ार कीजिये टीवी पर इस नये लाल किले के दर्शन का। ऑल द बेस्ट !
रामदेव भी हास्य तो अद्भुत पैदा करते हैं। देखिए क्या "उचरे" हैं। एकदम टटकी परिभाषा साधु की।
धन साधु के पास न हो तो क्या चोर-लुटेरों के पास हो?
यह नये युग के साधु की परिभाषा है, खुद को बचाते हुये, क्योंकि खुद को भी तो साधु मानते हैं। इसका एक निहितार्थ यह भी हो सकता है कि उन सबको साधु माना जाये जिनके पास धन हो/ है।
सोचकर देखिये, साधु की श्रेणी में कौन-कौन लोग आ जाने वाले हैं ! धन बिना कैसी राजनीति, धन बिना साधु कैसा ?
धन=साधु ! साधु राजनीति नहीं करेगा तो क्या चोर-लुटेरे राजनीति करेंगे? अपने भी प्रज्ञा चक्षु खुलने लगे हैं !


