गुजरात : चाल-चरित्र-चेहरे की कुरूपता और पालाबदल के खेल व खरीद-फरोख्त
गुजरात : चाल-चरित्र-चेहरे की कुरूपता और पालाबदल के खेल व खरीद-फरोख्त
आज की तारीख में किसे नहीं मालूम कि कभी हरियाणा से शुरू हुई 'आयाराम गयाराम' की जनविरोधी राजनीति भूमंडलीकरण के पिछले ढाई दशकों में 'राजनीति से पैसा और पैसे से राजनीति' के खुले कारपोरेटी कहें या फर्रुखाबादी खेल तक जा पहुंची है। इस खेल से, जो अब शायद ही किसी को बुरा लगता हो, लोकतंत्र की सुविधाओं के अनुकूलन व इस्तेमाल में महारत हासिल कर चुके वे चतुर सुजान हमारे लोकतंत्र के नियंता बन बैठे हैं, जिनका उसमें खुद का विश्वास तभी तक असंदिग्ध रहता है जब तक वह उनकी सुविधा बना रहे।
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गुजरात में नेताओं के पालाबदल के खेल और खरीद-फरोख्त के बाजार की गर्मी देखिये- राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा इस बाजार से आई इस पहली खबर पर, कि उसने करोड़ों रुपये 'खर्च' करके राज्य के वरुण पटेल और रेशमा पटेल समेत कई पाटीदार नेताओं को अपने पाले में कर लिया है, ठीक से विजयभाव दर्शा और मुस्करा भी नहीं पाई थी कि दो अन्य पाटीदार नेताओं-नरेन्द्र पटेल व निखिल सवाणी-ने उन्हें वोट बैंक समझने और एक करोड़ रुपयों का लालच देने का आरोप लगाकर उससे नाता तोड़ लिया।
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लेकिन अप्रत्याशित होने के बावजूद इस 'खरीद-फरोख्त' में देश की समकालीन राजनीतिक प्रवृत्तियों के लिहाज से कतई कुछ भी नया नजर नहीं आता। आज की तारीख में किसे नहीं मालूम कि कभी हरियाणा से शुरू हुई 'आयाराम गयाराम' की जनविरोधी राजनीति भूमंडलीकरण के पिछले ढाई दशकों में 'राजनीति से पैसा और पैसे से राजनीति' के खुले कारपोरेटी कहें या फर्रुखाबादी खेल तक जा पहुंची है। इस खेल से, जो अब शायद ही किसी को बुरा लगता हो, लोकतंत्र की सुविधाओं के अनुकूलन व इस्तेमाल में महारत हासिल कर चुके वे चतुर सुजान हमारे लोकतंत्र के नियंता बन बैठे हैं, जिनका उसमें खुद का विश्वास तभी तक असंदिग्ध रहता है जब तक वह उनकी सुविधा बना रहे।
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इसी कारण कई प्रेक्षक अब इस सबको कोई अलग बीमारी न मानकर हमारी राजनीति की उस असाध्य होती जा रही महाव्याधि का लक्षण भर मानते हैं, जो उससे आम देशवासियों के रोटी, कपड़ा और मकान की चिंता में जमीन पर घिसटती रहना छुड़वाकर कुछ लोगों की 'दुनिया मुट्ठी में करने' की उड़ान का राकेट बना देने पर तुली हुई है। हम लगातार देख ही रहे हैं कि इस महाव्याधि का जैसे-जैसे इलाज हो रहा है, वह वैसे-वैसे बढ़ती जा रही है।
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याद कीजिए कि अभी इसी साल 2017 की पहली तिमाही में साम्प्रदायिकता के साथ ही जातिवाद से पीड़ित देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की सरगर्मियों के बीच पालाबदल और खरीद-फरोख्त का लगभग ऐसा ही माहौल बना हुआ था। वहां एक राजनीतिक पार्टी की मुखिया द्वारा चुनाव टिकटों की खुल्लमखुल्ला बिक्री के आरोप भी इस खेल का हिस्सा थे। प्रेक्षक गलत नहीं कह रहे कि अब, जब बदली हुई परिस्थितियों में गुजरात में भी उत्तर प्रदेश की ही तरह जातियां बड़ी हो रही हैं और बाकी मुद्दे पीछे छूट रहे हैं, इस मामले में भी उत्तर प्रदेश दोहराया ही जाना था।
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लेकिन कम से कम एक मायने में यह दोहराव उत्तर प्रदेश का विलोम है- उत्तर प्रदेश में यह खेल केन्द्र और देश के ज्यादातर राज्यों में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की दिग्विजय की आंकाक्षाओं को नये पंख लगाने वाला था। इन पंखों के बूते उसने प्रदेश के राजनीतिक प्रवाह को तो अपने पक्ष में किया ही, उसकी सत्ता से अपना लम्बा निर्वासन खत्म करने में भी कामयाब रही। लेकिन गुजरात की स्थिति इसकी उलटी है। वहां उस पर लगाई जा रही खरीद-फरोख्त की तोहमतें, वे सच्ची हों या झूठी, उसकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस की, जो पिछले 22 साल से राज्य की सत्ता से अपना निर्वासन खत्म नहीं कर पा रही, बांछें खिला देने वाली हैं। अगर भाजपा द्वारा 'खरीदे’ जाने वाले लोग बिकने से मनाकर कांग्रेस को अपनी आशाओं का केन्द्र बनाकर उसकी ओर प्रस्थान कर रहे हैं तो इससे कम से कम इतना तो पता चलता ही है कि कांग्रेस ने राज्य के राजनीतिक प्रवाह को अपनी ओर मोड़ लिया है।
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इस सिलसिले में भाजपा की सबसे बड़ी चिंता यह है कि वह समझ नहीं पा रही कि कांग्रेस ने यह चमत्कार किया कैसे? कुछ महीनों पहले तक तो राज्य में सब कुछ भाजपा के पक्ष में जाता दिख रहा था। गत अगस्त में हुए राज्यसभा के बहुचर्चित चुनाव को हालात का टर्निंग प्वाइंट मानें, जैसा कि कई लोग मानते भी हैं, तो उनमें भी भाजपा व कांग्रेस के चाणक्यों क्रमश: अमित शाह व अहमद पटेल के रणनीतिक मुकाबले में साम, दाम, दंड और भेद अपनाती भाजपा शेर की तरह दहाड़ रही थी, जबकि शंकर सिंह वाघेला की बगावत से कोढ़ में खाज झेल रही पहले से ही लस्त-पस्त कांग्रेस को अपने विधायकों को पाला बदलने से रोकना कठिन हो रहा था। वह उन्हें अपने द्वारा शासित कर्नाटक में ले गई तो वहां उन्हें ठहराने वाले रेस्टोरेंट पर केन्द्रीय एजेंसियों के भाजपा प्रायोजित बताये जाने वाले छापे ने भी उसका काम बिगाड़ने में कुछ भी उठा नहीं रखा था। फिर भी हाईवोल्टेज़ ड्रामे के बीच अंतत: बाजी अहमद पटेल के हाथ रही तो यह तो माना गया कि इससे कांग्रेस का मनोबल बढ़ेगा।
लेकिन वह बढ़कर ऐसे उलट-पलट तक जा पहुंचेगा कि आक्रामक भाजपा को रक्षात्मक हो जाना पड़ेगा, यह तो कोई नहीं सोच रहा था।
यह सवाल अभी तक अनुत्तरित है कि यह चमत्कार राज्य की भाजपा सरकार के प्रति अचानक उभर आई एंटी इन्कम्बैंसी के कारण हुआ, 'बदले हुए' राहुल गांधी के कारण या एक न्यूज पोर्टल की उस खबर के चलते, जिसमें भाजपा के चाणक्य अमित शाह के व्यवसायी बेटे पर अनाप-शनाप तरीके से कमाई की पोल खोलने का दावा किया गया और जिससे हुए विश्वसनीयता के नुकसान की भरपाई के लिए पोर्टल पर सौ करोड़ रुपये की मानहानि का दावा किया गया।
जो भी हो, भाजपा की मुश्किल है कि केन्द्र की सत्ता में आने के बाद से उसने विभिन्न राज्यों में अपनी सत्ताकांक्षा के पोषण के लिए ऐसे-ऐसे गर्हित खेल किये हैं कि गुजरात में ऐसी तोहमतों से बचने का उसके पास कोई नैतिक अवलम्ब नहीं है। यह और बात है कि सत्ता की प्रतिद्वंद्विता में उसके साथ कांग्रेस भी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर की उन पंक्तियों को ही सार्थक करती दिख रही है जिनमें उन्होंने बताया था कि हर हाल में जीत ही लक्ष्य हो जाये तो 'विजय छोड़ भावना और कोई न युद्ध में जगती है। तब, जो भी आते विघ्नरूप, हों धर्मशील या सदाचार, एक ही भांति हम करते हैं उनके सिर पै पाद प्रहार।'
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लेकिन सत्ताकांक्षी पार्टियां कुछ भी करें या सोचें, देश और उसके राजनीतिक भविष्य की सोचने वालों के लिए ये पाद-प्रहार तो चिंता का विषय होने ही चाहिए। इसलिए कि इनके बीच हर हाल में जीत की बेहद अस्वस्थ हो चली प्रतिद्वंद्विता में चुनावी अखाड़े के ठीक से सजने से पहले ही जिस तरह चुनाव आयोग तक को अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करना कठिन हो रहा है, उससे लगता नहीं कि अभी यह गिरावट यहीं थम जाने वाली है।
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हां, यह कहने के लिए अब किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है कि अपने अध्यक्ष और साथ ही प्रधानमंत्री के गृह राज्य में भाजपा का नरेन्द्र मोदी या कि अमित शाह के व्यक्तिगत करिश्मे या तथाकथित गुजरात मॉडल के बूते चुनाव जीतने का विश्वास जाता रहा है। वह बना रहता तो उसे यह सब करने की जरूरत ही क्यों कर महसूस होती?


