गुजरात में भाजपा- आगे कुआँ, पीछे खाई लेकिन दोनों ही मोदीजी ने खोदे हैं
गुजरात में भाजपा- आगे कुआँ, पीछे खाई लेकिन दोनों ही मोदीजी ने खोदे हैं
महेंद्र मिश्र
कहते हैं कोई चीज नष्ट होने से पहले एक बार जरूर अपने असल रूप को धारण करती है। इसका एक उदाहरण इंसान भी है जो बूढ़ा होते ही बच्चों जैसी हरकतें करने लगता है। कुछ वैसा ही मामला गुजरात में बीजेपी का दिख रहा है।
विजय रूपानी जी की ताजपोशी के साथ ही संघ-बीजेपी के शासन का एक चरण पूरा हो गया। पटेल नाराज हैं। दलित हत्थे से उखड़े हुए हैं। और मुस्लिम तबके से बैर जगजाहिर है। फिर आखिर बचा कौन? और कौन बनेगा बीजेपी की इस डूबती नैया की पतवार? संकट की इस घड़ी में पार्टी को अपने पुराने सामाजिक आधार वैश्यों की शरण में जाना पड़ा है। इसके साथ ही पार्टी एक बार फिर पुराने जनसंघ की छाया प्रति बनती दिख रही है। हालांकि मुख्यमंत्री चयन के दिन गांधीनगर में चला राजनीतिक ड्रामा बताता है कि वहां न तो सत्ता और सरकार को बचाने की फिक्र थी। न ही आगे बनाने की। बल्कि वह शुद्ध रूप से कुर्सी की लड़ाई थी, जिसमें नेता अपने आदमी की ताजपोशी चाहते थे। अमित शाह किसी भी कीमत पर आनंदीबेन से समझौते के लिए तैयार नहीं थे। आखिर में वही भारी पड़े और उनके आदमी को ही कुर्सी मिली। इन खामियों की जड़ पार्टी के 20 सालों के शासन के दौरान नरेंद्र मोदी के 12 साल की सत्ता और उसकी कार्यशैली में है।
आमतौर पर किसी भी पार्टी के सत्ता में रहते संगठन के साथ-साथ उसके नेता मजबूत होते हैं। लेकिन मोदी के दौर की कहानी बिल्कुल उलट है। सत्ता के साथ मोदी जी जरूर मजबूत हुए। लेकिन दूसरे नेताओं की कीमत पर। वो कटते-छँटते गए और आखिर में बचने वाले बोनसाई हो गए।
केशुभाई पटेल, हरेन पांड्या, शंकर सिंह बघेला समेत जनाधार और साख वाले नेताओं की एक लंबी फेहरिस्त है, जिन्हें बारी-बारी से रास्ते से हटाया गया। और इस प्रक्रिया में मोदी जैसा एक बरगद खड़ा हो गया, जिसके साये में कोई दूसरा ऐसा नेतृत्व नहीं पनप सका, जो स्वतंत्र रूप से काम करे और जिसका अपना कोई जनाधार हो या फिर अलग से उसकी साख बन सके। ....और इस कड़ी में बोनसाई नेताओं की एक पूरी जमात खड़ी हो गई।
किसी एक नेता या फिर और नेताओं के न उभर पाने का ही नतीजा है कि पार्टी को अब नये प्रयोग में जाना पड़ रहा है। आनंदी बेन पटेल का एक प्रयोग नाकाम रहा। पार्टी अब एक दूसरे प्रयोग में जा रही है।
दरअसल गुजरात में मोदी जी ने सांप्रदायिकता को एक नशे में तब्दील कर दिया था। और इसके बने रहने तक प्रदेश के लोग अपना गमो-गुस्सा और पीड़ा सब कुछ भूल गए थे। लेकिन सूबे से मोदी जी का साया क्या हटा हालात बिल्कुल बदल गए। सांप्रदायिकता का पारा नीचे आ गया और समाज के अलग-अलग हिस्सों को अपनी असलियत का भान होना शुरू हुआ।
एक दौर में पटेल समुदाय का खेती-किसानी और लघु उद्योगों में बर्चस्व था, लेकिन सूबे के कारपोरेट विकास की मार सबसे ज्यादा इसी हिस्से पर पड़ी। नतीजतन उनका गुस्सा सड़कों पर फूट पड़ा।
दूसरे सूबों में सत्ता में हिस्सेदारी का दौर देख रहे दलितों को यहां इंसान की जिंदगी भी मयस्सर नहीं थी। अपनी जिंदगी के पशुओं से बदतर होने का अहसास होने पर वह भी पीछे नहीं रहे। और अब इन सबके गुस्से को शांत करना सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। गुजरात बीजेपी की गाड़ी एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गई है जहां आगे कुंआ है तो पीछे खाईं। ऐसे दौर में जबकि सिराजा बिखर रहा है और अंदर की गंदगी बाहर आ रही है। आलाकमान ने एक ऐसे शख्स के कंधे पर जुआठा डाला है जो कई लिहाज से नौसिखिया है।
रूपानी जी पहली बार एमएलए और पहली बार मंत्री बने हैं। प्रशासनिक नाम की चिड़िया से पहली बार उनका वास्ता पड़ेगा। ऐसे नाजुक मौकों पर नेता का अपना जनाधार संबल का काम करता है, लेकिन जैन समुदाय से होने के चलते रूपानी साहब का वह पक्ष भी बेहद कमजोर है। शायद इस चीज को पार्टी भी बखूबी समझ रही है। लिहाजा उसने नितिन पटेल नाम का पुछल्ला लगा दिया है।
कुछ अपवादों को छोड़ दें तो यह शायद पहली बार होगा जिसमें किसी पूर्ण बहुमत वाली पार्टी को अलग से उप मुख्यमंत्री देना पड़ा हो। हालांकि बीजेपी इसके जरिये भले ही पटेलों को संतुष्ट करने का मंसूबा पाली हो। लेकिन गुजरात की राजनीति में पटेलों की हैसियत को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह उनके साथ क्रूर मजाक है। ऐसे में खुशी से ज्यादा पटेल समुदाय में अगर यह नाराजगी का सबब बने तो किसी को अचरज नहीं होना चाहिए। जनता में फिर से अपनी साख को जिंदा करने के लिए पार्टी के पास कारपोरेट रास्ते से पीछे हटने का एक विकल्प हो सकता है। लेकिन सवाल यही है कि क्या सरकार उसके लिए तैयार होगी? क्या वह कारपोरेट प्रभुओं को नाराज कर सकेगी? या फिर उसके पास आखिरी और आजमाया हुआ हथियार सांप्रदायिकता का है। लेकिन सवाल फिर वही होगा कि क्या काठ की हांड़ी फिर चढ़ेगी? 2002 के बाद से साबरमती में बहुत पानी बह गया है। और अगर एकबारगी बीजेपी उस रास्ते पर बढ़ना भी चाहे तो उसके लिए मोदी के स्तर का शातिर नेतृत्व चाहिए। बहरहाल इससे एक बात साफ हो गई है कि गुजरात जैसा माडल कुछ समय और कुछ सालों के लिए तो जरूर हो सकता है लेकिन आखिरी विकल्प कत्तई नहीं। और इसे देश भर में तो कत्तई नहीं दोहराया जा सकता है। क्योंकि देश की आबादी का अनुपात गुजरात के मुकाबले बहुत ज्यादा है। और देश इतना छोटा भी नहीं है कि गुजरात की तरह उसे बंधक बनाया जा सके। न ही पार्टी के भीतर के नेतृत्व को खत्म किया जा सकता है। और न बाहर के विपक्ष को।
हां, इस कड़ी में अगर मोदी साहब सक्षम नेतृत्व को दरकिनार कर बौनों की नई जमात खड़ी करने की कोशिश करेंगे, तो उसका आखरी खमियाजा भी पार्टी को ही भुगतना पड़ेगा।


