गुनगुनी धूप का एक कतरा
गुनगुनी धूप का एक कतरा
अब औरत खिड़की से झाँकेगी नहीं
उसे पूरा खोल देगी
दरवाजों को खुला छोड़
आ जायेगी बाहर |
वह निहारेगी ही नहीं
सूरज, आकाश और बादल
सूरज तापेगी
बादल निचोड़ेगी
आकाश नापेगी
अब खिड़की के बाहर
कतारबद्ध खिले हैं फूल ही फूल
-उर्मिला जैन
कविता संग्रह 'गुनगुनी धूप का एक कतरा' से
इसी संग्रह की कुछ और कवितायें कवियित्री उर्मिला जैन से सुनने और इस पर चर्चा के लिए आप सादर आमंत्रित हैं —
12 जुलाई को 3 बजे , वर्धा केंद्र
इलाहाबाद
कृपया ज़रूर आइये
'किताबनामा' कार्यक्रम में इस बार उर्मिला जैन के कविता संग्रह 'गुनगुनी धूप का एक कतरा' पर चर्चा आयोजित की जा रही है.
उर्मिला जैन लम्बे समय से लेखन कार्य में सक्रिय हैं.
कविताओं के अलावा उनके यात्रा संस्मरण और बहुत ही दिलचस्प अफ्रीकी कहानियों का अनुवाद "अफ्रीका रोड तथा अन्य कहानियां" भी आ चुका है.
मानवाधिकार पर भी उन्होंने लिखा है. वे एक्टिविस्ट के तौर पर भी सक्रिय हैं.
उर्मिला जैन के इस कविता संग्रह पर हो रही चर्चा में रविवार 12 जुलाई को 3 बजे वर्धा केंद्र में आपका स्वागत है.
कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे उर्दू के वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. अकील रिजवी
वक्ता हैं- प्रो.संतोष भदौरिया, प्रो. अनिता गोपेश, डा. अनिल पुष्कर और श्रीरंग
निवेदक- प्रगतिशील लेखक संघ, इलाहाबाद


