चन्द्रशेखर ने तो सोना गिरवी रखा था, उनके परवर्ती शासकों ने देश ही गिरवी रख दिया
चन्द्रशेखर ने तो सोना गिरवी रखा था, उनके परवर्ती शासकों ने देश ही गिरवी रख दिया
आज युवा तुर्क चन्द्रशेखर की जयन्ती थी. उनके व्यक्तित्व-कृतित्व के कई काले-सफ़ेद पहलू हैं. उनमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं. मैं तो सिर्फ एक करण से उनको याद कर रहा हूँ....
1989 में उनके प्रधानमंत्री रहते देश की हालत खस्ता हो गयी थी. उन्होंने देश का सोना गिरवी रखकर तात्कालिक रूप से देश को संकट से निकाला. गिरवी रखना हमारे यहाँ अपमानजनक होता है. लोगों की इसी भावना को भुना कर काँग्रेस पार्टी सत्ता में आयी. राव-मनमोहन की सरकार ने विश्वबैंक-मुद्राकोष के आगे दण्डवत किया. उसके बाद आनेवाली सभी गठबन्धन सरकारों में विदेशी पूँजी के आगे समर्पण करने की होड़ ही लग गयी.
चन्द्रशेखर ने तो सोना गिरवी रखा था, उनके परवर्ती शासकों ने देश ही गिरवी रख दिया. आत्मनिर्भर विकास और आत्मनिर्णय के अधिकार को ही गिरवी रख दिया.
और अब खुलेआम नीलामी की बारी है.
टाटा-बिरला प्लान और नेहरूवादी अर्थतंत्र का अन्तिम पड़ाव था चन्द्रशेखर का अल्पकालिक शासन.
जिस धज से कोई मकतल को गया, वो शान सलामत रहती है....
उसके बाद का दौर घुटना-रगड़ देशभक्ति का दौर है.....
दिगंबर


