चीन के नये सामरिक हथियार-कचरा और पानी
चीन के नये सामरिक हथियार-कचरा और पानी
अरुण तिवारी
कचरा और पानी ऐसे नये सामरिक और दोधारी हथियार हैं, जो मारते भी हैं और बीमार भी करते हैं। ये एक नहीं, अनेक पीढियों को जड़ों से उजाड़ देते हैं। सावधान होने की बात है कि चीन ने भारत के खिलाफ इसका इस्तेमाल शुरु कर दिया है। तिब्बत की धरती बन गई है, इन नये सामरिक हथियारों का नया चीनी अड्डा।
खबर है कि चीन, तिब्बत का इस्तेमाल आणविक हथियारों से उत्पन्न रेडियोधर्मी कचरा फेंकने के लिए कूड़ादान की तरह कर रहा है। न सिर्फ चीन, बल्कि अमेरिका और यूरोप के कई देशों ने भी तिब्बत में आणविक रेडियोधर्मी कचरा फेंकने की छूट हासिल कर ली है। यह कचरा तिब्बत उद्गम वाली नदियों को बुरी तरह प्रदूषित कर रहे हैं। आक्सास, सिंधु, ब्रह्मपुत्र और इरावदी में बहाया रेडियोधर्मी कचरा भारत के उत्तर पूर्व से लेकर बांग्ला देश तक को बीमार करेगा। अपने कई लेखों में मैने पहले भी सतर्क करने की कोशिश की थी कि दुनिया के कई देश विदेशी निवेश के नाम पर भारत में ही ऐसे उद्योगों को स्थापित कर रहे हैं, जो जानलेवा कचरा फैलाते हैं। चीनी खिलौने और ’यूज एंड थ्रो’ श्रेणी के कई सस्ते सामान यही भूमिका निभा रहे हैं। संसद ने चीनी खिलौनों को लेकर तो चिंता की, लेकिन क्या कभी नये सामरिक हथियार के रूप में कचरा और पानी ने संसद को चिंतित किया ?
जागू, जियाचा और जिएंझू - ये ताजा मंजूरी प्राप्त ब्रह्मपुत्र नदी पर चीनी बांध परियोजनाओं के तीन स्थान हैं। ये तीनों स्थान तिब्बत में स्थित हैं। ब्रह्मपुत्र पर चीन 510 मेगावाट की एक जलविद्युत परियोजना पहले से ही खड़ी कर रहा है। कहने को चीनी विदेशी मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस बाबत् कहा था कि मंजूरी पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन के बाद ही दी गई है। उसने यह भी प्रतिक्रिया दी थी कि अंतर्देशीय नदियों के मामले में चीन जिम्मेदारी समझता है। जब चीन ने इन परियोजनाओं के बारे में भारत को जानकारी देना तक जरूरी न समझा, तो बाकी जिम्मेदारी पर कोई कैसे भरोसा कर सकता है ?
सूत्रों के मुताबिक चीन पांच बड़े बांध, 24 छोटे बांध और 11 झीलों के जरिए छह से ज्यादा नदी धाराओं पर अपना कब्जा मजबूत करने में लगा है। उत्तराखण्ड आपदा के अनुभवों के बाद एक बात मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि चीन के मंजूरशुदा बांध भारत का आर्थिक खतरा बढ़ायेंगे। उत्तर-पूर्व की जलविद्युत परियोजनाओं का क्या होगा ? पानी की किल्लत होगी। इससे उत्तर-पूर्व भारत की खेती सूखेगी। अचानक पानी छोड़ने से बाढ़ का खतरा बढ़ेगा। चीन की ऐसी कारगुजारियों का नतीजा लद्दाख की बाढ और किन्नौर की तबाही के रूप में भारत पहले ही झेल चुका है। हालांकि यही काम बांध, बैराज और तटबंध बनाकर भारत ने बांग्ला देश के साथ भी किया है। बांग्ला देश के पर्यावरणविद् इसे लेकर भिन्न मंचों पर अपनी आपत्ति जताते रहे हैं। कल को यही आपत्ति उत्तराखण्ड में बन रहे बांधों को लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल भी उठायेंगे। खैर! इससे भी बङी आपत्ति का मुद्दा बहकर आने वाला रेडियोधर्मी कचरा है। यह धीमा जहर है। इसके नतीजे बेहद खतरनाक होंगे। यह भारत के उत्तर-पूर्व से लेकर बांग्ला देश समेत दक्षिण एशिया के बड़े भूगोल का नाश करेगा। यह पीढ़ियों को बीमार और अपंग बनायेगा। क्या भारत को इसकी चिंता है ?
भारत सरकार अपने बजट में उत्तर-पूर्व और जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए विशेष राशि का प्रावधान करती है। दोनों जगह कानून-व्यवस्था को लेकर अक्सर चिंता जताई जाती है। क्या उसे इस बात की चिंता नहीं होनी चाहिए कि जहर, सूखा और बाढ भेजकर चीन उत्तर-पूर्व के पूरे विकास का शून्य कर देगा। आगे चलकर यह उत्तर-पूर्व में असंतोष और पलायन का नया कारण बनेगा। चीन के ये नये सामरिक हथियार आगे चलकर इस पूरे इलाके में नई आग लगायेंगे। यह भारत, बांग्ला देश और तिब्बत की साझा चिंता व साझे प्रयास का मुद्दा है। चीन ने लद्दाख की कई महत्वपूर्ण वनस्पतियों का पेटेंट करा जैवविविधता पर कब्जे की पहल कर दी है। सरकार सीमावर्ती राज्यों को बचाने की पहल करे।
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