चैनलों के अंदर की दुनिया

आनंद प्रधान

वेतन और सेवाशर्तों से लेकर न्यूजरूम के अंदर के हालात बद से बदतर होते जा रहे
“चैनल में काम करना ईंट भट्ठे पर काम करने जैसा लगता है..या कोयले के इंजन का ड्राइवर जैसे गर्मी में आग के सामने कोयला डालता था, बिना रूके..इस डर से की इंजन बंद हो जाएगा...वैसा ही अनुभव कराता है तथाकथित न्यूज रूम...पत्रकारिता त्याग मांगती है लेकिन ऐसा त्याग क्या कि एक सैनिक बार्डर पर नहीं...बल्कि अपने ही बैरक में गोली का शिकार हो जाए.”
“न्यूजरूम का माहौल: भेड़ बकरी चराने वाले जैसे चीखते हैं ....जानवरों को हांकने में वैसा ही कुछ बॉस चीखते हैं...जैसे चीख कर ही जूनिएर की कान में आवाज पहुंचाई जा सकती हो..क्या चीख चिल्ला कर ही काम किया जा सकता है?...क्या ऐसे अम्बिएंस में काम कर सकना लम्बे समय तक संभव है ?...न्यूज़ रूम और बॉस की नज़र में अपनी ब्रांडिंग करने का सबसे आसान तरीका चीखना चिल्लाना...अधिकांश लोग अपनी जानकारी और लिखने की कला को छोटा समझने लगे है और चीखने चिल्लाने को बड़ा...काश, मैं भी चीख सकता...की भावना आ रही है लोगो में..लगातार न्यूज़ परोसने के दबाव में नाम पर न्यूज़ रूम को टोर्चेर रूम बनाया जा रहा है..”
-एक न्यूज चैनल में कार्यरत युवा रिपोर्टर
“मैं अपने आपको रोज जलील होते देखता हूँ तो लगता है कि शायद सभी को ये सब सहना होता होगा, पर फिर लगता है कि शायद हमने ही पढाई नहीं की होगी..ऐसे ही हमें भर्ती कर लिया गाली सुनने के लिए...मैं अपना विश्वास खो रहा हूँ...शायद ये इलेक्ट्रानिक मीडिया का विनोद कापडी कल्चर है जो कुछ चैनलों के खून में बस चुका है और टी.आर.पी नामक अस्पताल में हमारा इलाज तो संभव नहीं...”
- चैनल छोड़ चुके एक युवा पत्रकार की व्यथा जो उसने मीडिया स्टडीज ग्रुप के सर्वेक्षण के दौरान बता
ये कुछ बानगियाँ हैं जो बताती हैं कि आज न्यूज चैनलों के अंदर काम करनेवाले पत्रकारों की क्या स्थिति है? चैनलों में ऐसी आपबीतियों की कमी नहीं है. आप चैनलों के पत्रकारों से न्यूजरूम के अंदर कामकाज की परिस्थितियों के बारे में पूछिए और सम्भावना यह है कि लगभग ६० से ७५ प्रतिशत टी.वी पत्रकारों से आपको ऐसी ही शिकायतें और आपबीती सुनने को मिले.

इसमें कोई शक नहीं है कि न्यूज चैनलों के बीच गलाकाट प्रतियोगिता के कारण न्यूजरूम के अंदर पत्रकारों पर खासा दबाव और तनाव रहता है लेकिन यह दबाव और तनाव हाल के वर्षों में जिस तरह से बढ़ा है, उसका सीधा असर पत्रकारों के स्वास्थ्य और कामकाज पर भी पड़ रहा है.

हालांकि न्यूज चैनलों के अंदर के इस दमघोंटू माहौल के बारे टी.वी पत्रकारों खासकर युवा पत्रकारों के बीच कानाफूसियाँ बहुत दिनों से होती रही हैं. लेकिन पिछले महीने जब मैंने फेसबुक, गूगल-बज और आई.आई.एम.सी पूर्व छात्र ग्रुप मेल पर टी.वी पत्रकारों से उनके वेतन, सेवाशर्तों और कामकाज की परिस्थितियों के बारे में उनकी राय मांगी तो विभिन्न चैनलों के अनेकों टी.वी पत्रकारों ने लिखित और मौखिक रूप में जो बताया, वह कई मामलों में भयावह और रोंगटे खड़े कर देनेवाला और अधिकांश मामलों में चिंतित और परेशान करनेवाला है. उसकी कुछ बानगियाँ ऊपर दी हैं और जगह की कमी के कारण कई छोड़नी पड़ रही हैं.
असल में, चैनलों के स्क्रीन पर दिखने वाली खबरों, रिपोर्टों और कार्यक्रमों, चैनलों के नजरिये और प्रस्तुति को लेकर जितनी चर्चा होती है, उसका एक प्रतिशत भी चैनलों के अंदर की दुनिया और उसके पत्रकारों की स्थिति पर चर्चा नहीं होती है. जबकि चैनलों के अंदर के माहौल और पत्रकारों के वेतन और अन्य सेवाशर्तों का उनके कामकाज पर सीधा असर पड़ता है.
आखिरकार ये गेटकीपर (पत्रकार) ही चैनलों की व्यापक सम्पादकीय लाइन के तहत रोजाना खबरों के चयन से लेकर उनकी प्रस्तुति का फैसला करते हैं. ऐसे में, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि उनकी मानसिक और शारीरिक स्थिति निश्चित ही उनके कामकाज को प्रभावित करती है.
इसके बावजूद चैनलों के अंदर न्यूजरूम के माहौल और उसमें कार्यरत पत्रकारों के वेतन और सेवाशर्तों को चर्चा के लायक नहीं समझा जाता है. न्यूज मीडिया में इसे लेकर जिस तरह की ख़ामोशी और अनदेखा करने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है, वह काफी हद तक एक तरह की ‘षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी’ है. कुछ चुनिन्दा चैनलों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश चैनलों में पत्रकारों की स्थिति अच्छी नहीं है और उन्हें भारी तनाव और दबाव में काम करना पड़ता है.
वेतन और सेवाशर्तों के मामले में भी स्थिति दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है. खासकर २००८-०९ की आर्थिक मंदी के बाद हुई छंटनियों के कारण काम का बोझ बढ़ता जा रहा है. लेकिन इसपर चर्चा और सुधार के बजाय चैनलों का प्रबंधन यहाँ तक कि कई संपादक भी मौजूदा स्थितियों का बचाव करते और उसे जायज ठहराते दिख जाते हैं.
सच यह है कि न्यूज चैनलों के पत्रकारों के वेतन, भत्तों, सेवाशर्तों आदि में गंभीर विषमताएं और विसंगतियाँ हैं. वेतन और सेवाशर्तों के मामले में कोई एकरूपता या समानता नहीं है. आमतौर पर अंग्रेजी न्यूज चैनलों में पत्रकारों का वेतन और सेवाशर्तें हिंदी और दूसरी भाषाओँ के न्यूज चैनलों की तुलना में बेहतर हैं.
लेकिन ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी न्यूज चैनल में सब कुछ बेहतर ही है. वहां भी काम के घंटों, काम के बोझ और छुट्टियों आदि के मामले में कोई आदर्श स्थिति नहीं है. यही नहीं, कई अंग्रेजी चैनलों खासकर सबसे बडबोले अंग्रेजी चैनल में कामकाज का माहौल बहुत दमघोंटू और तनावपूर्ण है. बात-बात पर गाली-गलौज और अपमानित करने की शिकायतें भी आती रहती हैं.
लेकिन हिंदी न्यूज चैनलों में स्थिति और खराब है. यह सही है कि कुछ बड़े मीडिया समूहों के न्यूज चैनलों में पत्रकारों का वेतन तुलनात्मक रूप में ठीक-ठाक है. लेकिन तथ्य यह भी है कि वेतन वृद्धि के मामले में पिछले दो-ढाई सालों में स्थिति बिगड़ी है. छोटे-बड़े सभी चैनलों ने २००८-०९ की आर्थिक मंदी को बहाना बनाकर न सिर्फ वेतन वृद्धि नहीं की बल्कि बड़े पैमाने पर घोषित-अघोषित छंटनी की और काम का बोझ बढ़ा दिया. ‘स्टाफ रैशनालाइजेशन’ के नाम पर नई भर्तियाँ नहीं हो रही हैं या इक्का-दुक्का भर्तियाँ हो रही हैं. यही नहीं, बड़े और सफल चैनलों में भी निचले और मंझोले स्तर की भर्तियों में वेतन पहले की तुलना में कम हो गया है.
तर्क यह दिया जा रहा है कि न्यूज चैनलों में यह ‘वेतन के रैशनालाइजेशन’ का दौर है. इसके मुताबिक, शुरूआती दौर में टी.वी पत्रकारों खासकर प्रशिक्षित पत्रकारों की कमी के कारण पत्रकारों को प्रिंट मीडिया की तुलना में काफी ऊँची तनख्वाहें मिलीं. उस समय बार्गेनिंग की शक्ति टी.वी पत्रकारों के पक्ष में झुकी हुई थी.
लेकिन प्रबंधकों के अनुसार, यह स्थिति ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकती थी क्योंकि इससे मीडिया उद्योग में वेतन के मामले में एक तरह का ‘डिस्टार्शन’ पैदा हो गया था. कहने की जरूरत नहीं है कि आर्थिक मंदी ने न्यूज चैनलों के मालिकों और प्रबंधकों को इस कथित ‘डिस्टार्शन’ को सुधारने का मौका दे दिया जिसका उन्होंने जमकर फायदा उठाया है.
क्या चैनलों में पत्रकारों के लिए कोई भविष्य है ?

आज अधिकांश न्यूज चैनलों यहाँ तक कि कुछ बड़े न्यूज चैनलों ने भी “कम लोगों और कम वेतन” के माडल को अपना लिया है. इसमें चैनल कम से कम पत्रकारों को रख रहे हैं, उन पर काम का बोझ बढ़ाया जा रहा है, उन्हें कम वेतन दिया जा रहा है और सेवाशर्तें दिन पर दिन बिगड़ती जा रही हैं.
अधिकांश चैनलों में इस माडल के तहत टॉप पर कुछ चुनिन्दा पत्रकारों को ऊँची तनख्वाहें दी जा रही है जबकि निचले और मंझोले स्तर पर कम से कम वेतन दिया जा रहा है. खासकर निचले स्तर पर वेतन बहुत कम है जबकि सबसे अधिक काम उनसे ही लिया जाता है. यही नहीं, रिपोर्टिंग के लिए फील्ड वीजिट आदि पर भी खर्चों में काफी कटौती की गई है
हालत कितनी खराब है, इसका अंदाज़ा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि कई चैनलों खासकर ई.टी.वी माडल के चैनलों और ए.एन.आई मार्का न्यूज एजेंसियों में पत्रकारों का वेतन एंट्री लेवल पर पांच हजार से लेकर ८ हजार तक है. यही नहीं, उनसे तीन साल का बांड भरवाया जाता है. उन्हें नियुक्तिपत्र नहीं दिया जाता. छुट्टियाँ नहीं मिलती हैं. छुट्टियाँ खासकर बीमारी आदि कारण लंबी छुट्टी का मतलब नौकरी से छुट्टी है.
आमतौर पर न्यूनतम १० घंटे और अधिकतम १४-१५ घंटे तक काम करवाया जाता है. समय पर वेतन मिलता नहीं है. पी.एफ आदि नहीं कटता है. मेडिकल आदि की सुविधा नहीं है. कैंटीन में ढंग का खाना नहीं मिलता. नतीजा, अधिकांश पत्रकारों को गंभीर बीमारियाँ जकड़ लेती हैं.
असल में, चैनलों में लगभग सौ फीसदी नियुक्तियां कांट्रेक्ट यानि ठेके पर होती हैं. इस तरह उनकी नौकरी की कोई सुरक्षा नहीं है. चैनलों के कर्मियों के लिए अख़बारों की तरह कोई वेतन आयोग नहीं है और न ही वहां नियुक्तियां श्रमजीवी पत्रकार कानून के तहत होती हैं. इस मामले में टी.वी पत्रकारों को वे सीमित कानूनी अधिकार भी हासिल नहीं हैं जो अख़बारों और न्यूज एजेंसियों के पत्रकारों को प्राप्त हैं.
हालांकि अब धीरे-धीरे अख़बारों में भी अधिकांश नियुक्तियां ठेके पर होने लगी हैं लेकिन अभी भी कई संस्थानों में श्रमजीवी पत्रकार कानून और वेतन आयोग लागू है और वहां पत्रकारों को कुछ हद तक जाब सेक्युरिटी है. लेकिन चैनलों में कोई जाब सेक्युरिटी नहीं है. आश्चर्य नहीं कि ढाई साल पहले कई छोटे-बड़े चैनलों ने एक झटके में सैकड़ों लोगों की छंटनी कर दी थी.
जाहिर है कि इस सबका असर न्यूज चैनलों के कंटेंट पर भी दिख रहा है. खासकर हिंदी चैनलों में जहाँ न सिर्फ रिपोर्टिंग का दायरा घटता जा रहा है बल्कि उसका स्केल भी कम होता जा रहा है, प्रोग्रामिंग खासकर डेस्क पर तैयार कार्यक्रमों पर जोर बढ़ता जा रहा है. नतीजा, सबके सामने है. कार्यक्रमों के नाम पर सिनेमा, क्रिकेट और भूत-पिशाच, अजब-गजब और नाग-नागिन का बोलबाला है.
इसी तरह, रिपोर्टिंग क्राईम और प्रेस कांफ्रेंस आदि तक सीमित हो गई है. अधिकांश राज्यों में न्यूज चैनलों ने अपने ब्यूरो आदि बंद कर दिए हैं. चैनल अप्रशिक्षित स्ट्रिंगरों के भरोसे चल रहे हैं जो खुद भी मामूली भुगतान के कारण भांति-भांति के धंधे करने को मजबूर हैं.
यही नहीं, सेवाशर्तों और कामकाज के माहौल के मामले में बड़े और छोटे चैनलों में कोई खास फर्क नहीं है. सच यह है कि चैनलों के अंदर जूनियर सहकर्मियों से गाली-गलौज की भाषा में बात करने और बात-बात पर उनका अपमान करने की सामंती संस्कृति बड़े हिंदी चैनलों से ही शुरू हुई और देखते-देखते हर जगह छा गई.
आज इस मामले में कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश चैनलों में न्यूजरूम में गैर जरूरी शोर-शराबा, हंगामा और चीख-चिल्लाहट आम बात हो गई है. कई संपादक आतंक के प्रतीक बन चुके हैं. उनकी ‘प्रोफेशनल ख्याति’ पीछे छूट चुकी है और न्यूजरूम में डराने-धमकाने और बदतमीजी में उनकी शोहरत हर ओर फ़ैल चुकी है.
जैसे इतना ही काफी न हो, चैनलों के भीतर अंदरूनी गुटबाजी, खींचतान और उठापटक भी खूब है. संपादकों यानि बॉस की लल्लो-चप्पो के आगे कई बार काम और काबिलियत बेमानी हो जाते हैं. खासकर हिंदी न्यूज चैनलों में स्थिति बहुत खराब है. संपादकों के ‘अपने गैंग बन चुके हैं.’ वे एक साथ एक चैनल से दूसरे चैनल में जाते हैं. इस कारण किसी टी.वी पत्रकार के लिए बॉस की स्वामीभक्ति उसका सबसे बड़ा गुण बन चुका है.
आश्चर्य नहीं कि न्यूजरूम की इस हिंसक और लिजलिजेपन की संस्कृति में कई संवेदनशील पत्रकार खुद को अनफिट महसूस करने लगे हैं. मैं खुद ऐसे कई टी.वी पत्रकारों को जानता हूँ जिन्होंने न्यूज चैनलों की स्थितियों से परेशान और हताश होकर टी.वी पत्रकारिता छोड़ दी और कुछ ने पत्रकारिता ही छोड़ दी.
महिला पत्रकारों की स्थिति और खराब है. उनसे भी पुरुषों की ही तरह बल्कि खुद को साबित करने के लिए उनसे अधिक काम करने की अपेक्षा की जाती है. उन्हें अलग से कोई सुविधा नहीं दी जाती है. यहाँ तक कि उनके लिए कानूनन जरूरी प्रावधानों का भी ध्यान नहीं रखा जाता है.
यौन उत्पीड़न की शिकायतों के बावजूद अधिकांश चैनलों में इसके लिए अलग से कोई सेल नहीं बनाया गया है. उन्हें रात्रि या भोर की पाली में कई बार पिक अप की सुविधा नहीं मिलती है. इस कारण, एक बड़े अंग्रेजी चैनल की महिला पत्रकार सौम्या विश्वनाथन की रात में अकेले घर लौटते हुए हत्या तक हो गई.
'कथादेश' के अगस्त में प्रकाशित