जनता को पता था विकास का रास्ता श्मशान जा कर ही ख़त्म होता है
जनता को पता था विकास का रास्ता श्मशान जा कर ही ख़त्म होता है
अनिल यादव
उत्तर प्रदेश के चुनाव में सबसे ज्यादा हो-हल्ला विकास था। सारे नेता और वोटर विकासमय थे। कोई पार्टी का नेता हो या वोटर यह पूछने पर कि किस मुद्दे पर वोट दिया जा रहा है फट से जबाब मिल जाता कि विकास पर। लेकिन विकास पर जैसे ही बात होती तस्वीर बदल जाती।हालाँकि नेताओं ने विकास से श्मशान तक आने में थोड़ी देर जरुर की थी पर जनता उससे पहले यह रास्ता नाप चुकी थी या कहा जाये कि जनता को पता था कि विकास का रास्ता श्मशान पर ही जा कर ख़त्म होता है। तो वह तैयार थी।
खैर विकास की कहानी किसी और कड़ी में। अभी बात मुसलमान वोटर की करते हैं जिनको लेकर चुनाव के पहले विकास जितना ही हो- हल्ला था। शायद हममें से कोई सोचा हो कि चुनाव को लेकर मुसलमान क्या सोच रहा था। उनका एजेंडा क्या था ?
कहानी की शुरुआत करते हैं मुरादाबाद के कांठ विधान सभा से।
राजेन्द्र कौशिक गाँव में लोगों का पता बताने के बाद अपने पास बैठा लेते हैं और घर में से अपने बेटे अनुराग को बुलाते हैं।
अनुराग एमबीए कर चुके हैं लेकिन बेरोजगार हैं।
बातचीत खेतीबारी से शुरू होती है और मनरेगा और खाद्य सुरक्षा बिल पर अटक जाती है – क्या बात करतें है आप मन बढ़ गया है बस समझ जाईये। एक लाइन में। पास में ही सैफी मुसलमानों का घर है। पहले एक बुलाओ तीन आते थे अब तो कोटे का चावल बेचकर बासमती खरीद कर खा रहे हैं। इनके बच्चे जो गन्ने की छिलाई और लदाई करते थे अब सलमान खान बने घूम रहे हैं।
फिर वो इस देश में न दिखी तमाम सरहदों की बात करने लगते हैं, जिसको समाज ने अपने तरीके से बना रखा है।
अनुराग बात को आगे बढ़ाते हैं – पास ही गाँव है हसनपुर। आप शाम के पांच बजे के बाद नहीं जा सकते हैं वहां। जायेंगे तो वापस तो उसी हाल में नही आ पायेगें। पाकिस्तान है पूरा।
खैर यह संयोग ही था कि हमको उस गाँव में भी जाना था, जिसकी बात अनुराग बता रहे थे।
कहने को तो हसनपुर गाँव शेखों का था पर हालत बंजारों जैसा। हक़ीकत यह थी कि हसनपुर कभी गाँव था जिसको 15 -16 साल पहले रामगंगा ने अपनी गोद में समा लिया था। तब से गाँव बस नहीं पाया जैसा वो पहले था। ना नाली है ना खड़ंजा। बिजली का नामो -निशान नही।
गाँव के बुजुर्ग गाड़ी से उतरते ही टकरा जाते हैं। किस पार्टी से आये हैं? पतंग वाली से तो नही हैं न ?
नहीं चचा हम किसी पार्टी से नही हैं।
बातचीत शुरू हो जाती है- देखिये हमको कुछ नही चाहिए। बस सुकून चाहिए। 15 साल पहले गाँव बर्बाद हो गया तब फैजुल्लाह चौधरी ने मदद की थी रोटी-कपड़ा सब दिया था लेकिन वोट नही दूंगा उनकी पार्टी को दूसरी पार्टी से आते तो सोचता जरुर। उनके सदर हैदराबाद से कल आयेगें कांठ में तकरीर करेंगे और चले जायेंगे हमको तो यही रहना है।
शरीफ चाचा बिलकुल खलिहर थे तो जल्दी ही बातचीत खत्म करके आगे निकल गया पर कोई मिला नही जो कुछ खास बता सके। तो फिर से वापस आना पड़ा वही। पूरा मजमा लगा था शरीफ चाचा के पास। गिनकर 7 लोग थे जो 70 साल के शरीफ को समझा रहे थे कि वोट तो पंतग पर ही देना है। पास जाना मुनासिब नही समझा गया दूर से समझने की कोशिश करने लगे।
शरीफ भड़क गए थे बिलकुल- अरे काहे आग लगा रहे हो, रिश्तेदार हो तो क्या हुआ। मैं तो कभी नहीं गया वोट मांगने कि सायकिल को दे दो। मुंह उठाये चले आए चार लोगों को लेकर। देश का मुसलमान कांग्रेस के साथ था, मुस्लिम लीग के साथ नहीं। समझ नहीं पाओ तुम, दुनिया तो देखी नही तुमने बस चले आए माइक बांधकर –चली रे पतंग चली रे बादलों के पार चली रे। पहले हैदराबाद में सरकार बना लो फिर आना।
खैर पीपलसाना गांव के रहने वाले अज़ीज़ुल हसन 78 साल के हैं, पास ही की मस्जिद में इमाम हैं। चुनाव की बात शुरू करने पर तुरंत बोल देते हैं कि भाई मुसलमानों से क्यों पूछ रहे हो की किसको दे रहे हैं। मुसलमान है तो समझो कि सायकिल या नल।
उनकी प्राथमिकता जानने की कोशिश की जाती है तो वो नल यानि कि रालोद को वोट करने की बात करते हैं। जिसका कारण है कि उनका परिवार पहले से विधायक रहा है और उनके मुताबिक - यह तो समाज के इज्जत का सवाल है इसलिये दिया जा रहा है।
पास की चाय वाले दुकान के 29 साल के शमीम थोड़ा नाराज हो जातें हैं- देखिये वोट तो हम अखिलेश को ही देंगे। बहुत दिन से इज्जत और सम्मान के नाम पर वोट दे रहे हैं। इस बार तो विकास के नाम पर वोट दिया जायेगा अखिलेश को।
विकास का मतलब पूछ लेने पर शमीम साहब गुस्सा हो जाते है। अरे विकास आप ही बता दो। फिर वो आगे बताते हैं - सड़क,बिजली और पानी और क्या विकास पहाड़ है।
बातचीत आगे जारी रहती है।
शमीम से सवाल किया जाता है कि लेकिन आपके पास में ही तो मुजफ्फरनगर हुआ उसका जिम्मेदार और आरक्षण के वादे का क्या हुआ ?
शमीम अपना काउंटर छोड़कर पास आ जातें है गुस्से में आप मीडिया से हैं क्या ? चलिए आईकार्ड दिखाईये। शुरू से ही अखिलेश के खिलाफ सवाल पूछे जा रहे हैं। जब इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का 2012 के एमए का आईकार्ड दिखता हूँ तो शमीम का गुस्सा शांत हो जाता है और गुस्सा थोड़ा शिकायत और झुंझलाहट में बदल जाता है।
वो कहतें हैं -अरे जब आप जाति के होकर ऐसा सवाल करेंगे तो और लोग क्या बोलेंगें।
भारत में मुसलमानों को मुसलमान मत बोलिये। लाचार बोलिये
अजीजुल हसन से अगला सवाल सवाल यह किया जाता है कि अगर सपा को वोट नहीं कर पाए तो फिर क्या ? किस पार्टी को?
अजीजुल हसन लंबी साँस लेते हुए फिर वही पुराना घर कांगेस को देते। लेकिन आप को याद होगा कि कांग्रेस के शासन में मुरादाबाद ने क्या-क्या देखा है?
सवाल पर अजीजुल हसन फफककर रो पड़ते हैं और नपे -तुले शब्दों जबाब देते हैं- भारत में मुसलमानों को मुसलमान मत बोलिये। लाचार बोलिये। आप ही बता दो किसे वोट दें भाजपा को तो देंगे नहीं, कांग्रेस का हाल आप जान ही रहे हैं। खुलेआम गोली चली 80 में ईद के दिन कांग्रेस के शासन में। जब भी ईद आती है तो मंजर साफ़-साफ़ दिखने लगता है। कुछ हुआ पुलिस वालों के खिलाफ।
अजीजुल हसन अपने आंसुओं की कोशिश करते है। लेकिन यह सारे सवाल आखिर चुनाव में पूछते क्यों नही ? इस सवाल पर अजीजुल हसन थोड़ा तल्ख मिजाज से जबाब देतें हैं। आप ही बता दो सवाल करें किससे?
खैर तीसरी कहानी कोरबाकू गांव की है।
गांव के किराने की दुकान पर शाह आलम के साथ नौजवानों की पूरी टीम बैठी हुई थी। शाह आलम शेख जाति से आते हैं। गांव के लड़कों के हीरो हैं, कारण है कि उनके पास किस्सों और शेरो का अम्बार है।
खैर सवाल पास की वाल राइटिंग से शुरू होता हैं जिस पर "इरादे हैं मजबूत, हैदराबाद है सबूत।" तो ओबैसी को वोट दिया जा रहा है ?
शाह आलम साहब मुस्कुरा देतें हैं और अपने अंदाज में बातें शुरू करते हैं।
कल कुछ लड़के आये थे मीम के। आते ही अपनी कयादत की दुहाई देने लगे- ताऊ मुसलमानों का नेता आगे आया है समर्थन करिये।
शाह आलम आगे बताते हैं कि हमने भी समझ दिया - लो जी कर लो बात ओवैसी साहब मुसलमानों के नेता बन गए और मोदी हिंदुओं के, तो अब देश से निकलवा कर ही दम लोगे तुम सब।
एक तरफ मुसलमान ओवैसी को अपने डर -भय और समझदारी से नकार रहे थे वहीँ दूसरी तरफ का खेल ही कुछ दूसरा था।
मुरादाबाद शहर का आवास विकास की कालोनी में हमारे सहकर्मी तबरेज अपना अनुभव बताते हैं कि वह रामशरण शर्मा से हिन्दू- मुस्लिम भाईचारे पर सवाल करते हैं तो जबाब मिलता है कैसा भाई? मुसलमान कब भाई बन गया?
चुनावी राजनीति ने अगर किसी समुदाय को राजनीति - सामाजिक तौर पर मजबूत किया है तो इसमें भी शक नही कि उसने मुसलमानों को हाशिये पर धकेलने की साजिश भी रची है।
(शेष आगे जारी है।।।।)


