जनता सड़कों पर क्यों नहीं उतर रही इतने कष्ट सह कर भी?
जनता सड़कों पर क्यों नहीं उतर रही इतने कष्ट सह कर भी?
जनता सड़कों पर क्यों नहीं उतर रही इतने कष्ट सह कर भी?
आलोक वाजपेयी
जनता सड़कों पर क्यों नहीं उतर रही इतने कष्ट सह कर भी?
कुछ मित्र ये सवाल उठा रहे हैं जो वाजिब भी है।
मेरा जवाब।
जनता को मोदी राज से तमाम उम्मीदें थीं। उम्मीदें टूट रही हैं। फिर भी अभी जनता भ्रमित है, क्योंकि आरएसएस भाजपा की सोच उसके जेहन में गहरी गर्द की तरह जमा है।
यह गर्द मुस्लिम विरोध की है, अंध राष्ट्रवाद(हिंदुत्व वर्चस्व) की है। यह गर्द समाज को अवैज्ञानिक सोच व कट्टरपन से समझने की है।
जब कोई समाज किसी विचार सोच से प्रभावित होता है तो उस विचारधारा के फलने-फूलने के लिए वो तकलीफ यातना दुःख भी सहने को तैयार हो जाती है।
समाज को साम्प्रदायिकता के खतरों से आगाह करने और उसे उदार सोच का समाज बनाने के लिए बहुत गहरे व् विस्तृत सामाजिक कार्य की जरूरत होती है। भारत में यह काम धर्म निरपेक्ष दलों व बुद्धिजीवियों ने बहुत हल्के ढंग से ही किया है।
कुछ राजनेता व् बुद्धिजीवी जरूर रहे जिंन्होंने निडर होकर इस दिशा में भरपूर काम किया, लेकिन समय रहते उनकी बातों पर जरुरी ध्यान न दिया गया। सब अवसरवाद के चलते साम्प्रदायिकता से समझौता मूलक रुख ही बनाये रहे। वो सोचते रहे कि साम्प्रदायिकता कभी भारत की मूल समस्या बन ही नहीं सकती।
तो जनता के बीच में व्यापक पैमाने पर साम्प्रदायिकता विरोधी कार्य हुआ ही नही।
देश के सौभाग्य से नोटबंदी ने यह ऐतिहासिक अवसर दिया है जिससे हम जनता को यह समझा सकते हैं कि फिरकापरस्ती में फंसने का कितना दुष्परिणाम हो सकता है।
धैर्य रखना होगा।
कहावत है जो फसल बोई न हो उसे काटेंगे कैसे।
पहली बार इस देश में आरएसएस भाजपा के मूल विरोध की फसल सामूहिक प्रयासों से बोई जा रही है, परिणाम जल्द ही मिलेगा। बस थकिये मत।


