जब 2002 में किसी ने इस्तीफ़ा नहीं दिया था, तो 2015 में कोई क्यों इस्तीफ़ा दे ?
जब 2002 में किसी ने इस्तीफ़ा नहीं दिया था, तो 2015 में कोई क्यों इस्तीफ़ा दे ?
जब 2002 में किसी ने इस्तीफ़ा नहीं दिया था, तो 2015 में कोई क्यों इस्तीफ़ा दे ?
कुछ तो नया ज़रूर है। सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे, स्मृति ईरानी और पंकजा मुंडे - चारों महिलायें हैं।
इसे संघी महिला सशक्तीकरण कहा जा सकता है।
स्मृति ईरानी की बात अलग है। हां, वो थोड़ी सी अलग बात है। लेकिन सुषमा और वसुंधरा के हटने से तो साहेब को ख़ुशी ही होनी चाहिये। फिर क्यों दांत पीसकर उनका ऐसा समर्थन ?
वजह है संघ का प्रचंड दबाव।
क्या सुषमा या वसुंधरा संघ की चहेती हो गई हैं ?
बिल्कुल नहीं।
लेकिन संघ को पता है कि इनके हटने से भाजपा का चुनावी राजनीतिक आधार और घट जाएगा। एक दक्षिणपंथी पार्टी में धुर दक्षिण को नाराज़ करने का जोखिम तो उठाया जा सकता है, लेकिन जो थोड़ा मध्यमार्गी हैं, उनका हटना खेमे को बेहद कमज़ोर कर देता है। हां, संघ को मोदी बर्चस्व के तले ख़ामोश नेताओं से चिंता है। ख़ासकर, जब मोदी लहर अब ढलान पर है।
यानी, अब तक के सबूतों के आधार पर तीनों महिलाओं का भविष्य सुरक्षित है।
ये कांग्रेसी भी अजीब हैं ! क्यों देगी वो इस्तीफ़ा ? जब 2002 में किसी ने इस्तीफ़ा नहीं दिया था, तो 2015 में कोई क्यों इस्तीफ़ा दे ?
उज्ज्वल भट्टाचार्या


