अंशुमाली रस्तोगी

नजरिया प्यार का कोई'एक दिन' नहीं होता। प्यार हर दिन, हर पल और हर एहसास में खास होता है। प्यार को जितना जरूरी महसूस करना है, उतनी ही जरूरी है उसकी अभिव्यक्ति भी। अभिव्यक्ति अपने एहसास की। अपने भाव की। अपने विश्वास की। प्यार का यह सफर एहसास, भाव और विश्वास के दम पर ही तय होता है। जहां प्यार होता है, वहां गुंजाइश भी होती है।

कहते हैं कि प्यार खुद

-ब-खुद हो जाता है। कहीं भी। किसी से भी। कैसे भी। प्यार न वक्त देखता है न मौसम। क्योंकि प्यार के जीवंत एहसास से गुजरते हुए हर वक्त अपना और हर मौसम रंगीन-सा नजर आता है। एक अजीब तरह की कशिश दिल को हर पल यूंही दीवाना-मस्ताना बनाए रखती है। प्यार का होना और उस होने को साधना, जो निभा ले जाते हैं, उन्हें मंजिल मिल जाती है। मगर जो होने न होने के फेरे में ही उलझे रहती हैं, उन्हें न मंजिल मिलती है न किसी का दिल। उनके दिल का तब गालिब ही एक मात्र सहारा होते हैं, दिल बहलाने का।भला उस पहले वैलेंटाइन डे को कैसे भूलाया जा सकता है

, जो आज भी गाहे-बगाहे मेरी स्मृतियों में उतर आता है। लड़कपन का वो वैलेंडाइन डे आज की अक्लदारी से कहीं अधिक खूबसूरत था। तब न वैलेंडाइन को जानता था, न इस डे का कोई खास अता-पता ही था। बस, किसी से कहते हुए सुन लिया था कि अगर किसी अपने (प्यार) को प्रपोज करना है, तो वैलेंटाइन से बेहतर कोई दिन नहीं हो सकता। तो किया था हमने भी एक अपने को प्रपोज मगर उस प्रपोजल का जो हश्र हुआ, उस पर आज भी अक्सर हंसी आती है। एक हाथ का बनाया हुआ कार्ड दिया था, यह लिखकर कि 'तुम मुझे अच्छी लगती हो। क्या मेरे प्यार को स्वीकार करोगी।' पर, क्या मालूम था कि उसे न मुझमें कोई दिलचस्पी थी, न मेरे प्यार में। उसकी निगाह में तो कोई और ही था 'दिलचस्प प्यार'। जब उसकी निगाह की इस हकीकत से सामना हुआ, तब बुरा तो बहुत लगा था, मगर खुद को संभाल इस उम्मीद पर लिया था कि 'तू नहीं तो कोई और सही'। लेकिन आज भी उस पहले प्रपोजल को सोचते हुए खुद पर बस हंसी ही आती है। यह हंसी आज भी मुझे जरूरी सी लगती है। चलो, उस पहले प्यार के बहाने प्यार के एहसास से आमना-सामना तो हुआ, यही काफी था।दरअसल

, हमने वैलेंटाइन डे को दिवस के दायरों में सीमित कर दिया है। बाजार ने इसमें अपनी पूरी घुसपैठ जमा ली है। अब वैलेंटाइन डे पर प्यार मिलता हो या न मिलता हो, पर कंपनियों की तरफ से तरह-तरह के कंसेश्न जरूर मिलते हैं। उनके प्यार को बनाए रखने के लिए 'कुछ मीठा हो जाए' का एहसास जगाए रखना ज्यादा जरूरी हो गया है। एक खूबसूरत पैकिंग में बंद मीठा एहसास।बदलते समय के साथ

-साथ प्यार के मायने और रंग-ढंग भी बदल गए हैं। पहले प्यार में ठहराव था, आज के प्यार में तेजी बहुत है। यहां अदला-बदली की रफ्तार भी बहुत तेज है। यह रापचिक प्यार है। प्यार तकनीकी हो चला है। कुछ के लिए फेसबुक सहारा है, तो कुछ के लिए जी-टॉक। मोबाइल और एसएमएस की राह चलते प्यार को समझना और पकड़ पाना भी बहुत मुश्किल सा हो गया है।यह

21वीं सदी का हाईटेक प्यार है। यहां क्षणभर में बहुत कुछ बदल जाता है। इसलिए पुराने लोगों को आज की युवा पीढ़ी के प्यार के बीच पहले जैसी रूमानियत नजर नहीं आती। यह पीढ़ियों का अंतर है। यह अंतर यूंही बना रहेगा। जिसने समय के हिसाब से अपनी सोच की किताब को दुरुस्त कर लिया, बस वो ही यहां टिक सकता है। वरना रोइए जार-जार क्या, कीजिए हाय-हाय क्यों।फिलहाल

, प्यार की अपनी ही भाषा है। समय अवश्य बदल सकता है, परंतु प्यार की भाषा जो है, जैसी है, रहेगी वही। ठीक सात सुरों के मानिंद।
शुभकामनाओं सहित

अंशुमाली रस्तोगी
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