अशोक गुप्ता

अगर हम अपने समय की विविध घटनाओं और उन पर हुए वैधानिक, संवैधानिक निर्णयों पर बिना उत्तेजित हुए गौर करें तो पाएंगे कि लोकतंत्र के परिभाषागत परिवेश में कोई भी सत्ता किसी भी ऐसी संस्था या व्यक्ति को, उसके साक्षात अपराधी होने के बावज़ूद, दण्डित नहीं कर सकती, जिसके पास किसी भी ढब जुटाए हुए बहुमत की पूंजी है। ऐसी स्थिति में व्यवस्था को, हर हालत में ऐसे तर्क, कारण और सच्चे झूठे साक्ष्य सामने रखने ही होंगे जिनके आधार पर वह व्यक्ति या संस्था दण्ड से बचाई जा सके।

इस संदर्भ में ताज़ा उदाहरण लें। आसाराम बापू के हाथ में हिंदू भक्तों का महाजनमत है। ऐसे में भाजपा की यह मजबूरी है कि वह आसाराम बापू का कवच बने। इन असंख्य भक्तों में सभी भाजपा समर्थक ही हों, यह ज़रूरी नहीं है। ऐसे में कॉंग्रेस भी उन्हें नाराज करने का जोखिम नहीं उठा सकती। देखिये, उमा भारती तुरन्त आसाराम जी की ढाल बन कर आ गयीं। किस आधार पर यह प्रश्न टेढा ज़रूर है लेकिन राजनैतिक शातिरों के पास इस प्रश्न का उत्तर ज़रूर होगा, खासतौर पर तब, जब उन्हें पता है कि इस मुद्दे को कॉंग्रेस भी सिर्फ फूं-फां ही करेगी, उससे ज्यादा कुछ नहीं।

बताया जा रहा है कि पुलिस आसाराम जी से पूछताछ करने अमदाबाद जायेगी। मतलब कि आसाराम जी पहले ही अपने ‘कंफर्ट ज़ोन’ में पहुँच गये हैं। स्थिति स्पष्ट है।

यहाँ एक जिज्ञासा यह भी हो सकती है कि जब चुनाव सिर पर हैं, तब आसाराम बापू को ऐसी किसी हरकत से बचना चाहिये था। उन्होंने क्यों राजनैतिक पार्टियों के सामने नैतिक संकट खड़ा किया। यह भी समझा जा सकता है कि यह भुखमरी की स्थिति में किसी दुकान से लोफ़ ( ब्रेड) चुरा कर भागने का मामला नहीं है। ऐसे में आसाराम बापू का यह कांड संशय खड़े करता है। इसका उत्तर भी सामने है। आसाराम बापू को यह घोषित है कि अगर नरेन्द्र मोदी ‘किंग’ बनते हैं तो ‘किंग मेकर’ वह ही हैं। यह सन्देश भाजपा के अतिरिक्त कॉंग्रेस को भी है क्योंकि नौकरशाही में भी उनके हाथ बिके हुए लोगों की गिनती कम नहीं है। ऐसे में यह ज़रूरी था कि राजनैतिक दलों को यह चेता दिया जाय कि उनके खाते में जाने वाले जनमत का बड़ा अनुपात आसाराम बापू और उनके दूसरे पर्यायवाचियों की मुट्ठी में है। अतः, आसाराम बापू का यह कांड, चाहे सच्चा है यह झूठा, उसका सन्देश यही है, और बड़ी राजनैतिक पार्टियों के लिये है।

मेरा अनुभव कहता है, ( मैं भगवान से प्रार्थना करता हूँ कि वह गलत निकले ) कि आसाराम बापू तक कानून का कोई शिकंजा नहीं पहुंचेगा। उसके पहले ही वह तर्क सामने आ जाएंगे जिनके आधार पर वह बिना गिरफ्तार हुए, बिना अदालत का सामने किये, क्लीन चिट पा जायेंगे।

ऐसे में ‘इसके, उसके’ कृत्य की निंदा करना लोकतंत्र रूपी पेड़ के कीड़ा खाए पत्तों को तोड़ फेंकने का जतन होगा। यहाँ ज़रूरत है लोकतंत्र के सद्य स्वरूप को, संविधान को फिर से गढ़ने की। यह काम एक बड़े प्रोजेक्ट जैसा है, बिल्ली के गले में घंटी बाँधने जैसा....