जाति और वर्ग तोड़े बिना भारत में मानव मुक्ति संभव नहीं – नाट्यकर्मी सैमुएल जॉन
जाति और वर्ग तोड़े बिना भारत में मानव मुक्ति संभव नहीं – नाट्यकर्मी सैमुएल जॉन
पिछले दो दशकों से अधिक पंजाब के दलित, सफाई कर्मी, छोटे किसान, ठेके पर जमीन जोतने वाले भूमिहीन किसानों के प्रश्नों पर सशक्त नाटकों की प्रस्तुति देने वाली आवाज आज सात समुन्दर पार कनाडा के ब्राम्पटन में गूँजी. सैमुएल जॉन, भारतीय पंजाब में रंगमंच के फलक पर एक नायाब हैसियत रखते हैं, उनके प्रशंसकों के प्रयासों ने उन्हें कनैडा में आमंत्रित कर अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन की दावत दी है. सबसे पहले उनका आगमन पश्चिमी कनाडा के शहर वेंकूवर में हुआ, जहाँ वह अपने कई नाटकों की प्रस्तुतियों से उपस्थित जनता को मंत्रमुग्ध कर चुके हैं. उत्तर अमेरिका तर्कशील सोसाइटी ब्राम्पटन द्वारा उनके सम्मान में आज वरसैल्लेस कन्वेंशन सेंटर में एक समारोह का आयोजन किया.
दर्जे नौ में पढ़ने के दौरान सैमुएल जॉन ने एक नाटक देखा, जिसमें एक अफसर अपने मातहत चपरासी के सामने भरी प्लेट अण्डों की खाता है और वह बार-बार साहब को याद दिलाता है कि अंडे बड़े स्वादिष्ट होंगे। अफसर प्लेट खाली करने के बाद चपरासी को उठाने के लिए कहता है जिसे वह निर्दिष्ट स्थान पर रख तो देता है, लेकिन प्लेट को चाट लेता है. उक्त दृश्य की वेदना ने पहली बार बालक सैमुएल जॉन के भीतर सुप्त पड़े कलाकार को झिंझोड़ा था. नाटक देखने का चाव उन्हें नाटक मंडली के आस पास तक ले गया।
4-5 साल तक मंडली चाकरी के बाद उन्हें पहला मौका कैसे मिला, यह बताते हुए सैमुएल जॉन कहते हैं कि किसी नाटक की रिहर्सल चल रही थी, डायरेक्टर अपने कलाकार की संवाद अदायगी से संतुष्ट नहीं था और पूरी तरह खिन्न हो चुका था, मौके की नजाकत देखते हुए उन्होंने अपनी फरमाइश पेश कर दी. डायरेक्टर ने पहले कुछ देर उन्हें देखा, कुछ सोचा फिर स्टेज पर जाने की इज़ाज़त दे दी और सैमुएल जॉन ने पहले ही प्रयास में अपने डायरेक्टर को वह दे दिया जिसकी उसे तलाश थी. तब से जो सफ़र शुरू हुआ वह अब तक थमा नहीं. यूनिवर्सिटी की पढ़ाई (पोस्ट ग्रेजुएशन) पटियाला से करने के बाद यह जुनून और सर चढ़ गया. समाज का जो तबका पूरे गाँव, कस्बे,शहर की सफाई करते हैं, जब उनकी हालत उनकी बस्तियों में जाकर देखी तब उन्होंने यही ठान लिया कि नाटक समाज के इसी सबसे शोषित तबके के लिए ही होगा.
कालिज खत्म करने के बाद दलित बस्तियों में नाटक करने के लिए जब टीम बनाने का सवाल खड़ा हुआ तब सैमुएल जॉन ने अपने आप को तन्हा ही पाया. इस तन्हाई ने उनके जज्बे को और पुख्ता किया, अब उन्हें अकेले ही पूरे नाटक को करना था. खुद ही लिखना, खुद ही संयोजन करना खुद ही अभिनय और खुद ही जगहों का चुनाव करना था. अकेले नाटक करते करते उनकी क़ाबलियत कमजोर नहीं बल्कि और परवान चढ़ी, धीरे-धीरे वह इस विधा में इतने पारंगत हो गए कि अब वह सब कुछ अकेले ही करते हैं.
पढ़ाई पूरी करने के बाद जिंदगी सैमुएल जॉन को मुंबई भी ले गयी जिसके अनुभव साझे करते हुए वह बताते हैं, कि गोरेगांव ईस्ट स्थित जिस बिल्डिंग में वह किराये के कमरे पर रहते थे, उस बिल्डिंग के बच्चे झुग्गी के बच्चों के साथ नहीं खलते थे. यह बात उन्हें कचोटती थी. उन्होंने धीरे-धीरे बच्चों से मेलजोल बढ़ाया और उन्हें नाटक की ट्रेनिंग देनी शुरू की. बच्चों ने फीस पूछी तो जवाब दिया ‘फ्री’. महानगर के बच्चों को भी मालूम है कि वहां फ्री कुछ नहीं मिलता। खैर धीरे-धीरे विश्वास कायम हुआ और बच्चों को नाटक की ट्रेनिंग शुरू की. चौथे दिन सैमुअल जॉन को सिखाते सिखाते चक्कर आ गया, क्योंकि उस दिन वह अपनी चाय का आख़िरी प्याला भी पी चुके थे. बच्चों ने वजह पूछी, जो उन्होंने इशारतन बताया कि कुछ खाया नहीं इस लिए ..
बिना ताले के उस महानगरीय कमरे में जब वह शाम को वापस लौटे तो उनका घर खाने पीने की चीजे काफी मात्रा में थी और यह सिलसिला उनके लगभग तीन साल के मुंबई प्रवास के दौरान कभी थमा नहीं. जिन बच्चों को उन्होंने नाटक सिखाया, उन्हीं बच्चों ने उनके पेट की जिम्मेदारी उठा ली. आज जब वह पंजाब की दलित बस्तियों में नाटक करते हैं तो उन्हें आटा, चावल, गुड़ जैसी खाद्य सामग्रियां ही उपहार स्वरूप मिलती हैं. जनता के इस प्रेम को वह फिर दोबारा दुगने उत्साह के साथ नाटकों के जरिये वापस लौटा देते हैं. धीरे-धीरे यह सिलसिला बढ़ा और उनकी लगन भी, जिसका मुआवजा उन्हें कभी साईकिल तो कभी स्कूटर तो कभी कार के रूप में मिला.
मुंबई में जब बम धमाकों से जनजीवन अस्त व्यस्त हुआ, तब उन्होंने बच्चों से मासूम सा सवाल किया कि यह सब तुम्हे कैसा लगता है, बच्चों ने उसी मासूमियत के साथ जवाब दिया, ‘ हम खेल नहीं सकते’ इस छोटे से वाक्य में मानव जीवन का सार था। इस मानवीय व्यथा पर बच्चों के नुक्ते नज़र से उन्होंने नाटक लिखा ‘हम तो खेलेंगे’. सैमुएल जॉन बहुत दर्द के साथ इस तथ्य को स्वीकारते हैं कि वामपंथी आन्दोलन में साहित्यकारों ने बच्चों पर काम नहीं किया, यह सारा क्षेत्र आज संघियों के कब्जे में है. इस प्रश्न पर उन्होंने गंभीरता से काम किया है और उनके नाटकों में बच्चों के लिए प्रचुर मात्रा में नाट्य सामग्री उपलब्ध है.
जनता के दुःख दर्दों को अपने नाटकों में पिरों कर पेश करने वाले इस अकेले कलाकार की रंगमंच की दुनिया में अपनी अलग ही ख्याति है. सैमुअल जॉन सरकारी प्रस्तावों से हमेशा दूरी बना कर रखते हैं और उसके साथ ही रंग मंच को आडम्बरों के साथ प्रस्तुत करने वाले व्यवसायिक नाट्य कर्मियों से भी. उनका कहना है कि मैं समाज के सबसे आख़िरी आदमी की लड़ाई का स्वर हूँ, वह धनहीन है साधनहीन है तो उसके नाटकों में किसी आडम्बर को शामिल नहीं किया जा सकता. फरीदकोट के नज़दीक धिलवान गाँव में गरीब किसान के परिवार में पैदा हुए सैमुएल जॉन, जसविंदर कौर के पति और दस वर्षीय वाणी एक पुत्री के पिता हैं, जसविंदर चंडीगढ़ के एक सरकारी स्कूल में अध्यापिका हैं, दस दिन अपने परिवार के बीच समय बिताते हैं और महीने के बाकी बीस दिन पंजाब के दूर दराज वाले इलाकों में दलित बस्तियों में जाकर नाटक करते हैं, अपने नाटकों के जरिये भारतीय समाज में जाति एंव वर्गीय बंटवारे पर धारदार नाटकों के माध्यम से जन चेतना को जगाने का काम कर रहे हैं. पंजाबी लोक नाट्य में निश्चय ही गुरशरण सिंह पा जी के काम को आगे बढ़ाने वाले एक सशक्त प्रतिभाशाली नाट्यकर्मी हैं.
गुरदयाल सिंह के प्रसिद्द पंजाबी उपन्यास पर आधारित गुरविंदर सिंह द्वारा निर्देशित ‘अंधे घोड़े का दान’ 2011 ( http://www.imdb.com/title/tt2085746/ ) फिल्म में मुख्य भूमिका निभा चुके सैमुएल जॉन की एकमात्र पंजाबी फिल्म को कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में दिखाया जा चुका है। इस फिल्म को भारत का 59वां सर्वश्रेठ राष्ट्रीय पुरूस्कार भी मिल चुका है, किसी पंजाबी फिल्म को अब तक यह सम्मान एक बार ही मिला है.
वामपंथी विचारधार के हामी सैमुअल जॉन इस बात को बेहिचक कुबूल करते हैं कि वह सिर्फ संस्कृतिकर्मी हैं, भारत में मूलभूत बदलाव लाने का काम वामपंथी राजनीतिक दलों का है. इस बदलाव के आन्दोलन में वह मात्र एक सहायक की भूमिका अदा कर रहे हैं. भारत में बढ़ रहे फासीवादी खतरे और जातीय उत्पीड़न के राजनीतिक स्वरूप और उसकी चुनौती को मात्र रंगमंच से जवाब कैसे दिया जा सकता है? इस प्रश्न के उत्तर में वह फिलहाल खुद को असहाय पाते हैं लेकिन उन्होंने आशा व्यक्त की कि जरूरत पड़ने पर, सरकारी हमले बढ़ने की स्थिति में भविष्य में कोई भी राजनीतिक कदम उठाया जा सकता है. परन्तु विचार के स्तर पर वह बहुत स्पष्ट हैं कि भारत में जातीय एव वर्गीय शोषण को बदले बिना दलितों, मेहनतकशों की हालत को सुधारा नहीं जा सकता.
इंडो कनेडियन वर्कर्स ऐसोसिएशन के तत्वावधान में 29 मार्च को भगत सिंह राजगुरु सुखदेव की शहादत की 84वीं वर्षगाँठ पर आयोजित किये जाने वाले एक कार्यक्रम में सैमुएल जॉन ओम प्रकाश बाल्मीकि द्वारा लिखित आत्मकथा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कृति “जूठन” का नाट्य रूपांतरण पेश करेंगे. भारत वापस जाने से पहले सैमुएल जॉन कनैडा के दूसरे प्रान्तों में अपनी नाट्य कला का प्रदर्शन करेंगे. कई कनैडियन शहरों में उनका इंतज़ार बेताबी के साथ किया जा रहा है.
(टोरंटो से शमशाद इलाही शम्स की रिपोर्ट)


