29 सितंबर को मुंबई में एलिफिंसटन रोड स्टेशन पर मची भगदड़ की वजह से 23 लोगों की जान चली गई. उस वक्त स्टेशन पर जो लोग थे, उनमें से अधिकांश लोग काम करने जा रहे थे. इनके दफ्तर मिल की जगह बने बड़े-बड़े कॉम्पलेक्स में हैं. बारिश और दूसरी ओर से आई ट्रेन की वजह से भीड़ अचानक बढ़ी. यह दुर्घटना कई नाकामियों की कहानी कह रही है. इनमें पहली नाकामी तो यही है कि ऐसी किसी स्थिति से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन की कोई रणनीति नहीं है. साथ ही यह शहरी विकास योजनाओं के खोखलेपन को भी दिखाता है. ये समस्याएं सिर्फ मुंबई की नहीं हैं बल्कि देश के अधिकांश शहरों की हैं.

देश की आर्थिक राजधनी मुंबई और इसके आसपास के इलाके तकरीबन एक दशक पहले ही अपनी अधिकतम क्षमता हासिल कर चुके थे. लेकिन शहर से बाहर जो नए रिहायशी इलाके विकसित हुए उन्हें मुख्य शहर से जोड़ने वाला परिवहन ढांच समय की जरूरतों के साथ विकसित नहीं हुआ. इससे जाम की समस्या पैदा होने लगी. मेट्रो और मोनोरेल के जो स्टेशन बन रहे हैं, उनसे यह समस्या और बढ़ेगी. सरकार लोकल ट्रेन का बोझ करने के लिए मेट्रो और विवादास्पद तटीय सड़कों पर भरोसा कर रही है. हालांकि, शहरी परिवहन के अधिकांश विशेषज्ञ इसे सही नहीं मान रहे हैं. मुंबई रेलवे विकास निगम लोकल ट्रेनों के नेटवर्क विस्तार में नाकाम रहा है.

लोकल ट्रेनों के साथ मुंबई की कई चीजें जुड़ी रही हैं. तकरीबन 22 घंटे चलने वाली इन ट्रेनों में महिलाएं सुरक्षित महसूस करती हैं और यह परिवहन का सबसे सस्ता माध्यम है. रेलवे लाइन के साथ-साथ रिहायशी और वाणिज्यिक काॅम्पलेक्स विकसित हुए. झुग्गियों के विकास का पैटर्न भी यही रहा. लेकिन इसका स्याह पक्ष यह है कि दूर के इलाकों में यह विकास योजनाबद्ध नहीं रहा. शहर के बीच में बड़े और चमकदार टावर बने लेकिन इनमें रहने वाले लोगों को संकरी और भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर ही निकलना पड़ता है.

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जिस एक लोकल ट्रेन की क्षमता 1,700 लोगों को लेकर चलने की है, उसमें औसतन 4,500 लोग सफर करते हैं. लेकिन फिर भी ये ट्रेनें हर रोज 75 लाख यात्रियों के लिए कम पड़ जाती हैं. लोकल ट्रेनों के नेटवर्क पर हर रोज 10 लोगों की मौत होती है. 2016 में 3,202 लोगों की मौत हुई और 3,363 लोग घायल हुए. इस साल दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या 1,618 हो गई है.

समाधान के तौर पर कई सुझाव दिए जाते हैं. इनमें रेल लाइल का बेहतर रखरखाव, लोकल ट्रेनों के लिए स्वतंत्र नियामक का गठन, मल्टी मॉडल परिवहन नेटवर्क बनाना, पूर्वी और पश्चिमी गलियारे का विकास आदि शामिल हैं. मुंबई में विरोध की जो संस्कृति थी, वह अब स्वीकार की संस्कृति में बदल गई है. यहां के लोगों को नेताओं से यह मांग करनी चाहिए कि वे बेहतर योजनाएं बनाएं और जिन सुझावों का जिक्र किया गया है, उनका क्रियान्वयन करें.

इकॉनोमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली का संपादकीय

(Economic and Political Weekly, वर्षः 52, अंकः 39, 7 अक्टूबर, 2017)

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