पहला स्वतन्त्र देश जहाँ महिलाओं को मताधिकार मिला

नॉर्वे में महिलाओं को मताधिकार मिलने की शताब्दी वर्ष के जश्न (Norway celebrates the centenary of women's suffrage) मनाये जा रहे हैं। आजकल वहाँ महिला मताधिकार सप्ताह के उत्सव (Celebration of Women's Suffrage Week) चल रहे हैं। भारत के विदेश मन्त्री सलमान खुर्शीद भी कुछ कार्यक्रमों में शामिल होने वाले हैं। आजकल वे नॉर्वे की सरकारी यात्रा पर हैं। इस साल नॉर्वे में चुनाव भी होने वाले हैं। सरकार की कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा लोग इस साल मतदान करें।

इस साल नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में 14 नवम्बर को महिला सशक्तीकरण और समानता के विषय पर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया गया है। इस मौके पर वहाँ दुनिया भर के राजनेता और महिलाओं के अधिकार के लिये संघर्ष करने वाले लोगों का जमावड़ा होने वाला है।

आज नॉर्वे महिलाओं के अधिकार के एक अहम केन्द्र के रूप में जाना जाता है लेकिन यह दर्जा उनको यूँ ही नहीं मिल गया। आज से ठीक एक सौ साल पहले 11 जून 1913 को जब उस वक़्त की नॉर्वे की सरकार ने महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया तो वह दुनिया के उन देशों में शामिल हो गया जहाँ महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला था। इसके पहले न्यूजीलैंड में 1893 में, ऑस्ट्रेलिया में 1902 में और फिनलैंड में 1906 में महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिल चुका था, लेकिन यह तीनों ही देश स्वतन्त्र देश नहीं थे। नॉर्वे पहला स्वतन्त्र देश है जहाँ संविधान के अनुसार महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला। लोक शाही के इतिहास में यह एक बहुत ही अहम संग मील है। नॉर्वे का संविधान 1814 में बना था और उस संविधान के लागू होने के करीब सौ साल बाद नॉर्वे के राजनेताओं की समझ में आया कि महिलाओं को भी राज काज में शामिल किया जाना चाहिये। हालाँकि सौ साल लगे लेकिन बाकी दुनिया के हिसाब से 1913 का यह फैसला एक क्रान्तिकारी क़दम था। जब 1814 में नॉर्वे का संविधान बना तो उसमें प्रावधान था कि जनप्रतिनिधियों को राजकाज में शामिल किया जायेगा। इस संविधान को बनाने के लिये 1791 के फ्रांसीसी संविधान और 1787 के अमरीकी संविधान से प्रेरणा ली गयी। नॉर्वे में शुरू में उन लोगों को वोट देने का अधिकार था जो या तो सरकारी नौकरियों में थे या जमींदार थे। वे लोग जिनके पास ज़मीन नहीं थी उनको वोट देने का अधिकार नहीं था। हर वर्ग की महिलाओं को वोट की प्रक्रिया से बाहर रखा गया था। लेकिन 1898 में सभी पुरुषों को वोट देने का अधिकार मिल गया। हालाँकि उस वक़्त के हिसाब से यह बहुत ही क्रान्तिकारी क़दम था। यूरोप के बाकी देशों में तो यह भी नसीब नहीं था और जब 1913 में महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिल गया तो नॉर्वे यूरोप में लोकतन्त्र का सबसे प्रमुख केन्द्र बन गया।

1913 में महिलाओं को वोट देने का फैसला कोई एक दिन में नहीं हुआ। उसके लिये 28 साल तक संघर्ष चला था।

जब सरकार ने 1913 में महिलाओं को अधिकार देने का फैसला किया। उस संघर्ष की नेता जीना क्रोगने कहा था कि उन्हें उम्मीद तो थी कि उनके संघर्ष के बाद कुछ सकारात्मक होगा लेकिन उनको भी उम्मीद नहीं थी कि जीत इतनी निर्णायक होगी क्योंकि उस फैसले के बाद सभी महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिल गया था। जब महिलाओं के मताधिकार के लिये बहस हो रही थी तो वही तर्क दिये गये थे जो हर पुरुष प्रधान समाज में दिये जाते हैं।

नॉर्वे की संसद (Parliament of Norway The Storting) के उस दौर के कई सदस्यों ने कहा कि अगर महिलाओं को वोट देने का अधिकार दे दिया गया तो पारिवारिक जीवन तबाह हो जायेगा। चर्च की ओर से सबसे ज्यादा एतराज़ उठ रहा था, धार्मिक नेता कह रहे थे कि राज करना पुरुषों का काम है और अगर महिलाओं को राज करने वालों को चुनने का अधिकार दे दिया गया तो बहुत गलत होगा। महिलाओं को पुरुषों का काम नहीं करना चाहिये और पुरुषों को महिलाओं का काम नहीं करना चाहिये। इन दकियानूसी तर्कों के बीच संघर्ष भी चलता रहा और 1913 आते आते राजनीतिक दलों पर इतना दबाव पड़ा कि सभी राजनीतिक पार्टियों ने अपने चुनावी वायदों में महिलाओं के मताधिकार की बात को प्रमुखता से शामिल किया।

जब मई 1913 में इस मुद्दे पर बहस शुरू हुयी तो किसी भी राजनीतिक पार्टी ने विरोध नहीं किया। एक बार जब वोट देने का अधिकार मिल गया तो महिलाओं को वहाँ की संसद की सदस्य बनाने की कोशिश भी शुरू हो गयी और 1922 में पहली बार किसी महिला को नॉर्वे एक सर्वोच्च पंचायत में शामिल होने का मौक़ा मिला।

शेष नारायण सिंह

13 जून 2013 को प्रकाशित

Know which country first gave voting rights to women?