परम्परा प्रयोग और परिवर्तन
सुन्दर लोहिया
शपथ ग्रहण के पंद्रह दिनों में ही विरोधी पार्टियों को लगा कि उनके पांव के नीचे से राजनीतिक ज़मीन धसती जा रही है। उन्होंने जनता से किये वायदों को पूरा करने का अवाब बनाना शुरु किया ताकि आप पार्टी को सम्भलने का मौका ही न मिले। वे इस मामले में कुछ हद तक कामयाब भी हो गये। अपने अतिवादी रुझान के कारण इस पार्टी के नेताओं से ऐसी ग़लतियां भी हो गई जिनका दुष्परिणाम उन्हें भुगतना पड़ सकता है। आप रहे न रहे लेकिन इस देश की जनता रहेगी उसकी समस्याएं रहेंगी तो इस पार्टी के आन्दोलन से जो मुद्दे उभरे हैं वे सत्ताधारियों से सवाल ज़रूर करेंगे। हो सकता है ये सवाल ही आगामी संसदीय चुनाव का राजनीतिक एजेण्डा तय कर पायें। यदि ऐसा हो पाया तो यह पहला अवसर होगा जब चुनाव राजनीतिक पार्टियों के बजाये मतदाताओं के एजेण्डे पर लड़ा जायेगा। जिस परिवर्तन की आशा का सपना जनता देख रही है यह उसकी शुरुआत हो सकती है। अब तक आप पार्टी बदलाव का राग लापती रही है लेकिन दुनिया खुद बदलने से पहले दुनिया बदलने की कोशिश करने वालों का हुलिया बदल देती है। जिस केजरीवाल को जनता के असल मुद्दे उठाने के लिए वामपंथी प्रकाश करात और भाजपाई अरुण जेटली के अलावा कांग्रेस के उपप्रधान राहुल गान्धी और जयराम रमेश ने अपने अपने कार्यकर्त्ताओं के बीच सराहना की जा रही थी वही व्यक्ति तब वास्तविक बदलाव के प्रयोग करने पर उतर आया तो सभी पार्टियों के सुर ताल बिगड़ गये। किसी ने उसे मराठी में येड़ा कहकर पागल करार दिया किसी ने अराजकतावादी और किसी के लिए यह सारा का सारा प्रयोग राजनीतिक आइटम के तौर पर नज़र आने लगा। सोचने की बात है कि मुख्यधारा की पार्टियों में सोच का यह परिवर्तन उस समय ही प्रकट हुआ जब केजरीवाल ने परम्परागत राजनीति से हट कर प्रयोग शुरु किये यानि जब वह मुख्यमन्त्री की हैसीयत से धरने पर बैठठ गये और सड़क से सरकार चलाने की नई लीक डाल रहे थे। इसलिए अब मुख्य मुद्दा यह है कि क्या परम्परागत राजनीति को बदले बिना किसी प्रकार का सार्थक राजनीतिक परिवर्तन सम्भव है ? जब बदलाव के संवैधानिक तरीके कुन्द हो चुके हों और राजनीतिक बहस दलीय हित के समक्ष समर्पण कर चुकी हो तो परिवर्तनकामी लोगों के पास कौन सा रास्ता शेष बचा रहता है जिस पर आगे बढ़ कर बदलाव की जन आकांक्षा की पूर्ति की जा सके ? इस संदर्भ में कुछ सवाल तत्काल जवाब की मांग कर रहे हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार हैं ;-
क्या चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधि का रूपान्तरण इस प्रकार हो जाता है कि वह अपने आप को अपने मतदाताओं से अलग समझने लगे और उनके न्यायोचित अधिकारों की लड़ाई करने के लिए उसके धरने पर बैठने को पद की मर्यादा के विरुद्ध माना जाये ? क्या ऐसी मर्यादा लोकतान्त्रिक हो सकती हैं या इनसे सामंतवाद की गंध आती है? लोकतन्त्र में निर्वाचित प्रतिनिधि को जनता का सेवक माना जाता है पण्डित नेहरु अपने आपको प्रधानमन्त्री के तौर पर जनता का पहला नौकर मानते थे और आज उनकी पार्टी के धुरन्धर दिल्ली मुख्यमन्त्री का धरने पर बैठना मुख्यमन्त्री पद की गरिमा के विरुद्ध बता रहे हैं और अपने आपको नेहरु की विरासत के असल वारिस भी बता रहे हैं। जनता कांग्रेस से इस सवाल का जवाब ज़रूर मांगेगी भाजपा से नहीं क्योंकि भाजपा का पूरा तामझाम सामंतवादी ही है। उससे लोकतान्त्रिक सिद्धान्तों की अनुपालना की उम्मीद कतई नहीं की जा सकती।
दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह पैदा हुआ है कि निर्वाचित जन प्रतिनिधि जब अपने लिए सरकारी खर्च पर सुरक्षा की उच्चत्तम श्रेणी की मांग करता है या उसे प्राप्त करने पर गौरवान्वित अनुभव करता हो तो उसे जनप्रतिनिधि कहलाने का क्या अधिकार है क्योंकि सुरक्षाकर्मियों के घेरे में चलता हुआ नेता जनता का दुश्मन प्रतीत होता है जिसे जनता के मत पर विश्वास नहीं रहा है और अपने आपको असुरक्षित अनुभव कर रहा है? क्या ऐसा आचरण लोकतान्त्रिक मर्यादा के अनुकूल माना जा सकता है ? अगर धरने पर बैठना अराजकता है और अगर जनता की शिकायत पर पुलिस को कारवाई करने का आदेश देना कानून का उल्लंघन है तो क्या जनता को यह नहीं सोचना पड़ेगा कि वे जिन लोगों को आज तक चुनकर सत्तासीन करते आये हैं वे उनकी समस्याओं के मूल कारण तो नहीं है ?
अब तक राजनीतिक पार्टियां एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाती रही हैं लेकिन आरोप लगाने वाले और आरोपी एक ही सिक्के के पहलू होने के कारण आरोप प्रत्यारोप केवल अखबारों में छपने के बाद भुला दिये जाते रहे हैं। ‘आप’ पार्टी ने जब तीस से अधिक नेताओं पर भ्रष्टाचार और वंशवाद की हिमायत करने के आरोप लगाये तो अदालती नोटिसों की झड़ी लगा दी। इस तरह की त्वरित कार्रवाई इसलिए अमल में लाई गई क्योंकि आरोप लगाने वालों की छवि अभी तक साफ सुथरी बनी हुई है। इसके अलावा पहले आरोप पार्टी पर केन्द्रित हो जाते रहे हैं लेकिन इस बार व्यक्ति को निशाने पर लिया गया है। इस सूची में सभी बुर्जुआ पार्टियों के नामी गिरामी नेता शामिल हैं लेकिन एक भी कम्यूनिस्ट का नाम नहीं है। इससे इस काली सूची का लोगों द्वारा सही माना जा रहा है कि आप पार्टी इस मामले में राजनीतिक ईमानदारी का परिचय दे रही है। भाजपा और कांग्रेस जैसी मुख्य धारा की पार्टियों का इस सूची के कारण चिन्तित होना अकारण नहीं है।
जाने अनजाने में आप पार्टी ने देश के मतदाताओं को ईमानदार पार्टी के तौर पर वामपंथियों का विकल्प प्रस्तुत कर दिया है जिससे सत्ता का सपना पालकर चुनाव में उतरने वाले परेशान तो होंगे ही।
आजकल परिवर्तनकामी हल्कों में चर्चा है कि यदि आप पार्टी का राजनीतिक प्रयोग फेल हो गया तो अगले दो तीन दशकों तक कोई जनान्दोलन शुरु नहीं किया जा सकेगा। यदि इसे प्रयोग माना जाये तो यह भी मानना होगा कि प्रयोग निरन्तर प्रक्रिया होते हैं। कोई एक या दो प्रयोग किसी सार्थक परिवर्तन तक नहीं ले जाते। प्रयोग जो असफल हो जाते हैं वे प्रयोगधर्मिता को समाप्त नहीं कर देते बल्कि नये प्रयोग के अनुकूल पृष्टभूमि तैयार करके नये प्रयोग के लिए प्रेरित करते हैं। असफलता या आधी अधूरी कामयाबी भी परिवर्तन के राजमार्ग पर परम्परा और प्रयोग के आवश्यक पड़ाव की तरह उभरते और मिटते रहते हैं। आप के इस लोकतान्त्रिक प्रयोग को इसी दृष्टि से देखना इसका सकारात्मक आकलन होगा।
सुन्दर लोहिया, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। आपने वर्ष 2013 में अपने जीवन के 80 वर्ष पूर्ण किए हैं। इनका न केवल साहित्य और संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है बल्कि वे सामाजिक जीवन में भी इस उम्र में सक्रिय रहते हुए समाज सेवा के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं। अपने जीवन के 80 वर्ष पार करने के उपरान्त भी साहित्य और संस्कृति के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिकाएं निभा रहे हैं। हस्तक्षेप.कॉम के सम्मानित स्तंभकार हैं।