जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, यह अपने मुल्क और समाज की चिंता से जुड़ी बात
जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, यह अपने मुल्क और समाज की चिंता से जुड़ी बात
जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, यह अपने मुल्क और समाज की चिंता से जुड़ी बात
जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, खासकर अपने मुल्क में, उसमें आप आशंकाओं से रत्तीभर वक़्त के लिए भी मुक्त नहीं हो सकते हैं। यह डरे होने, निगेटिव होने या बहुत ज्यादा सेंसेटिव होने की बात नहीं है बल्कि आप जरा भी मनुष्य हैं तो यह जानते हैं कि मनुष्यद्रोही ताकतें किसी भी घटना, वाक्य या चुप्पी को अपने ढंग से पेश कर हिंसा करने-कराने में अभूतपूर्व ढंग से सक्षम हैं। यह अपने मुल्क और समाज की चिंता से जुड़ी बात है।
उस रात अमरनाथ यात्रियों की बस पर आतंकी हमले की खबर टीवी चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज के अंदाज में फेसबुक पर तैरते देखी तो दिल सन्न रह गया। मुंह से निकला भयानक। दुख और चिंताएं एक साथ पैदा हुईं। किसी भी आस्तिक के मुंह से निकला होगा, ईश्वर/खुदा खैर करे। और आशंका निर्मूल भी नहीं थीं। हमने देखा कि सोशल मीडिया पर साम्प्रदायिक स्टेटस वायरल होने शुरु हो गए। फलां ने निंदा नहीं की, सेक्युलरों को सांप सूंघ गया, क्मयुनिस्ट कहां मर गए, टाइप मैसेज तो उनके पास वायरल करने के लिए हमेशा ही सेव रहते हैं। यहां तक कि फायरिंग के बीच बस को कुशलता और हौसले से ड्राइव कर बहुत सारे यात्रियों की जान बचा लेने वाले शख्स का मुसलमान होना भी नफरत फैलाने वालों को रास नहीं आया। इस ड्राइवर के खिलाफ भी झूठे और घिनौने स्टेटस वायरल किए जाने लगे। इसमें खुद को राष्ट्रवादी मानने वाले और जिम्मेदार समझे जाने वाले लोगों ने भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
इंसानियत में यक़ीन रखने वाला कोई भी संवेदनशील नागरिक ऐसे संकट के मौके पर उन सूत्रों की शरण में जाना चाहेगा जिन्हें विभिन्न धर्मों ने मिल-जुलकर बुना हो। उस रात दुख, निराशा और आशंकाओं से घिरे हुए मुझे मीर की लाइनें याद आती रहीं- "उस के फ़रोग़-ए-हुस्न से झमके है सब में नूर/शम-ए-हरम हो या हो दिया सोमनात का''। लेकिन फेसबुक के जिन बहुत से मित्रों को तमाम सहमतियों-असहमतियों के बावजूद पढ़ने-लिखने वाला संवेदनशील नागरिक मानता था और जो कविताओं, टिप्पणियों, ब्लॉग, बेबसाइट या दूसरे जरियों से कला-साहित्य की दुनिया के नागरिक के तौर पर सक्रिय भी रहते रहे थे, उन्हें साम्प्रदायिक ट्रॉल्स की हिंसक भाषा में जहर उगलते देख, तत्काल इस शेर को शेयर करने की इच्छा भी जाती रही। गैरजिम्मेदार बयानबाजी से बाज आने की बात जरूर लिखी पर ये किसे संबोधित हुई होगी, मुझे भी पता नहीं।
हिंदी के वरिष्ठ कवि और पत्रकार Mangalesh Dabral ने आतंकी हमले को "बेहद दुखद और निंदनीय" करार देते हुए याद दिलाया कि "इस गुफा को एक मुसलमान चरवाहे ने खोजा था"। लेकिन, जिन्हें बस ड्राइवर के मुसलमान होने और उसकी बहादुरी भरी भूमिका होने का तथ्य भी बर्दाशत नहीं था, उन्हें यह कैसे बर्दाश्त होता। संकट के वक्त में मिली-जुली संस्कृति और साझे जीवन को याद दिलाने वाली कोई भी बात दंगाई मानसिकता के लोग सहन नहीं कर पाते हैं। इसी मानसिकता से ग्रस्त लोगों द्वारा प्रतिभाशाली कहा जाने वाला एक कुख्यात ट्रॉल तुरंत उनकी वॉल पर जाकर अपना जहर उगल आया। इस अतिक्रमण, बदतमीजी और मनुष्यद्रोही हरकत से बड़ी कोई गाली क्या होगी? लेकिन, जिन्हें मंगलेश डबराल की गुस्से भरी प्रतिक्रिया 'फक ऑफ' ही याद रही या जो दोनों बातों को एक तराजू में तौलने लगे, उन्हें अपनी मनुष्यता को एक बार जरूर टटोल लेना चाहिए। अगर वे किसी गफलत में नहीं हैं और पहले ही कहीं पहुंचे हुए लोग हैं या यह कहीं पहुंचने के लिए खुद को प्रस्तुत करने का जेस्चर है तो फिर कोई बात नहीं।
साहित्य-कला-संगीत से खुद को जोड़ने वाले जिन 'साथियों' ने साम्प्रदायिक आह्वान वाले जहरीले स्टेटस लगाए, उन्हें बेहद कम पढ़ा-लिखा मैं हिंदुस्तान के विभाजन के वक़्त के साहित्य या दुनिया भर में रची गई कई महान चीजों की याद कराना चाहता था पर फिर लगा कि इससे क्या लाभ होगा। वे तो इन सब से गुजर चुके, प्रभावी टुकड़े पोस्ट करने वाले, अत्यंत मधुर, प्रेममयी और शालीन मुहावरों में बातें रखने वाले दानिशमंद लोग हैं। तो फिर यह सवाल उठा कि संगीत, साहित्य, कलाएं क्या वाकई आदमी को सब्लाइम कर पाती हैं। या इन्हें बरतने वाला कोई शख्स वाकई इनके सार तक पहुंचता ही है? कुछ लोगों का कहना था कि किसी को कोई प्रतिक्रिया मत दो क्योंकि इससे उनके लौटने के रास्ते बंद हो जाते हैं। लेकिन, कहां लौटने के? इंसानियत किसी का अपना कोई मूल्य, किसी की अपनी कोई जरूरत है या नहीं? या यही बहाना कि फलां सेक्युलर ने यह कहा या फलां कम्युनिस्ट ने वह कहा या फलां धर्म वाले ने ऐसा किया तो अब मैं जहरीला ही सही? शायद कोई अपने भीतर पलते रहे मनुष्यद्रोह को किसी दिन पहचाने, उससे आजिज आए और समझे कि इंसान की राह सिर्फ इंसानियत है। साहित्य और कलाओं की यही प्रतिबद्धता है।
धीरेश सैनी की फेसबुक टाइमलाइन से साभार


