महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन के मुताबिक समझदारी और मूर्खता में मोटा फर्क यह है कि समझदारी की एक सीमा होती है, जबकि मूर्खता असीम-अपरिमित होती है। आइंस्टीन के विज्ञान संबंधी सिद्धांतों की तरह ही उनका यह वक्तव्य भी समय की कसौटी पर खरा उतर रहा है। इसके प्रमाण दे रहे हैं हमारे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय वे महानुभाव, जिन्हें आम लोग सामान्यतः जिम्मेदार, विवेकवान और विद्वान मानते हैं।
इस समय मानसून के बादल भले ही धरती से रूठ कर बरसने में कोताही बरत रहे हों, पर हमारे सामाजिक जीवन में मूर्खता के बादल न सिर्फ घने रूप में छाए हुए हैं, बल्कि रह-रहकर बरस भी रहे हैं। हमारे राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक नेतृत्व वर्ग के कई लोग अपने श्रीमुख इस समय आए दिन जिस तरह के अतार्किक और फूहड़ बयान जारी कर रहे हैं, वे हैरान-परेशान करने वाले हैं।
इस सिलसिले में सोशल मीडिया में सक्रिय रणबांकुरों की फौज का अज्ञान तो एक तरह से आग में घी का काम कर रहा है। अतार्किक और फूहड़ बयान जारी करने वालों में ज्यादातर वे महानुभाव हैं जो समाज के अलग-अलग तबकों पर खासा असर रखते हैं और जिनके भाषण-प्रवचन सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं। ऐसे उटपटांग बयान देने वालों में निर्वाचित जनप्रतिनिधि तो बहुतायत में हैं ही, संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भी शामिल हैं। यही नहीं, न्यायपालिका में शीर्ष पदों पर रह चुके कानूनविद और प्रतिष्ठित धार्मिक मठों के मुखिया भी इस होड़ में शामिल हैं। इन सभी प्रचार-पिपासु महानुभावों के सार्वजनिक हो रहे विचार साफ तौर पर घनघोर अज्ञानता पर आधारित हैं और उन मूल्यों को बढ़ावा देते हैं जो देश और समाज को पीछे धकेलते हैं।
आमतौर पर ऐसे लोगों के निशाने पर महिलाएं, अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी और पिछड़े तबके होते हैं, जिनके बारे में मनगढ़ंत किस्सों और तथ्यों के आधार पर अपमानजनक और उपहासकारक बयान दिए जाते हैं।
इन दिनों इतिहास को लेकर ऊलजुलूल बयानों के जरिए नए-नए विवाद खड़े किए जा रहे हैं और हमारे राष्ट्रीय आंदोलन के महात्मा गांधी, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना आजाद, डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे चमकदार नायकों को तरह-तरह से लांछित और अपमानित किया जा रहा है। यहां तक कि राष्ट्रगान जन-गण-मन को लेकर भी वाहियात दलीलें देकर उसमें संशोधन करने के सुझाव दिए जा रहे हैं।
अभी हाल ही में राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने एक विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में फरमाया कि हमारे राष्ट्रगान 'जन-गण-मन...' में से 'अधिनायक' शब्द हटा देना चाहिए, क्योंकि यह ब्रिटिश सम्राट जार्ज पंचम की शान में लिखा गया था। एक लंबे समय से सुनियोजित तरीके से यह कोशिश चल रही है कि 'जन गण मन' के मुकाबले 'वंदे मातरम' को देश का बेहतर राष्ट्रगान साबित किया जाए। जन गण मन के प्रति लोगों के मन में सम्मान का भाव कम करने के लिए बार-बार यह कहा जाता रहा है कि यह जार्ज पंचम की शान में लिखा गया था। तो जो वैचारिक जमात (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) यह सब कहती-सुनती रहती है उसी जमात में पले-बढ़े कल्याण सिंह ने भी कोई नई बात नहीं कही है। वे तो महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहे जाने पर भी सवाल खड़ा कर चुके हैं, जबकि गांधीजी को यह संबोधन स्वाधीनता आंदोलन के दौरान नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने दिया था
जन गण मन को लिखे एक शताब्दी से ज्यादा वक्त हो गया है और इस पर मूर्खतापूर्ण दलीलें देकर विवाद खड़ा करने का सिलसिला भी लगभग इतना ही पुराना है। कायदे से तो इस विवाद पर उसी वक्त विराम लग जाना चाहिए था, क्योंकि खुद गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने तब स्पष्ट शब्दों में कहा था, 'मेरे गीत का अधिनायक कोई अंग्रेज शासक नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक नियति का वह नियंता है, जो आदिकाल से हमारी विजय और पराजय के क्षणों में हमारा दिशा-निर्देशन करता रहा है।' इसी क्रम में उन्होंने यह भी साफ कर दिया था कि भारत का भाग्य-विधाता कभी भी कोई जॉर्ज पंचम, जॉर्ज षष्ठम या कोई अन्य जॉर्ज नहीं हो सकता।
टैगोर के इस स्पष्टीकरण के बाद विवाद की कोई गुंजाईश नहीं रह जाती लेकिन मूर्खता की गुंजाईश कभी खत्म नहीं होती, लिहाजा विवाद खड़ा करने का सिलसिला अभी भी जारी है।
इतिहास संबंधी मसलों पर अपने अज्ञान का प्रदर्शन करने वालों में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू का नाम भी शुमार होता है। एक से अधिक बार अपने बयानों के जरिए नब्बे फीसदी भारतीयों को मूर्ख बताने वाले न्यायविद काटजू विभिन्न मसलों पर जिस तरह के बयान देते रहते हैं उससे शंका होती है कि शायद उन्होंने विवेक सम्मत बात न करने का संकल्प ले रखा है। जन गण मन को लेकर जो बात कल्याण सिंह ने कही, वही बात काटजू भी पहले कह चुके हैं। कुछ दिनों पहले उन्होंने अपने एक ब्लॉग में महात्मा गांधी को ब्रिटिश एजेंट और नेताजी सुभाषचंद्र बोस को जापानी एजेंट कहा था। गांधीजी को तो उन्होंने भारत के बंटवारे का कारक तथा गौ भक्त तथा सनातनी होने के नाते मुस्लिम विरोधी भी करार दे दिया था। उनके विकृत इतिहास-बोध पर आधारित इन उद्‌गारों के लिए संसद ने सर्वसम्मति से बाकायदा एक प्रस्ताव पारित कर उनकी निंदा की थी। लेकिन काटजू पर इसका कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने बड़ी निर्लज्जता के साथ फरमाया कि उन्होंने जो लिखा है, उस पर वे कायम हैं। अब उन्होंने संसद में पारित अपनी निंदा के प्रस्ताव को रद्द करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका भी दायर कर रखी है।
काटजू को सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त होने के बाद यूपीए सरकार ने भारतीय प्रेस परिषद का अध्यक्ष बनाया था। इस पद पर रहते हुए उन्होंने जो कुछ किया वह तो एक अलग बहस का मुद्दा है, लेकिन उसी पद पर एक और कार्यकाल पाने के लिए उन्होंने केंद्र में सत्ता परिवर्तन होते ही जिस तेजी से रंग बदला, वह तेजी गिरगिट को भी मात करने वाली थी। यह और बात है कि वे अपनी इस अदा से भाजपा और संघ नेतृत्व को नहीं रिझा पाए। अलबत्ता उन्होंने अपने को एक तरह से उन लोगों की कतार में जरूर खड़ा कर लिया जो गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को अपना हीरो मानते हैं।
काटजू अपनी विकृत सोच का परिचय सिर्फ इतिहास संबंधी मामलों में ही नहीं देते हैं, बल्कि वे महिलाओं को लेकर भी अपनी कुंठा या यूं कहें कि अपने विकृत सौंदर्य बोध को व्यक्त करने का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं। कभी वे कैटरीना कैफ को राष्ट्रपति पद पर देखना चाहते हैं तो कभी उन्हें स्मृति ईरानी की तुलना में साध्वी निरंजन ज्योति ज्यादा लावण्यमयी नजर आती हैं और कभी वे भाजपा को बिन मांगे सलाह देते हैं कि उसे दिल्ली के विधानसभा चुनाव में किरण बेदी के बजाय युवा और आकर्षक शाजिया इल्मी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना चाहिए था।
मूर्खतापूर्ण ऐसे ही बयानों की श्रृंखला में हिंदुत्व की ठेकेदार जमात के नेताओं की ओर से मुसलमानों और ईसाइयों की कथित तौर पर बढ़ती आबादी का हवाला देकर कुछ ही वर्षों में हिंदुओं के अल्पसंख्यक हो जाने की हास्यास्पद भविष्यवाणी की जा रही है। यही नहीं, इस काल्पनिक खतरे का सामना करने के लिए हिंदुओं से अपील की जा रही है कि वे भी ज्यादासे ज्यादा बच्चे पैदा करें। इस आशय के बयान देने वालों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहनराव भागवत, अशोक सिंघल, प्रवीण तोगड़िया, साक्षी महाराज आदि शामिल हैं। शिवसेना के मुखिया उद्धव ठाकरे तो मुसलमानों का वोट देने का अधिकार ही छीन लेने की बात करते हैं और पाकिस्तान का जिक्र आने पर तो वे सीधे परमाणु हथियारों के इस्तेमाल करने का बहुमूल्य सुझाव दे डालते हैं, बगैर यह सोचे कि पाकिस्तान भी परमाणु शक्ति-संपन्न देश है और उसके परमाणु हथियार अपेक्षाकृत ज्यादा गैर जिम्मेदार लोगों की कस्टडी में है।
ऐसे ही नाना प्रकार के अटपटे और अतार्किक बयान देने वालों में भाजपा नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, मुख्तार अब्बास नकवी, राम माधव, योगी आदित्यनाथ, सपा नेता मुलायमसिंह यादव, द्वारकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद, दिल्ली की जामा मस्जिद के इमाम अबदुल्लाह बुखारी, सांसद असदउद्दीन औवेसी, आदि कई नाम शुमार किए जा सकते हैं।
सबसे त्रासद होते हैं स्त्रियों को लेकर विभिन्न मसलों, खासकर उनके साथ होने वाले बलात्कार जैसे वीभत्स और पाशविक अपराध की घटनाओं पर आने वाले विवेक-विरोधी बयान, जो आए दिन विभिन्न हस्तियों के मुंह से निकलते हैं।
कोई मंत्री या नेता महिलाओं को रात के वक्त घर से अकेले बाहर न जाने की नसीहत देता है तो कोई बलात्कार की घटनाओं के लिए महिलाओं की पोशाक को जिम्मेदार ठहराता है। कोई उनके खान-पान को दोषी ठहराता है तो कोई पाश्चात्य संस्कृति को कोसता सुनाई देता है।
धर्म की मंडी में इनसान और भगवान के बीच बिचौलिए की भूमिका निभाने वाले तथाकथित धर्माचार्य भी इस मामले में पीछे नहीं रहते हैं और महिलाओं को ही मर्यादा में रहने की सीख देते नजर आते हैं और कभी-कभी तो उन्हें ऐसी घटनाओं को भाग्य या ईश्वरीय इच्छा का परिणाम बताने में भी शर्म नहीं आती।
कुल मिलाकर ऐसे लगभग सभी मामलों में महिलाओं को ही सीख दी जाती है कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। उन्हें क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं पहनना चाहिए। पुरूषों को कोई नहीं समझाता कि समय बदल चुका है, इसलिए वे भी अपनी मानसिकता बदलें स्त्री के साथ समानता का व्यवहार करें और उन्हें सम्मान दें।
अपने बयानों के माध्यम से अपने अज्ञान का प्रदर्शन करने और समाज के वातावरण को तरह-तरह से प्रदूषित करने वाले महानुभाव हमें मार्टिन लूथर किंग का यह कथन तो याद दिलाते ही हैं कि अज्ञान और मूर्खता एक खतरनाक प्रवृत्ति है, साथ ही वे यह भी साबित करते हैं कि विक्षिप्त मन-मस्तिष्क के लोग सिर्फ मानसिक चिकित्सालयों में ही नहीं बल्कि समाज में कहीं भी मिल सकते हैं।
कुछ लोग अपने को प्राप्त ऊंची हैसियत या ओहदे के अहंकार की वजह से भी ऐसा कुछ बोल जाते हैं जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए। अहंकार और अज्ञानता का मिश्रण भी कम खतरनाक नहीं होता है।
संभवतः ऐसे ही लोगों के लिए प्रसिद्ध दार्शनिक मार्क ट्‌वैन ने सलाह दी है कि आप चुप रहकर दूसरों को संदेह करने दीजिए कि आप मूर्ख हैं, बजाय इसके कि आप अपना मुंह खोलकर सामने वाले के संदेह को यकीन में बदल दें।
साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल के मशहूर उपन्यास राग दरबारी में छंगामल इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल साहब कहते हैं कि जैसे राजनीति में बुद्धिमत्ता एक मूल्य है, वैसे ही मूर्खता भी एक मूल्य है। अगर इसे माना जाए तो वाकई हमारा सार्वजनिक जीवन बहुत ही मूल्यवान लोगों से भरा हुआ है।
अनिल जैन
अनिल जैन, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। नई दुनिया में वरिष्ठ एसोसिएट एडिटर हैं।