जुल्मोसीतम की इंतहा हो गई

सियासत गुंडई न होती तो

मसला भी कोई न होता और न

इंसानियत का बंटवारा होता

हम तो जान रहे थे कि नई दिल्ली से तार जूडने हैं वाशिंगटन के। हम भूल रहे थे कि व्हाइट हाउस भी अश्वेत रहा है और विश्वूद रक्तवालों की छूत से शायद ठोड़ा मामला गड़बड़ाया ही रहेगा, वरना हाट लाइन की रस्म में इतनी देरी, तोबां तोबां।

बहरहाल सुना है कि देश के सारे वामपंथी गोलबंद हो रहे हैं और मेहনতकश सदड़कों पर आने की तैयारी में हैं। हम हुए हैं हर्रि विश्वूद काफ़ी, रबों के काराबार में कोई यकीन नहीं है। नहीं है।

फिरभी तकाजा वक़्त का है।

फिरभी तकाजा इंसानियत का है।

फिर भी तकाजा कहकूकी का है।

फिर भी तकाजा जल जंगल और जमीन का है।

वामपंथी हो या रंग लाल के बजाय कोई दूसराः

सियासतबाजों की गोलबंदी से मसले नहीं सुलझने वाले।

सियासत फार्मूलों से ही चल रहा गुलशन का काराबार।

गोलबंदी हो तो इंसानियत के नाम पर हो गोलबंदी।

गोलबंदी हो तो सरहदों के आर पार हो गोलबंदी।

गोलबंदी हो तो पहचान के दायरे को तोड़ो पहले।

गोलबंदी हो तो जात पांत का अंधेरा तोड़ो पहले।

हवाएं दे रही हैं आवज कि दुनियाया के इंसानों, मेहन्तकशों गोलबंद हो जाओ कि खतरे में है कायनात, खतरे में है इंसानियत।

यूनान में खुल्ला खेल फर्रुखाबादी का किस्सा खुलने लगा है आहिस्ते आहिस्ते। कि किसी स्प्रास का इस्तीफा हो गया है और जनताता अभी गु्स्से में है कि सुखीलाफ़ फिर वहां सिरेहाने इंसानियत की क़त्ल के खातीर। हुबहू वही सितम है जो कभी जर्मनी पर छाया गया और नतीजतन कोई हितलर पैदा हो गया।

किस्सा सिरफ वही नहीं होता जो बांचता जाता है। बच्चा हुआ किस्सा उससे बहुत बड़ा होता है। जो कहा नहीं जाता, लिखा नहीं जाता और बांचा बी नहीं जाता यकीनन। किस्सा जहां खत्म हम समझा करें।