झारखंड में भाजपा उपाध्यक्ष रघुवर दास 28 दिसंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। वे भाजपा की मेहरबानी से आदिवासियों के लिए बने राज्य के गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री होंगे।पूर्ण बहुमत से सत्ता में आए भाजपा गठबंधन ने प्रदेश के इतिहास में पहली बार एक किसी गैर-आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया है। इससे राज्य के मूलनिवासी आदिवासी संगठन नाराज हैं और उन्होंने शनिवार और रविवार को प्रदेश में बंद बुलाया है। ए के पंकज बता रहे हैं कि कैसे भाजपा को आदिवासियों ने नहीं जिताया है।

81 में से 28 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं। इनमें से 11 भाजपा, आजसू 2, निर्दलीय 2 और झामुमो ने 13 सीटें जीती हैं। दलितों के लिए आरक्षित 9 में से 5 पर भाजपा, 3 पर झाविमो और एक सीट पर आजसू ने कब्जा किया है। अब भाजपा की 37 सीटों में से यदि हम अजजा-अजा की 16 आरक्षित सीटें और वामपंथियों की दो सीटें (धनवार में माले-लिबरेशन और निरसा में मासस) निकाल दें तो सामान्य वर्ग की 19 सीटें बचती हैं. जो मुख्यतः औद्योगिक, शहरी, बाहरी आबादी से अतिक्रमित और बिहार-बंगाल के सीमावर्ती विधानसभा क्षेत्र हैं। जैसे, रांची, धनबाद, बोकारो, बेरमो, गिरिडीह, कोडरमा, जमशेदपुर, घाटशिला, दुमका, गुमला आदि।
लगभग यही स्थिति उन आदिवासी सीटों की भी है जिन पर भाजपा को जीत मिली है। झाविमो, कांग्रेस और आजसू भी अधिकांशतः उन्हीं इलाकों में जीते हैं जहां बहिरागतों का स्पष्ट प्रभाव है। मतलब 81 में से सुरक्षित 37 (28 अजजा और 9 अजा) सीटें निकाल दें तो बचे हुए 44 सामान्य सीटों में से मात्र छह ही झामुमो को मिले हैं जो कि मुख्यतः मूलवासी सदान बहुल सीटें हैं। बहिरागतों के प्रभाव वाला एक भी सीट झामुमो के खाते में नहीं आया है।