टीपू सावधान ! शिवपाल हो सकते हैं बड़े खिलाड़ी

मसीहुद्दीन संजरी

आगामी लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश में विपक्ष के किसी गठबंधन की संभावना की आशा और निराशा के बीच किसी खिलाड़ी रूप में शिवपाल सिंह यादव का समाजवादी सेक्युलर मोर्चा खबरों से बाहर है। सभी निगाहें बसपा और अखिलेश यादव की सपा पर टिकी हैं। कांग्रेस राष्ट्रीय दल और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विकल्प होने के नाते उत्तर प्रदेश में अपनी दावेदारी कायम रखना चाहेगा। ज़मीनी स्तर पर उसके पास हर जनपद में गुटों में बंटे मठाधीश और नेतृत्व का आशीर्वाद प्राप्त रंगरूट तो हैं लेकिन न तो मज़बूत संगठन है और न ही इनका आपस में कोई तालमेल।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने मध्यप्रदेश में अजीत जोगी के साथ गठबंधन कर लिया है और उत्तर प्रदेश में 40 सीटों पर दावेदारी ठोंक कर साफ संकेत दे दिया है कि उसे कांग्रेस की बहुत परवाह नहीं है।

शिवपाल यादव की परिवार से बगावत ने अखिलेश यादव की बारगेनिंग ताकत को कम किया है। हालांकि यह चर्चा में नहीं है लेकिन मायावती के सामने किसी गठबंधन के लिए शिवपाल का विकल्प भी मौजूद है।

अगर अखिलेश यादव बसपा सुप्रीमो की शर्तों पर गठबंधन के लिए राज़ी नहीं होते हैं, अहंकार और अनुभवहीनता के चलते वह कई गलत फैसले ले चुके हैं, तो बसपा सुप्रीमो शिवपाल यादव से गठबंधन कर सकती हैं। इस तरह मायावती ज़मीन पर भाजपा विरोधी मतदाता को यह संकेत दे सकती हैं कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के खिलाफ उनका गठबंधन सबसे मज़बूत विकल्प है।

शिवपाल के सामने खोने के लिए बहुत कुछ नहीं है। अगर ऐसे किसी गठबंधन की सहायता से वह कुछ सीटें जीतने की स्थिति में आते हैं तो समाजवादी पार्टी का यादव वोटर उनकी तरफ आकर्षित हो सकता है। पारिवारिक लड़ाई में शिवपाल के लिए यही सबसे बड़ी संजीवनी होगी।

कांग्रेस खासकर उसके नई पीढ़ी के नेता जिस तरह समाजवादी पार्टी पर हमलावर हैं उससे लगता है कि कांग्रेस ने अखिलेश यादव के साथ गठबंधन के मोह को त्याग दिया है। सपा–बसपा की दावेदारी के बाद कांग्रेस के लिए गठबंधन में सम्मानजनक सीटें पाने की उम्मीद भी न के बराबर होगी। यदि शिवपाल यादव कम सीटों पर संतोष करते हैं तो कांग्रेस के लिए इस गठबंधन में सम्मानजनक गुंजाइश बन सकती है।

रालोद कांग्रेस के साथ ही गठबंधन को वरीयता दे सकती है क्योंकि अजीत सिंह केंद्र में किसी बदलाव की स्थिति में हमेशा की तरह सत्ता से करीब रहना चाहेंगे। यह हालत अखिलेश को संकट में डाल सकती है। शिवपाल यादव को भाजपा के लिए काम करने का आरोप लगाने वाले सपा नेताओं लिए ऐसे में भाजपा की फैली हुई बाहों में समाने का विकल्प भी खुशनुमा लग सकता है।

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