कात्‍यायनी
कुत्‍ता आदतन गन्‍दी नाली में बैठता है और फिर झाड़-झाड़ कर अपना बदन भी साफ करता है। बंदर जुँए निकालते रहते हैं हालाँकि जुँओं से उनका पीछा कभी छूटने का नहीं।
'ट्राई' बुर्जुआ इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के "स्‍वतंत्र","निष्‍पक्ष" और विश्‍वसनीय बनाने की जुगते भिड़ाता रहता है, लेकिन इलेक्‍ट्रानिक मीडिया स्‍वयं बड़े-बड़े पूँजीपतियों और उनकी 'मैनेजिंग कमेटी' (सरकार) के स्‍वामित्‍व में है और जिसका मुख्‍य मकसद ही मुनाफा कूटना है, वह भला "स्‍वतंत्र","निष्‍पक्ष" और "विश्‍वसनीय" कैसे हो सकता है!
16 मई 2012 को दूरसंचार मंत्रालय से प्राप्‍त निर्देश का अनुपालन करते हुए 'ट्राई' ने मीडिया कानून में संशोधन के लिए अध्‍ययन की शुरुआत की थी। अब 'ट्राई' के चेयरमैन राहुल खुल्‍लर ने अपनी सिफारिशों में कहा है कि मीडिया में राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के स्‍वामित्‍व पर अंकुश लगाया जाना चाहिए। दूसरी सिफारिश —- 'निहित हितों के टकराव को देखते हुए सरकार और नियामक को व्‍यावसायिक घरानों के मीडिया क्षेत्र में प्रवेश पर रोक के बारे में गम्‍भीरता से विचार करना चाहिए। इसके लिए किसी व्‍यावसायिक कम्‍पनी द्वारा मीडिया कम्‍पनी में शेयर भागीदारी या ऋण की मात्रा को सीमित करने की व्‍यवस्‍था की जा सकती है।' तीसरी सिफारिश — ' सरकार को मीडिया के क्षेत्र का नियमन नहीं करना चाहिए, टी.वी. चैनलों और समाचार पत्रों- दोनों के लिए एक नियामक प्राधिकरण होना चाहिए, जिसमें कुछ लोग मीडिया के और ज्‍यादातर लोग मीडिया के बाहर के होना चाहिए।' चौथी सिफारिश — 'राजनीतिक और धार्मिक संस्‍थाओं सहित जिन्‍हे मीडिया क्षेत्र में आने से रोकने की सिफारिश की गयी है, ऐसी कम्‍पनियों को अयोग्‍य घोषित करने और प्रसारण क्षेत्र के लिए नया कानून बनने तक उसकी सिफारिशों को कार्यकारी निर्णय के जरिए लागू किया जाना चाहिए।' पाँचवी सिफारिश — 'एडवरटोरियल (लेख और समाचार के कलेवर में प्रस्‍तुत विज्ञापन) और प्राइवेट समझौतों के आधार पर दिये जाने वाले समाचारों के गोरखधंधे पर नियंत्रण के उपाय निकाले जाने चाहिए।'
जाहिर है ये सभी "चाहिए-चाहिए" टाइप सिफारिशें महज हवा-हवाई बातें हैं। यदि इन सिफारिशों को कार्यकारी निर्णय के जरिए लागू भी कर दिया जाये और फिर इन्‍हीं के आधार पर नया कानून भी बना दिया जाये, तो भी एक हजार एक चोर गलियों से पूँजी, मुनाफे, प्रचार और निहित स्‍वार्थों का वह खेल जारी रहेगा, जो अबतक चलता आया है।
किसी भी पूँजीवादी जनवाद के अन्‍तर्गत मुख्‍य धारा का मीडिया सर्वोपरि तौर पर एक व्‍यवसाय या उद्योग होता है, जिसमें पूँजीपति भारी पूँजी लगाते हैं ता‍कि मुनाफा कमा सकें। दूसरे,समस्‍त सरकारी-गैरसरकारी बुर्जुआ मीडिया सूचना तंत्र पर नियंत्रण के द्वारा पूँजीवादी शोषण-उत्‍पीड़न की व्‍यवस्‍था को एकमात्र विकल्‍प के रूप में स्‍वीकार करने के लिए जनमानस को अनुकूलित करता है और शासक वर्ग के वैचारिक-सांस्‍कृतिक-राजनीतिक वर्चस्‍व (ग्राम्‍शीय अर्थों में 'हेजेमनी') स्‍थापित करने की मुख्‍य भूमिका निभाता है। तीसरे, मीडिया पूँजीपतियों के हर प्रकार के माल बेचने के लिए जरूरी प्रचार साधन के रूप में विज्ञापन का मंच देता है, जो आज की गलाकाटू प्रतिस्‍पर्द्धा में बाजार तंत्र का सबसे जरूरी घटक बन गया है। चौथे, अलग-अलग इजारेदार घराने और गुट अपने मीडिया तंत्र द्वारा प्रतिस्‍पर्द्धी घरानों और गुटों को पछाड़ने में प्रचार, लाबिइंग आदि तरह-तरह के हथकण्‍डे अपनाते हैं। पाँचवे, मीडिया का जो हिस्‍सा मंत्रालय या तथाकथित स्‍वायत्‍त निकाय के जरिए सरकार के नियंत्रण में होता है वह ज्‍यादा कुशलता से " स्‍वतंत्रता-निष्‍पक्षता" का दिखावा करते हुए समूचे बुर्जुआ वर्ग के साझा हितों की नीतियों और संस्‍कृति का प्रचार करता है और बुर्जुआ जनवाद के छद्मवारणों एवं विभ्रमों को बनाये रखने का काम करता है।
इसलिए ट्राई की "आदर्शवादी" सिफारिशों की तुलना ऊपर मैंने कुत्‍ते के गंदगी साफ करने और बंदर के जुँए निकालने से की है। ये सिर्फ हवा-हवाई बातें हैं। अव्‍वलन तो ये व्‍यवहार में आ ही नहीं सकती और यदि औपचारिक तौर पर लागू भी होती है तो वास्‍तविक यथास्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मीडिया क्षेत्र में व्‍यावसायिक घरानों के अतिरिक्‍त निवेश करने की औकात भला किसकी होगी? यदि कुछ ऐसे घराने हैं जो केवल मीडिया क्षेत्र में भी पूँजी लगाकर मुनाफा कूट रहे हैं उसके अन्‍य व्‍यावसायिक स्‍वार्थ नहीं हैं, तो भी ऐसे घरानों के अलग-अलग औद्योगिक घरानों के साथ पर्दे के पीछे गुप्‍त सौदे और अनुबंध हो जाते हैं। दूसरी बात, फाजिल अधिशेष संचित होने पर मीडिया मुगल भी मैन्‍यूफैक्‍चरिंग और ट्रेड जैसे सेक्‍टरों में पूँजी लगा देते हैं। यदि इस पर कानूनी रोक भी लग जाये तो दूसरे नामों से शेयर खरीदने और विविध रास्‍तों से पूँजी के निवेश-विकल्‍पों पर रोक लगा पाना किसी भी तरह से मुमकिन नहीं होगा। बुर्जुआ राजनीतिक संगठनों और धार्मिक संस्‍थाओं को अपना टी.वी. चैनल चलाने से यदिे रोक भी दिया जाये तो 'टाइम स्‍लॉट' खरीदकर अन्‍य चैनलों पर अपना प्रोग्राम प्रसारण से उन्‍हें रोका नहीं जा सकता। 'एडवरटोरियल' पर यदि कोई औपचारिक रोक लग भी जाये तो पर्दे के पीछे चैनलों और उनके शीर्ष कर्ताधर्ताओं को मोटी थैलियाँ देकर अपने मनमुआफिक समाचार-प्रसारण से न तो पूँजीपतियों को रोका जा सकता है, न ही राजनीतिक पार्टियों और राजनेताओं को। मीडिया के नियमन के लिए जो भी स्‍वायत्‍त प्राधिकरण बनेगा, वह कभी भी सरकारी नियंत्रण से मुक्‍त नहीं हो सकता क्‍योंकि नियुक्तियों और वित्‍तीय अनुदान एवं नियंत्रण की ताकत हर हाल में सरकार के पास ही होगी। हर स्‍वायत्‍त प्राधिकरण की यही स्थिति होती है। और सबसे बड़ी बात यह होती है कि मीडिया-स्‍वामियों और उनके शीर्ष प्रबन्‍धकों-सम्‍पादकों की अपनी बुर्जुआ प्रतिबद्धता अटूट-निष्‍कम्‍प होती है। समाचारों के चयन और प्रस्‍तुति के पीछे उनकी वही प्रतिबद्धता मूल कारक होती है।
पूँजीवादी प्रतिस्‍पर्द्धा के हर क्षेत्र को अनियंत्रित अराजकता से बचाना और बुर्जुआ जनवाद के आवरण को बचाये रखना बुर्जुआ व्‍यवस्‍था के लिए जरूरी होता है। इसी काम के लिए बुर्जुआ थिंक टैंक समय-समय पर खेल के नये नियम बनाते हैं और सरकारें इस खेल में अम्‍पायर की भूमिका निभाती हैं। जनता की भूमिका इस खेल में 'पैस्सिव' दर्शक की होती है। 'ट्राई' की सिफारिशों को इसी परिप्रेक्ष्‍य में देखा-समझा जा सकता है।
मूल बात यह है कि बुर्जुआ समाज में पूँजी की ताकत से संचालित मुख्‍य धारा का मीडिया जनता का मीडिया हो ही नहीं सकता। 19वीं शताब्‍दी में पत्र-पत्रिकाओं की स्‍वतंत्रता पर इग्‍लैण्‍ड में उठ खड़ी हुई एक बहस में हिस्‍सा लेते हुए कार्ल मार्क्‍स ने लिखा था कि पत्र-पत्रिकाओं की वास्‍तविक स्‍वतंत्रता एकमात्र उनके व्‍यवसाय न होने की स्‍वतंत्रता में निहित है, जो कि बुर्जुआ समाज में असंभव है। जब बुर्जुआ समाज में पत्र-पत्रिकाओं की स्‍वतंत्रता की बात की जाती है तो उसका एकमात्र अर्थ होता है, व्‍यवसाय की स्‍वतंत्रता।
मार्क्‍स की यह उक्ति आज प्रिण्‍ट मीडिया और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया— दोनों पर ही लागू होती है।
कात्यायनी, लेखिका जानी-मानी कवयित्री व सामाजिक कार्यकर्ता हैं।