पीयूष रंजन यादव

विकास के नाम पर यूपी की जंग जीतने का उद्घोष ही मूलतः भ्रामक था।

बदहाल स्वास्थ सेवाओं में एम्बुलेंस भी केवल मरीजों को लाईलाज अस्पतालों तक ले जा रही थी, जहां न डाक्टर थे, न दवाईयां थी और न नर्सिंग की सहूलियत थी और जो थी भी वह बिना पैसे लिए हिलती न थी।

यूपी में सैकड़ों अस्पताल ऐसे हैं, जहा कण्डे पथ रहे हैं, भूसा भरा हुआ है और ढोर ढंगर बन्ध रहे हैं।

शिक्षा व्यवस्था सरकारी विद्यालयों में चौपट है। सरकार के नुमाइंदों ने बालकों की ड्रेस और उनके मिड डे मील को भी पैसा कमाने का माध्यम बनाने से गुरेज नहीं किया। शिक्षा का स्तर तो बस पूछिये ही नहीं।

अधिकांश जिला पंचायतों पर सरकारी लोगों ने कब्जा जमाये रखा और जबरदस्त भ्रष्टाचार पर कोई रोक लगाने की कोशिश तक नहीं की गई।

जिला पंचायतों के मालिक लखपति से करोड़पति रातों रात बने, लेकिन सरकार ऊंघती रही, सोती रही।

यही हाल कमोबेश ब्लॉकों का भी रहा। ब्लॉकों पर तो प्रमुखी सत्ताधीशों ने ऐसे बांटी जैसे किसी रियासत की मनसबदारी बांटी जाती है।

क़ानून व्यवस्था में अधिकाँश मामले सत्ताधारियों के दवाब में दर्ज नहीं हुए और अगर दर्ज हुए तो अपराधियों ने थानों में बैठ कर अपने हिसाब से उनकी जाँच रिपोर्ट लगवाई। ज्यादातर थाने यादवों के हवाले रहे, यहाँ तक कि सीनियर अधिकारी को सुपरसीड करके जूनियर को इंचार्ज बना कर खुले आम भ्रष्टाचार करने के लाईसेन्स दिए गए।

पीयूष रंजन यादवकुछ ख़ास जिलों के नीचे के ओहदे के लोगों की ट्रान्सफर पोस्टिंग करने तक की हिम्मत पुलिस कप्तान नहीं कर पाते रहे।

इस शोषण से अछूते यादव भी नहीं रहे, पिछवाड़े पर लाठियाँ खाने और पिटाई देने में उनके साथ भाई लोगों ने पूरा समाजवाद निभाया।

सरकारी दफ्तरों में बिना रिश्वत कोई काम होना सम्भव नहीं रहा और हिस्सेदारी में समाजवादी नेतागण पूरी निरपेक्षता के साथ शामिल रहे।

कोटेदारों से महीनेदारी तय कर ली गई और ठेकेदारों से कमीशन पक्का रहा और समाजवादियों के पोस्टर, होर्डिंग लगाने से लेकर मीटिंग कराने तक का जिम्मा भी इन्होंने बखूबी निभाया।

देहातों में सड़कें बनी नहीं और बनीं तो 6 महीने से ज्यादा चली नहीं।

बड़का-बड़का ठेका बडका बडका रिश्तेदारों को मिला और तो और 200 करोड़ के छीटे मास्टर जी के कुर्ते तक भी पहुँच गए। यानी भ्रष्टाचार नीचे ही नहीं ऊपर के लेवल तक चाक चौबंद चल रहा था।

मैनीफेस्टो का बेरोजगारी भत्ता एक साल में दम तोड़ गया और लैपटाप वितरण की तय शर्तों में दूसरे साल ही सुधार करना पड़ा।

इतने सब के बाद अब ऐसे में आप 3 किमी लम्बी मेट्रो बनाकर और 300 किमी लम्बी एक सड़क बना कर विकास के नाम पर समर्थन मांगेगे तो जनता आपको ये ही देगी जो आपको मिला है।

पीयूष रंजन यादव, लेखक उत्तर प्रदेश कांग्रेस के पूर्व सचिव हैं।