तावडू का सच और बेटी बचाओ अभियान की हकीकत

तावडू से लौटकर जमात-ए-इस्लामी से जुड़े वासिक़ नदीम की रिपोर्ट

मेवात का इलाक़ा देश का ऐसा क्षेत्र है जो अपनी मिली जुली संस्कृति एवम् नारी सम्मान के लिए प्रसिद्ध है। स्वतंत्रता संग्राम के समय में मेवात के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता और भारत की आज़ादी के पश्चात वहाँ का साम्प्रदायिक सद्भाव आज तक नहीं खराब हुआ। फिर अचानक ऐसा क्या हो गया, जिसके फलस्वरूप इतनी बड़ी घटना सामने आयी?

दिल्ली से मेवात जाते समय मैं इन्हीं विचारो में खोया हुआ था। हरियाणा के नूह ज़िले में तावडू कस्बे से तकरीबन तीन किमी दूरी पर ड़िंगेरहेड़ी नामक गाँव है। उस गाँव के लगभग बीच में नूरुद्दीन का घर है। उस घर से तकरीबन 200 से 300 मीटर की दूरी पर उन्होंने अपने खेत, जो कि मेन रोड से लगभग लगे हुए हैं, खेत में ही आमने-सामने दो कमरे बना रखे हैं। नूरुद्दीन की दो बेटियाँ अपने परिवार सहित मायके आती हैं और गाँव वाले घर के बजाय पूरे परिवार का खेत में बने हुए कमरों में सोने का इरादा बनाता है।

२८ अगस्त की रात में जब पूरा परिवार गहरी नींद में सोया हुआ था, बीच रात में अचानक उन पर हमला होता है। इस से पहले वो कुछ समझ पाते पूरे परिवार की बेरहमी से लोहे की रॉड से पिटाई शुरू हो जाती है। धार्मिक प्रतीकों का नाम लेकर नफरत भरी गालियाँ दी जाती हैं। पूरे परिवार को रस्सियों द्वारा पलंग से बाँध दिया जाता है और कमरे में 22 साल और 15 की नाबालिग लड़कियों से सामूहिक बलात्कार किया जाता है। बाकी लोग की पिटाई जारी रहती है।

बेशर्मी और क्रूरता का ये नंगा नाच सुबह 4 बजे तक चलता रहता है, तब तक नूरुद्दीन के बेटे बहू उस उस लोहे की रॉड की पिटाई द्वारा मौके पर ही मर चुके होते हैं और बेटी दामाद मौत के नज़दीक पहुच चुके होते हैं। उन लड़कियों का 12 साल का भाई, जिसकी उस निर्मम पटाई से गर्दन में फ्रैक्चर हो चुका होता है, किसी तरह जाकर अपने नाना को जगाता है, तब पूरे गाँव को घटना की जानकारी मिलती है।

उसके बाद सामने आता है शासन का क्रूर चेहरा। पुलिस स्टेशन से घटना स्थल की दूरी महज़ पाँच किमी है। पूरे गाँव और कस्बे में इस घटना की जानकारी लोगों के बीच आग की तरह फ़ैल जाती है, लेकिन पुलिस आने को तैयार नहीं होती है न ही fir दर्ज होती है।

घटना के 9 घंटे के बाद नूह के शहीद हसन खान मेवाती मेडिकल कॉलेज के डॉक्टर के फ़ोन पर दी गयी जानकारी के बाद fir दर्ज करी जाती है, वो भी डकैती की, मर्डर की नहीं। उसके बाद पीड़ित लड़कियों को ही पुलिस अपनी कस्टडी में ले लेती है और सामाजिक कार्यकर्ताओं के पूछने पर जवाब दिया जाता है कि इनका डीएनए टेस्ट होगा।

डरी और सहमी हुई पीड़ित लडकियाँ, जिसमें से एक नाबालिग है, उनको सामूहिक बलात्कार के बाद दूसरी पीड़ा पुलिस और शासन द्वारा दी जाती है, जबकि उनके मामा मामी मर चुके हैं और माँ बाप ज़िन्दगी मौत के बीच झूल रहे हैं।

लोगों के भारी विरोध के बाद लड़कियों को पुलिस अपनी कस्टडी से रिहा करती है।

इतनी बड़ी घटना के बाद जिले का कोई भी अधिकारी घटना स्थल पर नहीं पहुँचता और तो और जिलाधिकारी महोदय लड़कियों का बयान लेने उन्हें अपने सर्किट हाउस बुलवाते हैं। किसी मुआवाजे का कोई ऐलान नहीं होता।

इधर ये खबर नारी अत्याचार का रोना रोने वाले चैनलों पर गायब रहती है और एक आध अखबार पुलिस fir को बेस बना कर रिपोर्टिंग कर देते हैं।

बार कॉउंसिल के सदस्यों ने जब पूरी घटना सामने रखी, तब धाराओं में बदलाव हुआ और 302 के तहत मुक़दमा दर्ज हुआ।

सवाल ये है कि अगर वो डकैत थे, तो गाँव के अंदर डकैती करते, गाँव के बाहर बने हुए 8X8 के कमरे से उन्हें क्या मिल सकता था। अगर रेप करने की मँशा से आये थे तो इतनी पिटाई करने की और आतंकित करने की क्या ज़रुरत थी? या मर्डर ही करना था तो मार कर चले जाते, लेकिन पूरी रात मारना आतंकित करना और धर्म आधारित गालियाँ देना कहीं और इशारा करता है। कहीं न कहीं ये घटना किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा है, जो मेवात को सांप्रदायिक आग में झोंकने के लिए करी गयी थी।

दबाव के बाद पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जो पड़ोस के गाँव के हैं, लेकिन सवाल ये है कि सिर्फ चार आदमी इतनी बड़ी घटना को अंजाम कैसे दे सकते हैं?

ज़ाहिर है कि लोगों को बचाया जा रहा है और मामले की गंभीरता को कम किया जा रहा है।

परिवार के डर का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि जमात-ए-इस्लामी के नायब अमीर नुसरत अली ने जब उस लड़के से मेडिकल कॉलेज में बात करी तो उसके अंदर से डर के मारे आवाज़ ही नहीं निकली और वो रोने लगा। बाक़ी सदस्यों का भी यही हाल हाल है।

एक सितम्बर को मेवात इलाक़े की 32 बिरादरियों की महापंचायत बुलाई गयी, जो पहले ड़िंगेरहेड़ी में होनी थी, लेकिन बारिश की वजह से तावडू की मंडी में हुई खराब मौसम के बावजूद 8000 लोग इस महापंचायत में जुटे।

३२ बिरादरियों के मुखिया पूर्व मंत्री विधायक एवम समाजसेवक इसमें जुटे। राजबाला सांगवान, नरेन्द्र टोकस, योगेंद्र यादव. विधायक ज़ाकिर अली और जमात-ए-इस्लामी के महासचिव सलीम इंजीनियर ने इसे संबोधित किया। नूह बार कॉउंसिल के 250 वकील भी इस सभा में थे। रमज़ान अली ने इस महापंचायत का संचालन किया। इस पंचायत ने कुछ मांगे रखीं -

इस पूरे मामले की सीबीआई जांच हो, पीड़ित परिवारों को 50-50 लाख का मुआवज़ा दिया जाए, डीएम और एसपी का तबादला हो और क्षेत्र की पुलिस के खिलाफ लापरवाही का मुक़दमा दर्ज किया जाए।

सभी धर्मो और वर्गों की इतनी बड़ी महापंचायत भी मीडिया में स्थान नहीं पा सकी और बेटी बचाओ का नारा लगाने वाली हरियाणा सरकार के किसी मंत्री या आला अधिकारी ने वहाँ पीड़ित परिवार से मिलने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। मुआवज़े की मांग पर करोडों की कार खरीदने वाली सरकार ने फण्ड की कमी का हवाला दे दिया।

हरयाणा सरकार ने sit जांच का आदेश दे दिया है, लेकिन पुलिस के रवैये को देख कर अभी से जांच के नतीजे बताये जा सकते हैं।

ज़ाहिर है शासन की सहानुभूति पीड़ितों के साथ नही दोषियों के साथ है और ये सोची समझी साज़िश का नतीजा लगती है। इसमें हरियाणा पुलिस और प्रशासन पूरी तरह से इस साज़िश में शामिल हैं, जिस से मेवात के साम्प्रदायिक माहौल को खराब किया जा सके

ये रिपोर्ट लिखे जाने तक हरयाणा वक़्फ़ बोर्ड ने तीन लाख रुपए के मुआवज़े का एलान किया है।

अभी कुछ देर पहले ही इस पूरे मामले को देख रहे अधिवक्ता नूर साहब से बात हुई तो पता चला कि पंचायत की मांगों पर सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। अब इस आंदोलन को बड़ा रूप दिया जायेगा।

पीड़ित नाबालिग की माँ गंभीर स्थिति में मेवात के मेडिकल कालेज में भर्ती है और बाप दिल्ली के aiims के ट्रामा सेण्टर में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है और खट्टर साहब की हरियाणा सरकार बेशर्मी के साथ बेटी बचाओ का हवाई नारा लगा रही है।

September 5,2016 09:26