अमलेन्दु उपाध्याय
खण्डित जनादेश आने के बाद अब दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगना लगभग तय है। बीते गुरुवार शाम भाजपा द्वारा उपराज्यपाल से साफ कह देने कि पूर्ण बहुमत नहीं मिलने की वजह से वो दिल्ली में सरकार नहीं बनाएगी, राष्ट्रपति शासन ही एकमात्र विकल्प बचा लगता है, क्योंकि आम आदमी पार्टी ने पहले ही घोषणा कर रखी है कि वो कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने नहीं जा रही। हालांकि कांग्रेस के कई बड़े नेताओं द्वारा आप को समर्थन देने की पार्टी नेतृत्व से मांग और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के बयान कि कांग्रेस दिल्ली में सरकार बनाने के लिए ‘आप’ को बाहर से समर्थन देने पर विचार करेगी, के बाद ‘आप’ को सरकार बनाने के लिए बिना शर्त समर्थन का पत्र देने के बावजूद ‘आप’ का सरकार न बनाने का फैसला आश्चर्यजनक तो नहीं है लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव के लिहाज से एक रणनीतिक फैसला जरूर है।
अब सवाल उठ रहे हैं कि सबसे बड़ा दल होने के बावजूद भाजपा ने सरकार बनाने से क्यों इंकार कर दिया और कांग्रेस का बिना शर्त समर्थन मिलने के बावजूद दूसरा सबसे बड़ा दल आप सरकार क्यों नहीं बना रहा। हालांकि सरकार बनाने के लिए भाजपा और आप दोनों ही लालयित हैं बस दिक्कत एक है कि लोकसभा चुनाव सिर पर है और उसमें सरकार बनाने के बाद दोनों ही दलों की कलई खुल सकती है।
पहले बात भाजपा की की जाए, तो याद होगा कि 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी ने 13 दिन की सरकार बनाई थी। उस समय भी भाजपा केंद्र में सबसे बड़ा दल बनकर उभरी थी लेकिन अटल जी समेत सारी भाजपा जानती थी कि सदन के तल पर बहुमत साबित नहीं होगा, उसके बावजूद भाजपा ने सरकार बनाई। इसी तरह उत्तर प्रदेश में वह कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह दोनों के ही नेतृत्व में लंगड़ी सरकार न केवल चला चुकी है बल्कि 18 माफियाओं को मंत्री बनाकर यह सरकार चलाई गई थी। जो लोग अतीत में सुखराम और शिबू सोरेन के साथ मिलकर सरकारें बना और चला चुके हैं अगर वे दिल्ली में बहुमत के नजदीक होने के बावजूद सरकार नहीं बना रहे हैं तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भाजपा का तोड़-फोड़ की राजनीति में कोई विश्वास नहीं रह गया है और ऐसा भी नहीं है कि लोकसभा चुनाव गुजर जाने के बाद वह तोड़-फोड़ कर सरकार नहीं बनाएगी। बल्कि भाजपा की असल समस्या यह है कि अगर वह अभी थोड़ा सा लालच करके सरकार बनाती है तो पहली बात कांग्रेस और आप मिलकर उसकी सरकार गिरा देंगे। हालांकि बहुमत जुटाना उसके लिए बाएं हाथ का काम है क्योंकि आप के जो विधायकगण चुनकर आए हैं उनमें अधिकांश को ‘अंधे के हाथ बटेर लगी है’ और राजनीतिक तौर पर वे परिपक्व भी नहीं हैं (हो भी नहीं सकते जब उनके कमांडर अरविंद केजरीवाल ही परिपक्व नहीं हैं)। इसलिए आप का काम तमाम करके भाजपा सरकार तो बचा ले जाएगी (और दोबारा चुनाव की घोषणा न हुई तो लोकसभा चुनाव के बाद सरकार भाजपा बना ही लेगी), लेकिन लोकसभा चुनाव सिर पर है और कांग्रेस को उसके खिलाफ एक नैतिक मुद्दा बनाने का मौका मिल जाएगा।
सुनते हैं आप ने सवाल किया है कि क्या लोकसभा चुनाव में भी अगर स्पष्ट बहुमत न मिला तो भाजपा जोड़-तोड़ कर सरकार नहीं बनाएगी और विपक्ष में रहेगी। सवाल तो जोरदार है और इस सवाल पर भाजपा तिलमिला भी गई है। हालांकि अभी तक जो सूरत-ए-हाल हैं उनमें ऐसी नौबत आती नहीं दिख रही कि भाजपा तोड़-फोड़ कर या समझौते करके केंद्र में सरकार बनाने के नज़दीक भी पहुंच सके लेकिन यही प्रतिप्रश्न श्रीयुत् केजरीवाल जी से भी हो सकता है कि क्या वह लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस या भाजपा के समर्थन से सरकार नहीं बनाएंगे ? दरअसल केजरीवाल के सामने भी संकट गंभीर है। वह आसमान से चंदा मामा लाने के वादे के साथ एक ताकत बनकर तो उभरे हैं लेकिन चंदा मामा को ला पाना मुश्किल ही नहीं असंभव है। ऐसे में अगर वह अभी सरकार बना लेते हैं तो उनकी भी कलई खुल जाएगी और यह साबित हो जाएगा कि नारे लगाना और धरातल पर काम करने में जमीन आसमान का फर्क है। छद्म आंदोलनकारी, एनजीओ किंग, आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल असल राजनीति में आकर फँस गए हैं? क्योंकि राजनीति में प्रवेश न करके राजनीतिज्ञों को गाली देना बड़े फायदा का सौदा है लेकिन राजनीति में आने पर जनता सवाल भी करती है। दिल्ली में आप की सरकार बने या न बने लेकिन सवाल उठने शुरू हो गए हैं। अब ये सिलसिला शुरू हुआ है तो देश की तमाम समस्याओं पर आप को जवाब भी देने होंगे क्योंकि मुख्यधारा की राजनीति, कवि सम्मेलन का मंच नहीं है जहाँ आप सड़कछाप चुटकले सुनाकर भी छा जाएं। राजनीति हर मुद्दे पर आपका पक्ष जानना चाहती है। यही मुख्य कारण है कि केजरीवाल इस समय सरकार बनाने से कन्नी काट रहे हैं।
हां, अगर दोबारा चुनाव की नौबत आती है तो इसके लिए साफ तौर पर भाजपा और आप दोनों ही बराबर के जिम्मेदार होंगे लेकिन क्या गारंटी है कि नए सिरे से चुनाव होने के बाद भाजपा या आप को बहुमत हासिल हो जाएगा या फिर भी त्रिशंकु विधानसभा नहीं बनेगी। वैसे भी केजरीवाल के लिए यह एक सुअवसर था, वह भले ही कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाते लेकिन बनाते। जाहिर है संसदीय राजनीति में अंतिम लक्ष्य सरकार बनाना ही है और इसका अवसर उन्हें मिल रहा था। अभी पांच महीने लोकसभा चुनाव में बाकी हैं, अगर आप अच्छा काम करके दिखाती और बिजली के बिल कम करके और भ्रष्टाचार मिटाकर दिखाती तो हो सकता है कि वह देश भर में कांग्रेस और भाजपा का विकल्प बन जाती। लेकिन याद रखना चाहिए कि आप को मिला समर्थन उसकी नीतियों को नहीं मिला है बल्कि यह मौजूदा व्यवस्था के प्रति लोगों का गुस्सा प्रकट हुआ है और इससे कहीं कई गुना अधिक गुस्सा 1977 और 1989 में फूटा था लेकिन उस गुस्से का गुब्बारा पहली बार ढाई साल में और दूसरी बार लगभग डेढ़ साल में फूट गया। सत्ता विरोधी और भ्रष्टाचार विरोधी जेपी के आंदोलन से ही लालू, नितीश, शरद सरीखे लोग निकलकर आए और आज वे किस धारा में हैं, कहने की कोई आवश्यकता नहीं है। आप और केजरीवाल का तो इस तरह का कोई आंदोलन का इतिहास भी नहीं है वह तो कॉरपोरेट घरानों और कॉरपोरेट मडिया की पालकी पर सवार होकर आए हैं, हमें नहीं लगता कि उनका गुब्बारा फूटने में तीन महीने का भी समय लगेगा भले ही वे सरकार बनाएं या सरकार से बाहर रहें या दिल्ली को दोबारा चुनाव की तरफ धकेल दें। वैसे भी दोबारा चुनाव कराने की नौबत जनादेश के कारण नहीं है। जनादेश स्पष्ट है या तो भाजपा सरकार बनाए या आप बनाए। और अगर दोबारा चुनाव होता है तो इसके लिए भाजपा और आप के निहित स्वार्थ जिम्मेदार होंगे जनादेश नहीं।
अमलेन्दु उपाध्याय: लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं। http://hastakshep.com/oldold के संपादक हैं.