तुम कौन हो दिल्ली ?
तुम्हारी किस्मत तो
कुरुक्षेत्र और पानीपत में तय होगी,
मगर तुम्हें गरूर है
दूर-दूर तक फैले इलाकों की किस्मत
तुम तय करती आई हो
तय करती रहोगी.

सच बताऊं ?
तुम्हारी बांहों में
अपनी रातें बिताकर
मैं वापस लौट जाता हूं.
हां, जेब से नोट निकालकर
तुम्हें देना नहीं भूलता.
यही दस्तूर है.
आख़िर मुझे फिर से आना है
इसी दरवाज़े पर,
इसके अलावा
इन्हीं के बल पर
तुम्हें ज़िंदा भी तो रहना है.

ग्राहक को ताड़ते हुए
तुम उसकी ज़ुबान बोलती हो.
जब तक वो
तुम्हारा मेहमान होता है
तुम उसका ख़्याल भी रखती हो.
अपनी तसल्ली
और उसकी सहुलियत के लिये
तुम सजी-धजी रहती हो.
वो ख़ुश रहता है,
क्या तुम भी ख़ुश हो ?

एक नाले के किनारे
तुम बसी हुई थी.
आज वो तुम्हारे जिस्म के
बीचोबीच बहता है.
उसके किनारे-किनारे
पनप रही है एक बीमारी,
एकदिन वह जानलेवा साबित होगी.
तब तक के लिये
अपने चेहरे के रोगन में
तुम मसरूफ़ हो,
मसरूफ़ रहोगी.

तुम्हारा हिसाब चुकाकर
जब मैं अपनी दुनिया में लौट जाता हूं,
झांकता हूं एकबार
तुम्हारी आंखों में -
क्या सबकुछ वैसा ही रहा,
जैसा तुम चाहती थी ?
तुम्हारी आंखें कुछ नहीं कहती हैं.
मुझे पता नहीं
तुम क्या चाहती थी
क्या चाहती हो
तुम कौन हो
बस, इतना पता है -
अगली बार भी तुम इसी तरह मिलोगी.

बस, इतना पता है -
तुम्हारी किस्मत
कुरुक्षेत्र और पानीपत में तय होगी.
उज्ज्वल भट्टाचार्या