जब हत्या ही करनी है तो फिर न्यायालयी ड्रामेबाजी की जरूरत क्या है?
इस बर्बर हत्या कांड में दिल्ली से लेकर हैदराबाद तक शामिल है। यह बटला हॉउस और इशरत जहाँ इनकाउंटर की ही तरह एक फर्जी इनकाउंटर है, जिस में जान-बूझ कर अभियुक्तों को गोली मारी गई है।
7 अप्रेल को तेलंगाना और आंध्र में पुलिसिया आतंकवाद की जो बर्बर घटना घटी है उसे भारतीय लोकतंत्र, संविधान, कानून और न्यायालयीन व्यवस्था का सामूहिक बलात्कार कहने में हमें कोई संकोच नहीं होना चाहिए। इसे इनकाउंटर का नाम दिया जा रहा है लेकिन हर कोई यह महसूस कर सक्ता है कि यह बर्बर और कायर्तापूर्ण नरंसहार है, यह पुलिसिया आतंकवाद है, यह हत्या का वही पैटन है जो 56 इंच की छाती वाले गुजरात में करते रहे हैं।
तेलंगाना की बहादुर पुलिस ने एक के बाद एक हत्या की दो वारदातों में 7 मुस्लिम युवकों को मौत के घाट उतार दिया, जब्कि आंध्रप्रदेश की पुलिस ने 20 लोगों को चंदन तस्कर कहकर गोलियों से भून दिया। इन तीनों वारदातों को पुलिस की ओर से वास्तविक इनकाउंटर का नाम दिया जारहा है, लेकिन यह वास्तविक इनकाउंटर कितना वास्तविक हैं? इसका अंदाजा इस पर उठने वाले सवालों से लगाया जा सकता है, कि जिनका कोई जवाब न तो पुलिस के पास है न ही सरकार के पास।
आश्चर्य की बात यह है कि यह घटनाएं देश के उस राज्य में घटित हुई हैं जो आंध्र प्रदेश के रूप में न्याय और कानून को बनाए रखने का अधिक दावेदार था और जिसने मई 2007 को हुए मक्का मस्जिद बम धमाके के आरोप में गिरफ्तार निर्दोष आरोपियों को मुआवजा देकर कानून और न्याय के वर्चस्व की एक मिसाल कायम की थी। परन्तु यहाँ यह बहस नहीं है कि यह बर्बर घटनाएं किन राज्यों में और किन पार्टियों के शासन में घटीं, प्रश्न यह है कि यह क्यों और किनके इशारों पर हुईं? क्यों तेलंगाना पुलिस ने सात ऐसे आरोपियों को मौत के घाट उतार दिया जो अपनी अदालती कार्रवाई के बिल्कुल अंतिम चरण में थे और क्यों आंध्र प्रदेश पुलिस ने चंदन तस्करी करने के आरोप में 20 लोगों को गोलियों से भून दिया?
हम बात करेंगे पहले तेलंगाना की। 6 अप्रेल 2015 को राज्य के नलगोंडा जिला में पुलिस ने एक इनकाउंटर में दो लोगों को मार डाला और दोनों की पहचान प्रतिबंधित संगठन सिमी के सदस्यों के रूप में हुई। यह पहचान करने वाला सिमी का कोई पूर्व सदस्य नहीं बल्कि मध्य प्रदेश की वह पुलिस थी जिसे हर मुस्लिम युवा सिमी का सदस्य नजर आता है और सिमी पर प्रतिबंध लगने के बाद से आज तक वहाँ सिमी के नाम पर मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी जारी हे। यहाँ यह ज्ञात रहे कि मीडिया ने इन दोनों को खुले तौर से “सिमी के गुर्गे” बताया, जबकि अभी तक किसी अदालत से यह साबित नहीं हुआ था।
अभी इस इनकाउंटर के फर्जी होने की आवाजें उठ ही रही थीं कि दूसरे दिन ही तेलंगाना पुलिस ने एक और कारनामा अंजाम देते हुए वारंगल जिला में हैदराबाद से 80 किलोमीटर दूर एलोर और के जानगांव के बीच बस के अन्दर ही 5 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। इन लोगों का सम्बन्ध पहले सिमी से बताया गया, लेकिन शाम होते-होते यह “तहरीक ए गलबा ए इस्लाम” के संस्थापक और सदस्य बन गए, जो शायद इंडियन मुजाहिदीन जैसा ही कुछ हो कि जिसका छोर-सिरा आज तक कोई नहीं जान सका है। उनके बारे में पुलिस के हवाले से मीडिया में जो खबरें आईं उनके अनुसार इन लोगों को वारंगल की जेल से हैदराबाद की कोर्ट में सुनवाई के लिए लाया जा रहा था कि रास्ते में ही यह लोग पुलिस से उनका हथियार छीन कर भागने की कोशिश करने लगे, जिसके बाद पुलिस ने उन्हें मार गिराया। पुलिस के माध्यम से उसे एक असली इनकाउंटर साबित करने की कोशिश में कुछ इसे फोटोग्राफ मीडिया हाउस को रिलीज़ हो गए जो पुलिस के दावे को झूठ का पुलिंदा बना देते। वैसे भी झूठ हमेशा अपना रंग प्रदर्शित कर ही देता है।
पुलिस का कहना है कि पांचों युवक पुलिस से हथियार छीन कर भागने की कोशिश कर रहे थे और उन्हें रोकने के लिए गोलीबारी की गई जिसमें पांचों मारे गए। अगर पुलिस की कहानी को थोडी देर के लिए भी सच मान लिया जाए तो सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि यह कैसे संभव है कि 5 लोग 17 से अधिक पुलिसकर्मियों की पकड़ और निगरानी में हों, हाथों में हथकड़ियां पहने चारों ओर से बंद गाड़ी में हों और अचानक पुलिसवालों से उनके हथियार छीन कर भागने की कोशिश करने लगें? इसके अलावा मरने के बाद भी इन अभियुक्तों की हथकड़ियाँ सीट के आर्म से बंधी हुई थीं और पोलिस की गोलियां उन के सिरों में लगीं थीं। शायद पुलिस ने जल्दबाजी में उनकी हथकड़ियां खोलना भूल गई थी।
यह कैसे संभव है कि कोई हथकड़ियों में जकड़ा हुआ व्यक्ति अपनी सीट पर बैठे-बैठे पुलिस के हथियार भी छीन ले और भागने की कोशिश भी कर डाले? पुलिस का कहना है की यह पांचो बहुत खूंख्वार आतंकी थे, फिर ये कैसे मुमकिन है के पांच खूंख्वार आतंकियों के हमले में एक भी पुलिस वाले को एक खरोंच भी ना आए? इसके अलावा मृतक वक़ारुद्दीन अहमद के पिता मोहम्मद अहमद और मृतक सैयद अमजद अली के भाई सैयद इम्तियाज अली का 8 अप्रेल को हैदराबाद में एक संवाददाता सम्मेलन में यह दावा इस इनकाउंटर को स्पष्ट रूप से हत्या साबित करने के लिए पर्याप्त है कि आरोपियों ने कई बार अदालत के सामने पुलिस की ओर से अपनी जान को खतरा होने की आशंका जताई थी और कोर्ट से जेल बदलने का अनुरोध किया था।
दरअसल यह फर्जी इनकाउंटर पुलिस की ओर बदले की कार्यवाही है जिस में 2 दिन पहले एक मुठभेड़ में 2 पुलिस वाले मरे गए थे और जिस में दो मुस्लिम युवक मारे गए थे। वह मुठभेड़ कितना असली था? अभी उसकी जाँच होनी बाकी थी की पांच और लोगों को मरडाला गया। यहां यह तथ्य भी मद्देनजर रहे कि इस फर्जी इनकाउंटरस में केवल वही पुलिस वाले शामिल नहीं हैं जिन्हों ने गोलियां चलाईं और जो घटना के समय वहां मौजूद थे, इस मामले में राज्य के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ-साथ सीधे तौर पर केन्द्रीय ख़ुफ़िया एजेंसियां ​​भी शामिल हैं। क्योंकि पुलिस चाहे किसी भी राज्य की हो, वह स्वयं अपने अंदर इतना दमखम नहीं रखती कि कोई ऐसी कार्रवाई करे जिस के छानबीन की संभावना हो। इस बर्बर हत्या कांड में दिल्ली से लेकर हैदराबाद तक शामिल है। यह बटला हॉउस और इशरत जहाँ इनकाउंटर की ही तरह एक फर्जी इनकाउंटर है, जिस में जान-बूझ कर अभियुक्तों को गोली मारी गई है।
अब बात 20 चंदन तस्करों के नरसंहार की। यह बर्बरता आंध्रप्रदेश पुलिस ने राज्य के चितूर जिले के शीशाचिलम के जंगलों में अंजाम दिया है। पुलिस के अनुसार १५० सनदल तस्करों ने पुलिस पर हमला किया था जिसके बाद पुलिस ने 20 चंदन तस्करों को मार गिराया। दिलचस्प बात यह है की इस मुठभेड़ में भी एक भी पुलिस वाले को कोई जहमत नहीं हुई. यह मुठभेड़ इस लिए भी नरंसहार है की मुठभेड़ के दिन ही शाम होते-होते मृतकों की लाशों से बदबू उठने लगी थी और उनके चारों ओर संदल की जो लकड़ियाँ बिखरी हुई थीं वह कई दिन पहले की कटी हुई थीं। चंदन तस्करों द्वारा पुलिस पर हमले की बात इसलिए भी संदेहास्पद है कि यह कारोबार पुलिस की संलिप्ता पर निर्भर करता है और तस्कर किसी मामले में पुलिस के खिलाफ नहीं जा सकते। लेकिन अगर यह स्वीकार भी कर लिया जाए कि यह सभी मरने वाले चंदन तस्कर थे और उन्होंने पुलिस पार्टी पर हमला किया था तो पुलिस या आंध्रप्रदेश सरकार के पास इस बात का कोई औचित्य है कि उन्हें मार ही दिया जाए?
भारत में कानून सबके लिए समान है। चाहे वह कोई चंदन तस्कर हो या कोई बड़ा नौकरशाह या कॉर्पोरेट दुनिया का कोई साहूकार। कानून के प्रावधान सब पर समान रूप से लागू होते हैं। अब यदि कोई तस्कर चंदन की लकड़ी चोरी करके सरकार को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचा रहा है तो क्या उसके अपराध की वही प्रकृति नहीं होगी जो किसी ब्योरोकरेट या कॉरपोरेट सेक्टर के कोई साहूकार द्वारा टैक्स चोरी करके देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँचाने की होगा? क्या केवल इसलिए कि चंदन तस्कर जंगलों में रहकर कानून का उल्लंघन कर रहे हैं, उनको क़त्ल कर दिया जाए और जो सफेदपोश हमारी सोसायटी में रह कर देश को अरबों रुपए का चूना लगा रहे हैं उनकी ओर से आंख मूंदे लीया जाए? अगर यही न्याय है तो ऐसे न्याय पर लानत है।
सवाल यह पैदा होता है कि जब देश में न्याय और न्यायपालिका का एक सिस्टम मौजूद है और जिसका वर्चस्व सरकारी आदेश से भी ऊंचा है तो इसकी क्या जरूरत आन पड़ती है कि किसी आरोपी को न्यायिक व्यस्था से गुज़ारे बिना उसकी हत्या करदी जाए? तो इसका जवाब बिल्कुल स्पष्ट है। हमारे देश का औसत वर्ग जिसकी नज़र बस सरकार के द्वारा परोसने जाने वाले 'सत्य' तक ही सीमित होती है, वह आरोपियों के इस अंजाम को बेहतर समझता है कि सालों-साल न्यायिक प्रक्रिया में गुजारने के बजाए आरोपियों को मुठभेड़ में मार दिया जाए चाहे वह मुठभेड़ फर्जी ही क्यों ना हो । इनकाउंटर का यह कोंसेप्ट अंडरवर्ल्ड के लोगों के साथ विशिष्ट था, मगर गुजरात की मोदी सरकार ने इसे विस्तार देते हुए इसका दायरा मुसलमानों और अपने विरोधियों तक फैला दिया था। अब यह देश की परंपरा बन चुका है। इस परंपरा के बनने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका न्यायपालिका ने निभाई है जो अपराधी की सत्यता से परिचित होने के बावजूद वर्षों यह फैसला करने में असफल रहती है कि आरोपी महज आरोपी है या अपराधी। इस लिहाज से देखा जाए तो यह हमारे देश की न्यायिक प्रणाली की विफलता भी है।
सिमी के आरोप में गिरफ्तार सात मुस्लिम युवकों और चंदन तस्करी के आरोप में 20 लोगों की हत्या हमारी पुलिस और प्रशासन की इस मानसिकता को उजागर करता है कि कानून और न्याय की ऐसी-तैसी, हम जो चाहेंगे करेंगे, हम से कोई सवाल नहीं कर सकता । अगर ऐसा नहीं होता तो नियमित रूप से बसों में बिठा कर, हाथों में हथकड़ियां पहना कर सर और पेट में बहुत निकट से गोली मारकर उसे इनकाउंटर का नाम नहीं दिया जाता, और जंगल में लोगों की लाशें बिछाकर उसे पुलिस मुठभेड़ का नाम नहीं दिया जाता। यह क़ानून,न्याय और न्यायपालिका का सामूहिक बलात्कार है। यह साफ और प्रकट रूप से हत्या है। केंद्र में सांप्रदायिक और फासीवादी सरकार के गठन के बाद से पूरे देश का प्रशासन फासीवाद और सांप्रदायिकता का शिकार हो रहा है, अगर समय रहते इस पर रोक नहीं लगाई गई तो यह फासीवादी शक्तियां मीडिया और प्रशासन की तरह कानून और न्याय पालिका को भी अपने घर की चेरी बना लेंगी।
आजम शहाब