अमलेन्दु उपाध्याय
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के छठे चरण के दौरान ग्रेटर नोएडा में 26 फरवरी 2012 को एक रैली को संबोधित करते हुए तत्कालीन टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि संसद में बैठे हमारे सांसदों में बलात्कारी और हत्यारे शामिल हैं। केजरीवाल ने कहा था कि देश की संसद में बैठे 162 सांसदों पर बेहद संगीन मामले दर्ज हैं। इनमें बलात्कार और हत्या जैसे मामले जुड़े हैं। उन्होंने कहा था कि जहां ऐसे लोग बैठे हों वहां से न्याय की आस करना ही बेमानी है। उन्होंने कहा था कि अब तो संसद ही एक समस्या बन गई है।
आश्चर्यजनक रूप से अरविंद केजरीवाल अब उन्हीं हत्यारों और बलात्कारियों (उनके ही अनुसार) की जमात में शामिल होने के लिये धरती आसमान एक किए दे रहे हैं। खैर उसमें भी कोई बुरी बात नहीं है, यह राजनीति में दस्तूर सा बनता जा रहा है जिसे गाली दो समय आने पर उसी से हाथ मिला लो। केजरीवाल ने उस कांग्रेस के समर्थन से, जिसके खिलाफ 300 पृष्ठों से अधिक की चार्जशीट उन्होंने जारी की थी, सरकार बनाकर अपनी अवसरवादिता साबित कर दी। लेकिन अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को अवसरवादिता की छूट नहीं दी जा सकती है क्योंकि वे तो इन्हीं राजनेताओं और दलों से मुक्ति दिलाने के नारे के साथ उतरे हैं।
हाल ही में केजरीवाल ने अपने 20 ईमानदार प्रत्याशियों की सूची जारी की लेकिन यह सूची ही विवादों के घेरे में आ गयी, यहां तक कि नागपुर में तो उनकी पार्टी दो-फाड़ हो गई और “नागपुर आम आदमी पार्टी” के नाम से नया गठन हो गया। मीडिया में आई खबरों के मुताबिक नागपुर के सूचना अधिकार कार्यकर्ता मोहन कारेमोरे का साफ मानना है कि अंजलि दमानिया को नागपुर में कौन जानता है? और तो और वे स्वयं नागपुर को कितना जानती हैं ? कोरेमोरे ने अंजलि दमानिया के पति अनीश दमानिया पर डेढ़ हजार करोड़ के भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है और शीघ्र ही सारे दस्तावेजों के साथ सामने आने की घोषणा की है। इससे पहले भी अंजलि दमानिया पर एक जमीन के लैंड यूज़ परिवर्तन के जरिए भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे तब अरविंद केजरीवाल ने घोषणा की थी कि उनका आंतरिक लोकपाल मामले की जाँच करेगा जिसमें सुप्रीम कोर्ट के तीन अवकाशप्राप्त जज होंगे। लेकिन उस लोकपाल का क्या हुआ, जाँच हुई कि नहीं, कुछ पता नहीं चला और अब दमानिया नागपुर से मैदान में उतार दी गईँ।
इसी तरह अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ ताल ठोंक रहे कुमार विश्वास पर एक स्टिंग ऑपरेशन में आरोप लगे। सारी दुनिया को भ्रष्टाचारी और चोर घोषित करने वाले केजरीवाल और उनकी मंडली ने स्टिंग को ही गलत ठहरा दिया। मामला अब अदालत में और कुमार विश्वास चुनाव मैदान में हैं।
दिल्ली में उतारे गये संपादक से नेता बने आशुतोष भी सवालों के घेरे में हैं और उनका भी आप के स्थानीय कार्यकर्ता विरोध कर रहे हैं। मीडिया की खबरों के मुताबिक बुधवार को ‘आप’ कार्यकर्ताओं ने तिलक लेन स्थित केजरीवाल के घर के बाहर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी किसी ‘बाहरी’ को टिकट देने का विरोध कर रहे थे। उनका यह भी कहना था कि शुरू से ‘आप’ से जुड़े रहे किसी कार्यकर्ता को टिकट न देकर ऐसे शख्स को टिकट दिया गया है जो हाल ही में पार्टी में शामिल हुआ है। बहरहाल, ‘आप’ ने ठीक उसी तरह से इन प्रदर्शनकारियों से यह कहकर अपना पल्ला झाड़ लिया कि ये उसके कार्यकर्ता नहीं थे, जैसे संघ परिवार ने असीमानंद या साध्वी प्रज्ञा से अपना पल्ला झाड़ लिया था।
आशुतोष पत्रकारिता जगत में ही काफी विवादों में हैं। आरोप हैं कि जब आईबीएन-7 से ठोक भाव में मीडियाकर्मियों की छँटनी की गई तब उसमें आशुतोष का अहम रोल था और उस समय तो वे अंबानी की नौकरी बजाते रहे, आज शहीद बन गए। इसी तरह परमाणु करार पर संसद में वोटिंग के समय कुछ सांसदों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगे। एक चैनल ने स्टिंग किया परन्तु उसे सही समय पर चैनल पर नहीं दिखाया गया।
इन 20 ईमानदार लोगों में सर्वाधिक विदादास्पद नाम खालिद परवेज़ का है। खालिद मुरादाबाद से कांग्रेस सांसद अजहरउद्दीन के खिलाफ उम्मीदवार बनाए गए हैं। खालिद परवेज ने अपने लगभग 25 साल के राजनैतिक कैरियर में कपड़ों की तरह दलों की अदला-बदली की है। 1989 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में विधान सभा चुनाव में पहली बार किस्मत आजमाने वाले खालिद परवेज जनता दल, कल्याण सिंह की राष्ट्रीय क्रांति पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से भी चुनाव लड़ चुके हैं। दो बार समाजवादी पार्टी में गये और बाहर आ गये। चर्चा है कि बीच में कांग्रेस में भी घुसपैठ करने की उन्होंने कोशिश की और 2012 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में पीस पार्टौ से भी उनकी बातचीत चली। परवेज बीड़ी नंबर 92 के मालिक भी हैं यानी तम्बाकू का करोबार करते हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि खालिद परवेज, बैंक ऑफ बड़ौदा की बदायूं शाखा से डिफाल्टर घोषित हैं और उनके खिलाफ सरफेशी एक्ट के तहत नोटिस भी जारी हो चुका है। अब उनकी संपत्ति कुर्क और नीलाम करने की तैयारी चल रही है। अब केजरीवाल साहब ने खालिद परवेज को ईमानदारी की टोपी पहना दी है और कल जब बैंक खालिद परवेज की संपत्ति की कुर्की करेगा तब केजरीवाल, सरकार पर बदनीयती से कार्रवाई करने का आरोप लगाकर बैंकों को बंद करने की मांग करते हुए धरने पर बैठ जाएंगे, जैसे सोमनाथ भारती को बचाने के लिए धरने पर बैठ गए थे?
ये तो वे कुछ प्रकरण हैं जो 20 प्रत्याशियों में ही सामने आ गए हैं। फर्ज कीजिए अगर आप ने 500 प्रत्याशी भी घोषित किए तो क्या हाल होगा ? सवाल यह है कि क्या ऐसे प्रत्याशियों के बल पर ही केजरीवाल और आम आदमी पार्टी राजनीति को बदलने का दावा कर रही है? क्या जिस सूची में ऐसे लोग बैठे हों वहां से न्याय की आस करना अब बेमानी नहीं है ?
केजरीवाल के पैंतरों पर सवाल तो लगातार उठ रहे हैं। मसलन उन्होंने जनलोकपाल के लिए अपनी सरकार कुर्बान करने की घोषणा की। अब सवाल है कि केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं या प्रधानमंत्री पद के ? अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं तो उनके जनलोकपाल से बाकी सारे देश को क्या लेना-देना ? और अगर प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं तो सही क्यों नहीं बोलते कि सरकार कुर्बान करना ड्रामा था, असल मकसद लोकसभा चुनाव लड़ना है। जब सरकार बनाई गई थी तब केजरीवाल ने दावा किया था कि दिल्ली की जनता ने सरकार बनाने के लिए रायशुमारी में सहमति दी थी, लेकिन सरकार का इस्तीफा देते वक्त जनता से रायशुमारी करने की जरूरत नहीं समझी गयी, आखिर क्यों ?
इसी तरह केजरीवाल को देश के संविधान से बहुत दिक्कते हैं लेकिन आंदोलकारी कर्मचारियों को एस्मा लगाने की धमकी देने से कोई गुरेज नहीं है।
क्या अब भी केजरीवाल की बातों का भरोसा किया जाए ?
अमलेन्दु उपाध्याय, लेखक राजनीतिक विश्लेषक व हस्तक्षेप.कॉम के संपादक हैं।