कैलाश सत्यार्थी

दो दिन पहले राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने राज्य सरकार के हवाले से एक गम्भीर खुलासा किया है कि उत्तराखण्ड त्रासदी के कारण 1227 बच्चे लापता हो गये हैं। यह आँकड़ा राज्य के स्थानीय बच्चों का है जिनमें कई तो दुर्भाग्यवश मृत्यु के मुँह में समा गये होंगे। किन्तु इस बात की भी बहुत बड़ी सम्भावना है कि कई बच्चों को चुराकर, बहला-फुसलाकर अथवा जोर जबर्दस्ती से बाल दुर्व्यापार का शिकार बनाया गया हो। हालाँकि यह आँकड़ा काफी विवादास्पद हो गया है। क्योंकि प्रान्त के अलग-अलग मन्त्रालय इसके स्रोत और आधार को एक-दूसरे पर टाल रहे हैं। सरकारी बयान में कहा गया है कि एक महीने तक इनकी सूचना न मिलने पर इन्हें मृत घोषित कर दिया जायेगा। हमारे विचार से ऐसा करना बड़ी विडम्बनापूर्ण बात होगी।

उत्तराखण्ड त्रासदी के अनेकों पहलू हैं। कारणों के, और परिणामों के भी। जन और सम्पत्ति की हानि एक तात्कालिक परिणाम है जो नजर आता है। परन्तु दूरगामी नतीजे कम गम्भीर नहीं हैं। प्रकृति के इस प्रकोप से उपजी परिस्थितियों में दसियों हजार बच्चे किसी न किसी रूप में प्रभावित हो चुके हैं जो अकाल मृत्यु के मुँह में चले गये। उनके बारे में जानकारी जुटाने और सम्वेदना व्यक्त कर देने की रस्म-अदायगी भर से काम नहीं चलेगा। चार हजार गाँवों के हजारों बच्चों का शिक्षा तन्त्र ध्वस्त हो चुका है। उनके माता-पिता की आजीविका और रिहाइशें नष्ट हो गयीं। कई बच्चे परिवारों से बिछड़ गये। ये परिस्थितियाँ बच्चों की गुमशुदगी, ट्रैफिकिंग (दुर्व्यापार), खरीद-फरोख्त, बाल वैश्यावृत्ति तथा बँधुआ एवं बाल मजदूरी के लिये पूरी तरह अनुकूल हैं। जाहिर है कि इस काले धंधे के लिये आपदाग्रस्त क्षेत्रों के बच्चे बड़ी सुलभता से और सस्ती कीमतों पर मिल सकेंगे।

त्रासदी के दूसरे दिन ही मैंने स्वयं राज्य के बाल संरक्षण आयोग के साथ सम्पर्क करके निवेदन किया था कि वे प्रशासन पुलिस एवं सभी राहत एजेंसियों को बाल दुर्व्यापार के सम्भावित खतरे के बारे में सचेत करें। उन्होंने ऐसा किया भी। साथ ही मैंने एक पत्र प्रदेश के मुख्यमन्त्री महोदय को लिखकर आग्रह किया था कि राहत शिविरों और बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों में इस बावत गहरी निगरानी रखी जाये। परन्तु उत्तराखण्ड से हमारे कई साथियों और अखबार निदेशकों ने जब पुलिस और प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से बात की तो लगा कि उनके लिये वह मुद्दा समझ और प्राथमिकताओं से परे है। दुर्भाग्य से राज्य सरकारों में ही नहीं केन्द्र तक में बचपन केन्द्रित अथवा बाल-मैत्री परक आपदा प्रबन्धन, राहत और पुनर्वास की कोई समझ नहीं है। बाल अधिकरों के परिपेक्ष्य में यह सब कर पाना तो बड़े दूर की बात है। यह काम केवल करूणा के भाव और आपदा प्रबन्धन के लिहाज से नहीं, बल्कि बाल अधिकारों के नजरिये से किया जाना चाहिये।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि त्रासदी पीड़ित बच्चे केवल रहम के पात्र नहीं हैं। किशोर न्याय कानून के अन्तर्गत 18 वर्ष की उम्र तक का ऐसा प्रत्येक बच्चा कानूनन देख-भाल एवं सुरक्षा का अधिकारी हैं। जरूरी नहीं है कि वह बच्चा माता-पिता या परिवार विहीन हो। जरूरतमन्द बच्चों को तत्काल हर जिले में गठित बाल कल्याण समिति के जरिये बाल संरक्षण गृह में भेजा जाना चाहिये जहां उसकी हर प्रकार की देख-भाल, सुरक्षा एवं पढ़ाई की जिम्मेदारी सरकार की है। टेक्नोलॉजी और सूचना तन्त्र आदि में भारी तरक्की के बावजूद आपदाओं से निपटने वाला सोच और रणनीति अभी भी सौ साल पुराने लगते हैं।

सुनामी प्रभावित इण्डोनेशिया, श्रीलंका और भारत के क्षेत्रों में बाल दुर्व्यापार खूब फला-फूला था। इसी तरह सन् 2008 में बिहार राज्य में आई कोसी नदी की बाढ़ ने भी हजारों परिवारों को अपनी चपेट में लिया था। उस समय भी राहत शिविरों में से बच्चों को चुराने, बहला-फुसलाकर ले जाने तथा माँ-बाप को लालच व थोड़ी बहुत रकम देकर तस्करी की घटनायें सामने आयी थीं। इन पंक्तियों के लेखक ने कोसी क्षेत्र में स्वयं छापामार कार्यवाही करके बाल दुर्व्यापारियों के चँगुल से बच्चों को मुक्त कराया था। बचपन बचाओ आन्दोलन ने सुनामी से सबक सीखते हुये बाल दुर्व्यापार के खिलाफ बाढ़ पीड़ितों के राहत शिविरों तथा गाँवों में सघन जागरूकता अभियान चलाया था। देशी-विदेशी राहत एजेंसियों, सरकारी महकमों, पुलिस और क्षेत्र में काम करने वाले स्वयंसेवी संगठनों को इस बावत सचेत व जागरूक करने की पहल की थी। संगठन ने रेलवे स्टेशनों और बस अड्डो पर तीन अलग-अलग छापामार कार्यवाहियां करके क्रमशः 12, 9 और 3 बच्चों को बाल तस्करों की चँगुल से मुक्त कराया था। दुर्व्यापार रोकने की तमाम कोशिशों के बावजूद बाढ़ के बाद के 3-4 महीनों के भीतर लगभग तीन हजार बच्चों की तस्करी की गयी थी। कोसी के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र सहरसा, दरभंगा, मधेपुरा, मधुबनी और सीतामढ़ी आज भी बालकों के दुर्व्यापार के सबसे बड़े केन्द्र बने हुये हैं। यहां के हजारों बच्चों को हर साल बंधुआ मजदूरी, जबरिया भिखमंगी, वेश्यावृत्ति आदि के लिये देशभर में जानवरों से भी कम कीमत पर बेचा और खरीदा जाता है।

उत्तराखण्ड राज्य पहले से ही बच्चों तथा किशोरियों की ट्रैफिकिंग (दुर्व्यापार) का स्रोत रहा है। नेपाल की सीमा से लगे पिथौरागढ़ के कई गाँवों से किशोरियों को दलालों के मार्फत बाल विवाह और वेश्यावृत्ति के लिये बेचा जाता है। उत्तरकाशी सहित राज्य के कई इलाकों से बहुत सारे बच्चों को देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार, हल्द्वानी तथा उत्तर प्रदेश के कई स्थानों एवं दिल्ली में ढाबों व घरों में बाल मजदूरी कराने के लिये ले जाया जाता है। उत्तराखण्ड के सन्दर्भ में अफसोसजनक बात यह है कि पूरे राज्य में केवल तीन बाल गृह हैं। बाल संरक्षण गृह एक भी नहीं है। हैरानी की बात यह है कि राज्य सरकार ने 8 किशोर निगरानी गृह खोल रखे हैं। यानि कि सरकार यह मानती है कि उत्तराखण्ड में देख-भाल व संरक्षण हेतु जरूरतमन्द बच्चों के मुकाबले अपराधों में लग जाने वाले बच्चों की संख्या कई गुनी ज्यादा है। सौभाग्य से राज्य का बाल अधिकार संरक्षण आयोग सम्भवतः देश के किसी भी ऐसे आयोग या राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग की तुलना में कहीं अधिक संवेदनशील एवं सक्रिय है। पिछले एक वर्ष के दौरान इस आयोग ने बाल अधिकार व संरक्षण के कानूनी व सामाजिक पहलूओं पर सरकारी मशीनरी, पुलिस अधिकारियों तथा जिला बाल कल्याण समितियों को सघन प्रशिक्षण दिलाया है। किन्तु ये समितियाँ संसाधनों के अभाव में पँगु बनी हुयी है। अधिकाँश के पास तो बैठकर काम करने की जगह तक नहीं है।

प्रदेश सरकार की सरोकर हीनता और निष्क्रियता का आलम यह है कि उत्तराखण्ड में केन्द्र सरकार की एकीकृत बाल संरक्षण परियाजना (आई.सी.पी.एस.) आज तक लागू नहीं की गयी। इस केन्द्रीय परियोजना के अन्तर्गत विगत 4 सालों में 600 करोड़ रूपये विभिन्न राज्यों के लिये आवंटित किये जा चुके हैं। किन्तु न तो उत्तराखण्ड सरकार ने केन्द्र से कोई पैसा माँगा और न ही केन्द्र ने आगे बढ़कर दिया। ऐसा न होने के पीछे एक निहायत ही घटिया कारण है। मुझे कई महीनों पहले कुछ सूत्रों से पता लगा था कि आई.सी.पी.एस. परियोजना के मिल सकने वाली करोड़ों रूपये की राशि पर वर्चस्व के लिये प्रदेश के समाज कल्याण मन्त्रालय और महिला एवं बाल विकास मन्त्रालयों के बीच में सीतयुद्ध चल रहा है । अगर यह परियोजना ठीक ढँग से प्रत्येक जिले में चल रही होती तो बाढ़ की इस त्रासदी में आयोग, बाल कल्याण समितियाँ और सम्बंधित विभाग तत्काल इन आपदा पीड़ित बच्चों को अपनी देख-रेख व संरक्षण में ले सकते थे।

उत्तराखण्ड की त्रासदी को राष्ट्रीय आपदा कहा जा रहा है। लेकिन यह देशभर से पहुँचे तीर्थ यात्रियों को निकालने, उन्हें राहत शिविरों में रखने एवं पीड़ितों को राहत सामग्री भरे ट्रकों को हरी झण्डी दिखाते हुये फोटो खिंचवाने तक ही सीमित है। कुछ दूसरों के लिये केदारनाथ मन्दिर परिसर का विश्वस्तरीय पुर्नर्निमाण राष्ट्रीय कर्तव्य हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि प्रधानमंत्री कार्यालय खुद विभिन्न मन्त्रालयों और उत्तराखण्ड सरकार के बीच इस बात के लिये ताल-मेल स्थापित करें कि बाल तस्कर आपदा पीड़ित बच्चों को अन्य राज्यों की सीमाओं में न ले जाने पायें। इसके लिये गृह मन्त्रालय की पहल पर सभी सीमावर्ती राज्यों की पुलिस को मुश्तैद किया जाये। जरूरतमन्द बच्चों की पहचान करके उन्हें सुविधा और सुरक्षा से लैस बाल संरक्षण गृहों में भेजा जाये। इसके लिये केन्दीय महिला एवं बाल कल्याण मन्त्रालय व समाज कल्याण मन्त्रालय त्वरित व ईमानदार प्रयास करें। देश का शिक्षा मन्त्रालय राज्य सरकार के साथ मिलकर सुनिश्चित करे कि शिक्षा के अधिकार का केन्द्रीय कानून उत्तराखण्ड में भगीरथी के कोप का भाजन बनकर न रह जाये। जिन गरीब परिवारों के बच्चों का बाल मजदूरी में धकेले जाने का खतरा है, उनकी आजीविका के लिये अन्य सम्बंधित केन्द्रीय मन्त्रालय मिलकर काम करें। इसी तरह हजारों पीड़ित बच्चों को मनोवैज्ञानिक दुष्प्रभाव और सदमें से उभारने के लिये केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्रालय का आगे आना चाहिये। तभी इस राष्ट्रीय आपदा से सही मायनों में निपटा जा सकता है।

’लेखक जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता एवं बचपन बचाओ आन्दोलन के संस्थापक हैं।