दक्षिणपंथ और एनआईए की राजनीति
दक्षिणपंथ और एनआईए की राजनीति
राजीव कुमार यादव
पिछले दिनों संसद में गृह मंत्री पी चिदंरम ने मुंबई में हुई वारदात को लेकर संसद में कहा कि जांच में देश में पनप रहे ‘दक्षिणपंथी गुटों’ के शामिल होने के संकेत मिल रहे हैं। इस दौरान दक्षिणपंथी या फासीवादी शब्द जो मीडिया और राजनीति के शब्दकोष से गायब हो गए थे फिर से सुनने में आने लगे है। जब भी राजनीति में पुराने शब्द आने या गायब होने लगें या नए शब्दों के शब्दकोष तैयार होने लगे तो यह निश्चित हो जाता है कि राजनीति में बदलाव होने लगा है। ऐसी ही चेक बैलेंस की नीति इन दिनों भारतीय राजनीति में चल रही है।
दक्षिणपंथ का आशय फासीवादी या मूल तत्ववादी विचारधारा से होता है। पर इस दौरान इस शब्द इस्तेमाल बहुत शाफ्ट तरीके से हिंदुत्वादी विचारधारा के लिए किया जा रहा है। जबकि इस शब्द का आशय किसी भी चरमंपथी आतंकी गुट से हो सकता है। इसको इस बात से भी समझा जा सकता है कि चिदंबरम ने कहा कि घरेलू चरमपंथ भारत के लिए अब एक नई चुनौती बन गया है, ‘फासीवादी ताकतें’ भी इसका एक हिस्सा बनती जा रही हैं, भारत जिस समय सीमा पार से हो रही चरमपंथी गतिविधियों से निपटने में जुटा था उस समय अंदरूनी स्तर पर चरमपंथ ने अपने पैर जमा लिए।
अब यहां पर हमें इन नए शब्दों फासीवादी या दक्षिणपंथी पर गौर करना होगा कि आखिर चिदंबरम या सरकार की क्या मजबूरी है जो वह खुले रुप से हिंदुत्वादी आतंकवाद का नाम लेने से बच रही है। जब सिमी और इंडियन मुजाहिद्दीन का जिक्र करते हुए चिदंबरम देश में सिर उठा रही दक्षिणपंथी ताकतों के खतरे से आगाह करते हुए नजर आते हैं तो वे अभिनव भारत या बजरंग दल सरीखे संगठनों का नाम लेने से क्यों बचते हैं?
गृहमंत्री जब यह कहते हैं कि चरमपंथ ने अब नया आयाम ले लिया है जहां यह राष्ट्रीय सुरक्षा के अलावा राष्ट्रीय एकता के लिए भी खतरा बनता जा रहा तो हमें इस बात को समझना चाहिए कि दरअसल यह एक धमकी भरी राजनीति भाजपा जैसे संगठनों के साथ कर रहे हैं जिनका वास्ता हिंदुत्वादी गुटों से है।
मुबई धमाके को लेकर जब शुरु में ही इस बात को कहा गया कि जांच का दायरा सभी प्रकार के शत्रु समहों तक होगा तो गृह मंत्री को यह बताना चाहिए कि जिस तरह सिमी और आईएम के नाम पर पूरे देश में इन संगठनों के नाम पर पकड़े गए लोगों के घरों, गावों और जिलों में छापेमारी की तो क्या उन्होंने ‘दक्षिणपंथी’ गुटों से संबधित लोगों के यहां भी कोई पूछताछ की? क्यों कि संचार माध्यमों से आई सूचनाओं में ऐसे किसी भी ‘दक्षिणपंथी’ गुटों से पूछताछ की कोई खबर नहीं आई। आखिर यह कैसी जांच चल रही है?
दरअसल यह दौर भारत में टेरर पालिटिक्स का दौर है जिस तरह इसके पहले सांप्रदायिक दंगो की राजनीति का दौर था जिसमें जनता को मूलभूत सवालों से भटकाकर धर्म जैसे भावनात्मक मुद्दों पर राजनीति की जाती थी। उसी तरह आतंकवाद का सहारा लिया जा रहा है। यहां गौर करने की जरुरत है कि जब टूजी घोटालों के आरोप में पूर्व केंद्रीय मंत्री ए राजा ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का नाम लिया और भाजपा ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला तो ‘दक्षिणपंथी’ संगठनों पर चिदंबरम ने मुंह खोला। और दक्षिणपंथी कट्टरपंथी हिंदुत्वादी गुटों के बारे में यह भी कहा कि वे अनुभवी है और बम बनाते ही नहीं फोड़ते भी है, जिसके दस्तावेज उनके पास हैं।
अगर इस दौरान भाजपा और उसके बाद चिदंबरम के बयानों को देखा जाय तो चिदंबरम ने चेक-बैलेंस की नीति पर काम किया। मुंबई धमाकों में हिंदुत्वादी गुटों की भूमिका को शक के दायरे में लाने वाले चिदंबरम के बयान पर भाजपा पीछे हटी तो चिदंबरम ने भी ढील छोड़ी। इस समय जिस एनआईए की जांच से हिंदुत्वादी भयभीत चल रहे हैं उसका मुंबई की जांच से पीछे हटने पर गृह मंत्री ने कहा कि ऐसा नहीं कि हम हर जांच एनआईए से कराते हैं और ढुलमुल बयान देते हुए मुंबई एटीएस से जांच कराने की बात कही। जब की पिछले दिनों यह बात संचार माध्यमों में प्रमुखता से रही की एनआईए के तथ्यों को एटीएस ने नकार दिया जिसके चलते वो पीछे हट गई। दरअसल एनआईए सरकार की एक कदम आगे दो कदम पीछे वाली नीति से संचालित है, जिसको सरकार ने अपने हित में प्रयोग का एक जरिया मात्र बना लिया है।
दरअसल यह पूरी परिघटना सरकार की आतंकवाद से लड़ने की नीयत और उसकी गंभीरता पर सवाल है कि आखिर वह क्यों हिंदुत्वादी संगठनों का नाम लेने की भी हिम्मत नहीं जुटा पा रही है, तो वहीं हर मामले में इस्लामिक आतंकवादी संगठनों का नाम लेना उसे राजनीतिक तौर पर मुफीद लगता है? और मीडिया में उसकी तरफ से हिंदुत्वादी संगठनों का जिक्र तभी होता है जब उसकी नकेल टूजी या भ्रष्टाचार के सवाल पर भाजपा कस रही होती है। मतलब साफ है कि आतंकवाद के नाम पर यह खेल दोनों ही अपनी जनविरोधी नीतियों को छुपाने के लिए कर रहे हैं। हमें इस बात पर गौर करने की जरुरत हैं कि जिस समय परमाणु समझौता होता है उस समय जयपुर में धमाका, जिस समय टूजी समेत भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी सरकार पर सवाल उठता है तो 7 दिसंबर 2010 को दश्वासमेध वाराणसी या फिर 13 जुलाई 2011 को मुबई में धमाके होते हैं।


