दर्द के अभिनय की बेशर्मी और झूठ
दर्द के अभिनय की बेशर्मी और झूठ
हमारे देश का नाम हिंदुस्तान है। मोदी नहीं
हे, अनुपम अभिनेता तुम्हारा अभिनय हमारे देश की परिभाषा नहीं बदल सकता है
महेश राठी
क्या हर जगह, हर समय और हरेक घटना पर अभिनय करना ही अभिनेता का धर्म होता है। हमेशा की तरह आज अनुपम खेर ने फिर जीवंत अभिनय किया, अपने आज के अराजनीतिक किरदार में उनका अभिनय बिल्कुल लिखी गई पटकथा के अनुरूप ही था परंतु कमबख्त इस ड्रामे की पटकथा ही कमजोर निकली और एक अराजनीतिक होने का दावा संघी एजेंट के रूप में पहचाना गया।
संघ के आदमी होने का उन पर शक तो अन्ना आंदोलन के समय भी था जब वे बाकी संघियों की तरह मैं भी अन्ना की टोपी लगाये बरामद हुए थे। उसके बाद उनकी पत्नी के भाजपा उम्मीदवार के बतौर चुनाव में उतरते ही शक थोड़ा गहराया था, परंतु अनुपम ठहरे काबिल अभिनेता, तो उन्होंने फिर से अराजनीतिक होने की लय छेड़ी और उनके अभिनय के कद्रदानों ने अनमने भाव से ही उनके किरदार पर ज्यादा टीका टिप्पणी नहीं की। परंतु संघी आतंक के मसीहा की खामोशी और कारगुजारी पर देश के बुद्धिजीवियों, लेखकों, कलाकारों ने सवाल खड़ा किया तो उनके भीतर का असली संघी उनकी सारी अभिनय क्षमता के साथ फिर से मैदान में उतर आया।
हे, झूठ के फिल्मी अवतार तुम देश को यह बताओ कि तुम्हे किसने ये अधिकार दिया कि किसी राजनीतिक दल का विरोध करना, किसी नेता का विरोध करना अथवा सरकार का विरोध करना देश का विरोध हो गया है। और ऐसा तर्क यदि ये संघी साजिश का हिस्सा नहीं है तो क्या है।
पहले वे बहुसंख्यक धर्म को देश का पर्याय कहते हैं, फिर उस धर्म के नाम पर अपनी राजनीतिक दुकानदारी को देश कहते हैं, फिर देश के इतिहास में सबसे बदनाम नरसंहार में शामिल लोगों के नेता को देश बताते हैं और अब तुम उनके तर्कों के साथ मैदान में उतर आये हो कि नरेन्द्र मोदी का विरोध करना देश का विरोध करना है।
हे, श्रेष्ठ अभिनेता, हर समय अभिनेता, तुम्हारी जबान से तब एक शब्द नहीं फूटा जब इस संघी टोले के विक्षिप्त गांधी के हत्यारे की मूर्ति स्थापना का खुला आहवान कर रहे थे। संघियों के हर दर्द पर कहराने वाले विराट अभिनेता नेता, सनातन अभिनेता, तुम्हारी जबान उस समय तालू से चिपक गई थी जब मां की कोख से अजन्में बच्चे को निकालकर और त्रिशूल पर उसकी लाश टांगकर संघी गिरोह के गुण्ड़े कह रहे थे ‘‘जय श्री राम हो गया काम‘‘।
हे, आजीवन अमिट अराजनीतिक अनुपम, तुम 1984 के दंगों की बात करते हो तो तुम बताओ तुम अपना केरियर बनाने के संघर्ष को छोड़कर क्यों नहीं सिख भईयों के लिए सड़कों पर उतर आये। कहो तुम्हारे लिए अपना केरियर ज्यादा मूल्यवान था, या कहो उस समय तक तुम्हारी हैसियत किसी सरकार से मोलभाव करने की नहीं थी और तब यह क्रान्तिकारिता का जीवंत अभिनय घाटे का सौदा होता।
हे, रग-रग में अभिनय बसाने वाले पल पल अभिनेता, तुम्हारा दिल तब क्यों नहीं कराह पड़ा जब देश की राजधानी के पास दो दलित बच्चों को तुम्हारी पार्टी के अगड़े वोट बैंक ने जिन्दा जला दिया। तुम भगाणा के दलितों पर हमले के समय भी तो चुप ही थे और आज भी हो। कहीं इसलिए तो नहीं कि उन्होंने तुम्हारे धर्म को छोड़ दिया। तुम छत्तीसगढ़ में रोज लुटती बेटियों की अस्मत के दर्द से क्यों नहीं कराह उठते हो हे, अभिनय के महावीर। तुमने देश भक्ति तब क्यों नहीं दिखाई, जब इस देश के किसान तुम्हारी अभिनय नगरी के राज्य में आत्महत्या कर रहे थे। वे तुम्हारे देश के नहीं थे तुम्हारे धर्म के नहीं थे या तुम्हे उनमें भी कोई पक्ष विपक्ष दिखाई देता था। मणिपुर की औरतें अपनी अस्मत बचाने के लिए तन से कपड़े फेंककर मैदान में आ गयी और तुम्हारी आत्मा में रचा बसा दर्द का अभिनय बाहर नहीं आ पाया। इस देश के हरेक गांव में ग्राम पंचायत की जमीन जो गरीबों, दलितों और आदिवासियों को मिलनी चाहिए उस पर तुम्हारी पार्टी का अगड़ी जातियों वाला समाज तुम्हारा स्थायी वोट बैंक कब्जा करके बैठा है और तुम्हारा दूसरों की तकलीफ पर फौरन कराहने वाला दिल पत्थर बना अभिनय कर रहा है। तुम कह सकते हो तुम्हे इसका ज्ञान नहीं और तुम्हें होना भी नहीं चाहिए, क्योंकि तुम्हारा मन और तुम्हारे पीछे चलने वाले तुम्हारे जैसे कारोबारियों का मन तो केवल मोदी की तकलीफ से आहत होता है। तुम्हारी आंखें दिल्ली अथवा मुम्बई की सड़कों पर सोने वाले लाखों बेघरों को देखकर बंद हो जाती हैं। परंतु एक मोदी के अनकहे दर्द और अदृश्य तकलीफ को देखकर कराह उठती हैं। यही तुम्हारे अराजनीतिक होने निष्पक्ष होने का सबूत है।
हे, अभिनय महावीर हम देश की जनता है और हमारे दिल और दिमाग उस भीड़ की तरह हमारे पेट में नहीं घुस गये हैं, जिसका आज तुम नेतृत्व कर रहे थे। हमारे लिए पानसरे, कुलबर्गी और दाभोलकर की हत्या एक खतरे की आहट है, तुम्हारे जैसे अपने पेट में दिल दिमाग रखने वाले लोगों की तरह नई संभावनाओं का आगाज नहीं है। और 1984 में मारे गये सिखों की लाशें दिखाकर अपने हत्यारे गिरोहों को मासूमों के कत्ल की ठेकेदारी का अधिकार मत दिलाओ। हमने 84 की हत्याओं पर भी आवाज उठाई थी, हम 2002 में भी बोले थे, हमारा दिल मणिपुरी बहनों की दुर्दशा पर भी बोला था, हम भगाणा और मिर्चपुर के अन्याय के खिलाफ लड़ने वालों की भीड़ में थे और देश के किसानों की आत्महत्याओं पर हमारी आवाज को राजनीति बताने वाले तुम्हारे यही भाई थे जिनकी वकालत करने तुम आये हो।
हे, अनुपम अभिनेता तुम्हारा अभिनय हमारे देश की परिभाषा नहीं बदल सकता है। हमारा देश इस देश के बहुसंख्यक मजदूरों, किसानों, महिलाओं और रोजगार के लिए प्रतिक्षारत करोड़ों नौजवानों का देश है। हमारे देश का नाम नरेन्द्र मोदी अथवा संघ परिवार नहीं है जिनकी तकलीफ तुमसे देखाी नहीं जा रही है, हमारा देश उन लोगों से बनता है जिनकी तकलीफ देखकर तुम्हारी आंखें बंद हो जाती हैं, जबान सिल जाती है और कान बहरे हो जाते हैं। जाओं अपने हमपेशा लोगों को लेकर नरेन्द्र मोदी अथवा संघ परिवार नामक देश में चले जाओ और झूठ को सच और सच को झूठ दिखाने बताने का अपना बहरूपिया करोबार चलाओ। हमारे देश का नाम भारत है। हमारे देश का नाम हिंदुस्तान है। मोदी नहीं। वो मासूमों की हत्याओं और अबला औरतों की अस्मत लूट जाने से बदनाम होता है, जैसा 84 और 2002 में हुआ किसी झूठे को झूठा और फरेबी को फरेबी कहने से नहीं।


