नेतृत्व संस्कार में लगें नैतिक शक्तियाँ
एक वकील के घर हुई मुलाकात में लोकमान्य तिलक द्वारा गुलामी को राजनीतिक समस्या बताये जाने की प्रतिक्रिया में स्वामी विवेकानंद ने कहा था – “गुलामी राजनीतिक समस्या नहीं, यह भारतीयों के चारित्रिक पतन का परिणाम है।“ लॉर्ड माउंटबेटन ने भी चेताया था – “मिस्टर गांधी! क्या “आप” समझते हैं कि आजादी मिलने के बाद भारत को भारतीयों द्वारा चलाया जायेगा ? नहीं! बाद में भी दुनिया गोरों द्वारा ही चलाई जायेगी।“ दुर्योग से देश चलाने वालों ने इन दोनों दर्ज बयानों को भूला दिया। कांग्रेस को भंग कर लोक सेवक मंडल के गठन के गांधी संदेश और उसकी दूरदृष्टि को भी देश याद नहीं रख सका। स्मृति विकार के ऐसे दौर में कैसे हो लोकनीति, रीति, प्रकृति और संस्कार की सुरक्षा ? इसलिए आजादी के मात्र 67वें वर्ष में आज भारत को नैतिक और वैचारिक शक्तियों के आव्हान की जरूरत पुनः आन पङी है। कृपया, अनसुना न करें यह आव्हान !!

अरुण तिवारी
हो सकता है कि हर सफल इंसान के पीछे किसी औरत का हाथ होने की बात एक किवदंती भर हो, लेकिन राष्ट्रोत्थान की राजनीति में वैचारिक शक्तियों की भूमिका किवदंती नहीं है। राजनैतिक शख्सियत के शीर्ष पर पहुंचने के पीछे वैचारिक शक्ति के होने का सच भी हर काल का सच है। इसी के साथ एक सच यह भी है कि चाणक्य सरीखी शक्तियों ने दूसरे किसी को रंक से उठाकर राजा बनाया; राज चलाने का तरीका सिखाया; राजा पर लगाम रखी; लेकिन खुद राजा नहीं बने। क्यों ? यदि “आप” ऐसी वैचारिक शक्ति हैं, तो “आप” जानते ही होंगे कि “oआप” जैसी शक्तियों की कोई निजी महत्वाकांक्षा नहीं होती। “आप”की महत्वाकांक्षा व्यापक है। “आप” सरीखी शक्तियां राष्ट्रीयता, नैतिकता तथा खुद्दारी से ओतप्रोत होती हैं। “आप”की इस खुददारी को समझते हुए ही पहले राजनेता “आप”को अपनी मार्गदर्शक शक्तियां मानकर उचित सम्मान देते थे। खुद “आप”को तलाश करते थे। जिन्होंने शीर्ष पाया, ऐसे राजाओं ने अपनी प्रेयसी से ज्यादा, “आप” सरीखी वैचारिक शक्तियों को महत्व दिया। ऐसा न होता, तो राजा राम ने सीताजी को पुनः वनवास न दिया होता और राम ’मर्यादा पुरुषोत्तम’के आदर से न नवाजे जाते। विदुर जैसे दलित विचारक को राजा धृतराष्ट्र के दरबार से धक्के देकर देश निकाला दे दिया गया होता। सोचिए! महात्मा बुद्ध की जातक कथाओं के विचारों ने अशोक जैसे भारतसम्राट की राजनीति ही बदल दी। अकबर के नवरत्नों को याद कीजिए। सुभाष, तिलक, गांधी, पटेल, गणेश शंकर विद्यार्थी सरीखी ऐसी वैचारिक शक्तियों के बूते ही हमने आजादी पाई। लोहिया व जे पी सरीखे वैचारिकों ने भारत को कितने ही राजनेता दिए। लेकिन 21वीं सदी की भारतीय राजनीति में “आप” सरीखी खुद्दार वैचारिक शक्तियों के लिए अब कोई जगह दिखाई नहीं दे रही। क्यों ? क्योंकि यह जगह “आप”ने खुद खोई है।
सच है कि स्वाभिमानी नैतिक-वैचारिक शक्तियां किसी की ’यसमैन’या ’यसवूमैन’नहीं हो सकती। जी-हजूरी “आप”का स्वभाव नहीं है। ठीक है कि “आप” अपमानित होने के लिए नहीं हैं। लेकिन क्या इसी से “आप” सरीखी वैचारिक शक्तियां राष्टनिर्माण के अपने दायित्व से मुक्त हो जाती हैं ? “आप”को याद क्यों नहीं है कि राष्ट्रनिर्माण, “आप” सरीखी वैचारिक शक्तियों का ही दायित्व है। ’’तोहका इज्जत-बेइज्जत से का मतलब, तू तो धरती कय रखवाला हो।’’ आखिर “आप” उस इतिहास को कैसे भुला सकते हैं, जो चाणक्य ने लिखा। “आप” कैसे भूल सकते हैं कि चाणक्य ने खुद पहल कर एक चंद्रगुप्त ढूंढा और उसे अखण्ड भारत के निर्माण का माध्यम बनाया ? लेकिन “आप”ने राजनैतिक गलियारों को ही अछूत मान लिया है। उनकी तरफ ताकना तक छोड दिया है। यह विवशता हो सकती है। मगर यह दायित्व निर्वाह से भागना भी है। ठीक है कि मीनाक्षी नटराजन और गोविंदाचार्य सरीखे किरदार राजनीति में रहने के बावजूद बहुत निर्णायक साबित नहीं हो सके हैं। अपना दायित्व तो निभाते ही रहे हैं। उन पर कोई दायित्व निर्वाह न करने का आरोप तो नहीं ही लगा सकता।
“आप” पर आरोप है कि “आप”ने घर बैठकर उन वैचारिक शक्तियों को अवसर प्रदान किया है, जो खुद सत्ता का स्वाद चखने को बेताब हैं। क्या यह ठीक है ? सोचने का वक्त आ गया है। सोचिए कि अच्छे नेतृत्व निर्माण का काम कैसे हो ? नेता ही नहीं, कार्यकर्ता निर्माण का कार्य भी देश में कहीं चलता दिखाई नहीं दे रहा... न राजनैतिक, न ही बौद्धिक और न ही सामाजिक क्षेत्र में; खासकर पिछले दो दशक से। दायित्व निर्वाह में “आप”की कमजोरी का ही नतीजा है कि देश की राजनीति व समाज सेवा... दोनो ही व्यापार बन गई है। दिशा व दशा.. दोनो ही आदर्श विपरीत हो गई है। शिक्षा-शासन-प्रशासन-व्यवसाय.. सब जगह चारित्रिक गिरावट का दौर है यह।
“आप”का घर बैठ जाना उतना ही बडा दोष है, जितना कि जागने के वक्त सो जाना। “आप” सरीखी वैचारिक शक्ति के सो जाने का नतीजा है कि आज पूरे समाज की ही प्राथमिकतायें बदलती जा रही हैं। राज-समाज की प्राथमिकता में मैं, मेरा परिवार, मेरी पार्टी और मेरी संस्था या दुकान है,... राष्ट्र नहीं। राजनेताओं ने राजनीति को राज चलाने की नीति से बदलकर, राज कब्जाने की कुनीति बना दिया है। आज के राजनेता राजनीति को एक सामंत के राज फैलाने व बचाने वाली सामंती चाल मानकर समाज के भीतर भी मोहरे बिछाने तक से परहेज नहीं कर रहे। समाज को खांचे में बांटने का पाप करना उनके लिए स्वार्थ कमाने का काम है। सत्ता पाने के लिए हर अनैतिक पथ उनके लिए राजमार्ग है। जाति-धर्म-क्षेत्रवाद-धनबल-बाहुबल... सत्ता की सीढियां हैं। पैसा दो, पद लो; पैसा दो, टिकट लो; पैसा दो, मंत्रालय लो’नोट लो, वोट दो - इसी पर लिखी जा रही है आजकल गांधी के नैतिक रास्ते पर चलकर आजादी हासिल करने का घंमड पाले राष्ट्र की राजनीतिक पटकथा। यह है स्वतंत्रता के साढे छह दशक देख चुका हमारा राष्ट्र - भारत! इस पटकथा के लेखकों में न होकर भी “आप” शामिल हैं।
दुर्भाग्यवश इस पटकथा के लेखक बन गये हैं - कुछ बिल्डर, डीलर, उद्योगपति, स्कूल मालिक और व्यापारी। जो पद कभी-कभी “आप” सरीखी वैचारिक शक्तियों के लिए आरक्षित रहते थे, आज उन पर पैसा काबिज है। “आप” सिर्फ देख रहे हैं ? आज लगभग सभी पार्टियों के जिला व मोहल्ला स्तरीय पदाधिकारी पदों पर ऐसे पटकथा लेखक ही आसीन हैं। ये ऐसे लोग हैं, जिन्हे अपने काम में पुलिस-प्रशासन से अड़ंगे डालने का खतरा रहता है। पार्टी पद का बोर्ड कामकाज के गलत तौर-तरीके को संरक्षण देने का माघ्यम बन गया है। दलालों ने इसे संपर्क साधने की सीढ़ी मान लिया है।
यदि सीधे-सीधे “आप” यह पटकथा लिखते, तो यह राष्ट्र कुछ और होता। इसका राष्ट्रवाद हिंदू या मुसलमां न होकर सिर्फ राष्ट्रवाद होतज्। इस तरह लिखी राजनीतिक पटकथा का ही नतीजा है कि बीते चुनावों में येन-केन-प्रकारेण का मंत्र था; जीत थी-हार थी; पैसा था-वार था; सर्वजन हिताय: सर्वजन सुखाय का नारा था; विकास के वादे भी थे, लेकिन इरादों के दर्शन दुर्लभ थे। उत्तर प्रदेश विधान परिषद के सदस्य हृदयनारायण दीक्षित ने लिखा था कि युद्ध और प्यार में कोई आचार संहिता नहीं होती। किंतु वह यह भूल गये थे कि जो चुनाव अच्छा लोकतंत्र बनाने और अच्छों को आगे लाने का माध्यम थे... हमने ही उन्हें जीत और हार की जंग बना दिया है। “आप”ने उन्हें याद ही नहीं दिलाया कि पार्टियां, सत्ता हथियाने का औजार नहीं है। पार्टियां, सत्ताशीन को लोकतांत्रिक बनाये रखने के लिए होती हैं।
देश की राजनीति कैसी हो ? हालांकि यह तय करने का काम कभी “आप” सरीखी वैचारिक शक्तियों के हाथ में रहता था। आज मतदाता पर है। वह विभक्त हैं। कह सकते हैं कि प्रमुख व राष्ट्रीय होने के नाते यह दारोमदार कांग्रेस और भाजपा पर भी है। दोनो को ही सशक्त, लोकतांत्रिक तथा साफ-सुथरा होना चाहिए। दोनो में देश को एकसूत्र में बांधने का जज्बा व माददा होना चाहिए। यह देश का दुर्भाग्य ही है कि सांगठनिक नैतिकता के स्तर पर आज दोनों ही दल अवसान की ओर अग्रसर हैं। दोनो ही वैचारिक आधार खोती पार्टियां हैं। दोनो के ही पास समर्पित जमीनी कार्यकर्ताओं का अभाव है। भाजपा को कार्यकर्ता देने वाली आर एस एस की शाखायें नई पौध को आर्कषित करने में असफल साबित हो रही हैं। अपने को पैदाइशी कांग्रेसी बताने वाली आजादी पूर्व पैदा हुई पीढ़ी अब अपनी उम्र पूरी करने के पड़ाव पर है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे दो बडे. प्रदेशों में दोनो की ही राष्ट्रीयता दांव पर है। देश की राजनीति अब राष्ट्रीय नहीं, क्षेत्रीय पार्टियों की बंधक बनती जा रही हैं। दोनो राष्ट्रीय पार्टियों का नैतिक पतन भारत जैसे राष्ट्र की राष्ट्रीयता की दृष्टि से अच्छा नहीं । पहले वे सुधरें। लेकिन इन्हे सुधारेगा कौन ? क्या “आप” ??
अन्ना आंदोलन के हश्र ने नैतिकता की एक और उम्मीद पर ताला लगा दिया है। सद्विचार व सद् आचार शून्यता के मुकाम पर पहुंचा यह नया दौर “आप” सरीखी खुद्दार नैतिक और वैचारिक शक्तियों से मांग कर रहा है। नया दौर चीख-चीख आव्हान कर रहा है - ’’हे विचार-सदाचार के शीर्ष ! उठो! जागो!! घर से बाहर निकलो। राष्ट्रनिर्माण के काम में अपने दायित्व निर्वाह की पूर्ति करो। राष्ट्र “आप”की प्रतीक्षा कर रहा है। फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती नेतृत्व में शुचिता व राष्ट्रीयता पैदा करने की है। उठिए! कुछ कीजिए।’’
अरुण तिवारी, लेखक प्रकृति एवम् लोकतांत्रिक मसलों से संबद्ध वरिष्ठ पत्रकार एवम् सामाजिक कार्यकर्ता हैं।