दिलों को जीतना है तो जनता से उन्हीं की भाषा में संवाद करना होगा
दिलों को जीतना है तो जनता से उन्हीं की भाषा में संवाद करना होगा
हिन्दुस्तानी या अपनी मातृ भाषा में बोलना।
अगर फासीवाद के खिलाफ सच में सार्थक लड़ना है तो विद्वानों को जनता और मीडिया के सामने हिन्दुस्तानी भाषा में अपनी बात रखना आना ही चाहिए। अगर इसमें मुश्किल हो तो अपनी मातृ भाषा में बोलें।
दरअसल लोगों के जेहन में लोकतंत्र विरोधी फासीवादी चेतना घुस चुकी है, वो अंग्रेजी नहीं समझते। खासकर विद्वता की बातें अंग्रेजी में बोली जाए तो उनके भीतर एक दुराव की भावना भर जाती है और वो कुछ ग्रहण नहीं करते।
आपस में बहस discussion के लिए या शोध के लिए तो अंग्रेजी जरूरी है पर सामाजिक राजनितिक सुधार के लिए इसका उल्टा असर ही होता है।
ऐसे बहुत से विद्वान् हैं, जो बहुत खूबसूरत हिंदी उर्दू बोलते हैं। जैसे प्रोफेसर इरफ़ान हबीब साहेब या मृदुला मुख़र्जी या प्रभात पटनायक साहेब।
दिलों को जीतना है तो जनता से उन्हीं की भाषा में संवाद करना होगा।
आलोक वाजपेई


