दिल्ली उच्च न्यायालय ने ग्रीनपीस इंडिया के फंड रोकने पर गृह मंत्रालय को जारी किया नोटिस
दिल्ली उच्च न्यायालय ने ग्रीनपीस इंडिया के फंड रोकने पर गृह मंत्रालय को जारी किया नोटिस
रोके गए फंड को एनजीओ के खाते में हस्तांतरण का दिया आदेश
नई दिल्ली। 3 सितम्बर 2014। ग्रीनपीस इंडिया के विदेशी धन को बंद करने पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज गृह मंत्रालय को नोटिस जारी किया। न्यायालय ने गृह मंत्रालय को नोटिस जारी करते हुए आदेश दिया कि ग्रीनपीस के बंद किये गए फंड को आरबीआई खाते से एनजीओ के आईडीबीआई के एफसीआरए खाते में जमा करे। 10 अक्टूबर को होने वाली अगली सुनवाई तक इस पैसे को सावधि जमा में रखना होगा।
बता दें ग्रीनपीस इंडिया ने पिछले हफ्ते दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करके गृह मंत्रालय से एफसीआरए के तहत विदेशी धन की अवैध निषेध पर जवाब मांगा था। गृह मंत्रालय को अब अगले दो हफ्ते में याचिका का जवाब देना होगा।
ग्रीनपीस इंडिया के कार्यकारी निदेशक समित आईच ने कहा, “उच्च न्यायालय के फैसले ने गृह मंत्रालय के उस रवैये पर प्रकाश डाला है जिसमें सरकार लोकतंत्र में विरोध की आवाज को वित्तीय जांच के नाम पर दबाने की कोशिश कर रही है। ग्रीनपीस इंडिया भारत के सभी कानूनों का पालन करती है और वह किसी भी तरह की जांच के लिये तैयार है, लेकिन सरकार की तरफ से संवाद के अभाव को देखते हुए गैर सरकारी संगठन यह समझने को मजबूर हो रहा है कि सरकार कॉर्पोरेट एजेंडे को पूरा करने के लिए उसे बदनाम करने की कोशिश कर रही है।”
इसके पहले 17 जुलाई 2014 को ग्रीनपीस इंडिया ने गृह मंत्रालय को लिखकर मांग की थी कि उसे संबंधित कागजात दिये जायें जिसके आधार पर एफसीआरए को रोका गया था लेकिन अभी तक सरकार ने उस चिट्ठी का कोई जवाब नहीं दिया है। ग्रीनपीस इंडिया का आरोप है कि भारत सरकार ने गुप्त तरीके से उसको विदेशी धन मिलने से रोक दिया है और इस कार्यवाही के बारे में कोई जानकारी देने से इन्कार कर दिया है। ग्रीनपीस इंडिया विदेशी धन को प्राप्त करने के अपने अधिकारों के भीतर है लेकिन सरकार ने बिना किसी संवाद के एनजीओ के विदेशी धन को बंद कर दिया है।
आईच ने आगे कहा, “हमलोगों से अभी तक गृह मंत्रालय की तरफ से किसी भी तरह का आधिकारिक संवाद नहीं स्थापित किया गया है। हम मांग करते हैं कि सरकार को तुरंत हमारे सवालों का जवाब देना चाहिए। इसी पार्दर्शिता के लिए ग्रीनपीस इंडिया ने न्यायालय में याचिका दाखिल किया है और मंत्रालय तथा रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से जानना चाह रही है कि आखिर किन कारणों से ग्रीनपीस इंडिया के खिलाफ कार्रवाई की गयी”।
समित ने बताया कि “23 जून 2014 को हमलोगों ने ग्रीनपीस इंटरनेशनल से आये पैसे के ट्रांसफर के लिये अनुरोध किया, जिसे एक दिन पहले ही भेजा गया था। सामान्य रुप में इस ट्रांसफर प्रक्रिया में सिर्फ तीन से चार दिन लगते हैं, लेकिन इस बार 30 जून को हमें पैसे देने से इन्कार कर दिया गया। हमारे बैंक आईडीबीआई को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से आदेश दिया गया था कि गृह मंत्रालय की अनुमति के बिना हमें पैसे नहीं दिये जा सकते। हमें इस बात की जानकारी अखबारों के माध्यम से ही मिली”।
आइच ने कहा इस स्थिति में विडंबना यह है कि ग्रीनपीस को बिल्कुल अंधरे में रखा गया है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह शर्म की बात है कि जो लोग गलत नीतियों के खिलाफ तथा न्याय के लिए संघर्ष करते हैं उनकी आवाज को खत्म करने का प्रयास किया जाता है। आईच ने कहा कि, “पर्यावरण प्रहरी पर अर्थव्यवस्था की गति को धीमा करने का आरोप लगाया गया लेकिन अब सुप्रीम न्यायालय ने कहा है कि 1993 के बाद आवंटित सारे कोल ब्लॉक अवैध हैं। तो वास्तव में देश की अर्थव्यवस्था पूंजीवादी और भ्रष्ट व्यवस्था की वजह से धीमी हुई है”।
गृह मंत्रालय को दो हफ्ते में उच्च न्यायालय के नोटिस का जवाब देना है। केस की अगली सुनवाई 10 अक्टूबर को है।
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