उ प्र में बिजली संकट के लिए प्रदेश सरकार की गलत ऊर्जा नीति की जिम्मेदारी
लखनऊ। बिजली इंजीनियरों ने उप्र के बिजली संकट के लिए विगत दो दशकों से चली आ रही प्रदेश सरकारों की निजी क्षेत्र पर अतिनिर्भरता की गलत ऊर्जा नीति को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि केंद्र से आवंटित होने वाली बिजली के गाडगिल फार्मूले में बदलाव की ज़रूरत तो है किन्तु इसके पहले प्रदेश सरकार को फार्मूले से अलग जा कर दिल्ली की निजी कम्पनियों को ज़रूरत से अधिक दी जा रही बिजली पर भी सवाल उठाना चाहिए और मांग करनी चाहिए कि यह लगभग 500 मेगावाट अतिरिक्त बिजली तत्काल उ प्र को दी जाये।
आल इंडिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे, उ प्र विद्युत अभियंता संघ के अध्यक्ष आर के सिंह एवं महासचिव डी सी दीक्षित ने आज यहाँ बताया कि विगत पांच वर्षों में केंद्र से आवंटित ज़रूरत से अधिक बिजली सरेन्डर कर दिल्ली की निजी कम्पनियों ने 2807 करोड़ रु कमाए हैं जबकि इस बिजली के लिए निजी कंपनियों ने एक पैसा भी नहीं खर्च किया। वहीं दूसरी ओर इन्ही पांच वर्षों में बिजली की कमी से जूझ रहे उ प्र ने ओवर ड्राल के चलते 4459 करोड़ रु, हरियाणा ने 3222 करोड़ रु, राजस्थान ने 2817 करोड़ रु और पंजाब ने 1589 करोड़ रु का अतिरिक्त भुगतान किया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि उत्तरी क्षेत्र में केंद्र से बिजली आवंटन की नीति त्रुटिपूर्ण है जिसके कारण दिल्ली की निजी कम्पनियाँ जिस अतिरिक्त बिजली को सरेन्डर कर पैसा बना रही हैं उसी बिजली के लिए उ प्र सहित अन्य प्रान्तों को अधिक भुगतान करना पड़ रहा है। अभियन्तायों ने कहा कि प्रदेश के मुख्य मंत्री द्वारा प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर गाडगिल फार्मूले में बदलाव की मांग सही है किन्तु उसके पहले उन्हें केंद्र से पूछना चाहिए कि दिल्ली की निजी कम्पनियों को अतिरिक्त बिजली देने की मेहरबानी किस फार्मूले के तहत की जा रही है। उन्होंने कहा कि बिजली इंजीनियर यह सवाल वर्षों से उठाते रहे हैं, अब जब बिजली आवंटन की नीति पर सवाल उठा है तो ज़रूरी है कि नई नीति बनने तक दिल्ली की अतिरिक्त बिजली उ प्र को दी जाये। उन्होंने कहा कि दिल्ली की निजी कम्पनियाँ यह बिजली संकट के समय उ प्र सहित अन्य प्रांतों को काफी महंगी दरों पर बेचती हैं जो नियम विरुद्ध है, यह सवाल भी प्रदेश सरकार को उठाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कोई प्रदेश केवल केंद्र के भरोसे अपनी बिजली की ज़रूरत पूरी नहीं कर सकता। बिजली राज्य का विषय है और राज्य सरकार को निजी क्षेत्र पर अतिनिर्भरता की गलत ऊर्जा नीति में परिवर्तन कर विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ज़रुरत की लगभग 80 प्रतिशत बिजली उत्पादन क्षमता स्टेट सेक्टर व सेन्ट्रल सेक्टर में रखनी चाहिए। इससे सरकार का बिजली उत्पादन पर नियंत्रण रहेगा साथ ही प्रदेश को सस्ती बिजली मिलेगी। ध्यान रहे कि प्रदेश में रिलायंस के रोज़ा प्लांट और बजाज के पावर प्लांट से क्रमशः 6.06 रु एवं 7.75 रु प्रति यूनिट पर बिजली मिल रही है जो प्रदेश के सरकारी बिजली घरों की तुलना में दोगुनी और ढाई गुनी महंगी है | बिजली अभियन्ताओं ने यह सवाल भी उठाया कि रिलायन्स के सासन पावर प्लांट से पूरी बिजली न मिलने का मामला भी प्रदेश के मुख्यमंत्री को उठाना चाहिए क्योंकि करार के अनुसार इस प्लांट से उ प्र को मात्र रु 1.21 प्रति यूनिट की दर पर बिजली मिलनी है और बिजली दरें बढ़वाने में लगी रिलायंस जानबूझकर सासन प्लांट को पूरी क्षमता पर नहीं चला रहा है।
अभियन्ता पदाधिकारियों ने कहा अभी भी समय है कि प्रदेश सरकार निजी घरानों पर अतिनिर्भरता की गलत ऊर्जा नीति में तत्काल परिवर्तन करे, निजी घरानों के साथ किये गए बिजली उत्पादन घर लगाने के सभी एम ओ यू निरस्त किये जाएँ, विद्युत उत्पादन निगम को यह सभी बिजली परियोजनाएं सौंपी जाएँ एवं ओबरा,पनकी तथा हरदुआगंज में 660-660 मेगावाट क्षमता की नयी बिजली परियोजनाएं स्वीकृत कर युद्ध स्तर पर कार्य प्रारम्भ किया जाये, बिजली चोरी रोकने हेतु कठोर कदम उठाये जाएँ और सबसे बड़ी बात बिजली को सियासत के बजाय विकास का बुनियादी आधार मानकर दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति से प्रदेश की बिजली व्यवस्था का कायाकल्प करने हेतु सशक्त कदम उठाये जाएँ तो उ प्र बिजली के मामले में आत्मनिर्भर बन सकेगा और केंद्र के भरोसे प्रदेश की जनता को नहीं रहना पड़ेगा।