सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक'

दिल्ली में हवा गरम है

चुनावी बाजार नरम है

मतों के बैंकर बैठे हैं

गिरवी रखना जुरुम है.!!

राजनीति का धरम है

जनता में जागरण है

नेता जी बिके मण्डी में

मतों का जागरण है!!

समस्यायें सुलझाना ना

मुझको अब उलझाना ना

आगामी चुनाव में मिलेंगे

यह मतदाता अनजाना ना!!

दिल्ली में चले गुलाल है

दुश्मन से भी प्यार है

मतदाता से बड़ा दुलार है

क्या द्वार खड़ा चुनाव है?

गरम हवा पर शरद का दबाव है

राजनीति की जहाँ बयार है

पीटकर जो ढाल दे जो सांचे में

गरम तवे का कबसे इन्तजार है .

सुरेशचन्द्र शुक्ल 'शरद आलोक', लेखक जाने-माने प्रवासी भारतीय साहित्यकार हैं।