अंजू शर्मा

कविता और विचार के प्रचार प्रसार के लिए प्रतिबद्ध संस्था 'लिखावट' की ओर से दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज के परिसर में "कैम्पस में कविता" कार्यक्रम के अंतर्गत आज कविता-पाठ का आयोजन किया गया | छात्रों के बीच कविता की बेहतर समझ बनाने में यह कार्यक्रम काफी मददगार साबित होता रहा है| लिखावट और मिथिलेश श्रीवास्तव जी के ऐसे अथक प्रयासों का यह एक सार्थक परिणाम है! इस कार्यक्रम का उद्देश्य है छात्रों और साहित्य में एक प्रत्यक्ष संवाद स्थापित करना और छात्रों द्वारा कविता और कविता से जुडी तमाम तरह की जिज्ञासाओं का एक उत्तर खोजने के अनुक्रम में यह कार्यक्रम एक सार्थक और नवीनतम पहल माना जा रहा है! छात्र इस कार्यक्रम के लिए बहुत ही उत्सुक थे वहीँ कॉलेज के प्रध्यापकों ने भी इसके लिए बहुत ही उत्साह का परिचय दिया!

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि विष्णु नागर जी ने की| देशबंधु कॉलेज के प्रिंसिपल श्री टांक ने छात्रों और साहित्य के प्रत्यक्ष साक्षात्कार के रूप में आयोजित इस कार्यक्रम में आये सभी कवियों का स्वागत किया | विष्णु नागर जी ने 'मैं बहुत बड़ा उल्लू हूँ',' दृष्टिदोष, ' सरवटे बस स्टैंड',' गदहा','सिस्टम ' सरीखी व्यंग्भरी कविताएँ सुनाकर छात्रों का दिल जीत लिया| उनकी कवितायेँ व्यवस्था, सरकारी दफ्तरों, मानवीय व्यवहार पर बड़े ही गहन चिंतन का परिणाम प्रतीत हुई जिसकी शानदार परिणिति काव्य में हुई तो मन को छू गयी! कविता दृष्टिदोष में एक रंगीले किन्तु वृद्ध व्यक्ति का चित्रण किया और अन्य कविताओं में भी व्यंग्य अपनी पराकाष्ठा पर था! पूरे सभागार में चारों और सभी हंसने पर मजबूर हो गए, यहाँ तक कि धीर-गंभीर प्राध्यापकों के चेहरों पर भी बरबस ही मुस्कान खेल गयी! छात्रों की तालियाँ थम ही नहीं रही थी और वे विशेष अनुरोध पर कवितायेँ सुनाते रहे!

मिथिलेश श्रीवास्तव जी ने 'पुतले पर उतरता हमारा गुस्सा', 'इश्वर', 'मेरे प्यार के किस्से सुनने वाला यहाँ भी कोई नहीं था', 'हम में से हर एक का एक स्थायी पता है' कविताएँ सुनाई जो छात्रों में चर्चा का विषय बनीं| मिथिलेश जी की कवितायों में आम आदमी के जीवन को अपने नजरिये से देखने का एक सार्थक प्रयास निहित था! उनकी कविताओं में सहज शब्दों का प्रयोग और सुंदर प्रस्तुति ने सभी को विभोर कर दिया!

वहीँ राजधानी महाविद्यालय के प्राध्यापक महेंद्र सिंह बेनीवाल जी ने दलित चेतना की कुछ कविताएँ मसलन 'न जाने कब','शब्द', और 'पेड़' सुनाई| उनकी कवितों में दलित चेतना मुखर हुई और सदियों से दबी हुई संवेदनाओं ने मानो शब्दों का जामा पहन लिया! सभी को चिंतन पर विवश करती ये कवितायेँ बहुत पसंद आयीं!

अंजू शर्मा ने अपनी चार कवितायेँ 'लक्ष्मण रेखा', 'शिखर पुरुष', 'विलुप्त प्रजाति', और 'कामवालियां' श्रोताओं से साझा की! कविता "कामवालियां' जहाँ घर में काम करने वाली अंशकालिक घरेलु नौकरानी का काम करने वाली महिलाओं के जीवन पर आधारित थी, वहीँ अन्य तीन कवितायेँ स्त्री-विमर्श पर आधारित थी! ये कवितायेँ बहुत सराही गयीं और स्त्री-चेतना पर आधारित इन कविताओं की वर्तमान और भविष्य में जरूरत पर चर्चा भी हुई!

देशबंधु कॉलेज के प्राध्यापक मनोज कुमार सिंह जी ने 'न कहते हुए','जनता का आदमी', 'दुनिया का दादा भारत होगा' और 'पद्मिनी नायिकाएँ" सुनायीं | उनकी सहज अभिव्यक्ति व्यंग का पुट लिए हुए थी, मनोज जी की कवितायेँ श्रोताओं में सहज संप्रेषित हुई और छात्रों ने जोरदार तालियों से उनका उत्साहवर्धन किया!

किरोड़ीमल कॉलेज में प्राध्यापक बलि सिंह जी ने 'मेरा फायदा क्या','किसी को कोई', और 'कश्मीर - कुछ दृश्य' नाम की कविताएँ पढ़ी | उनकी पहली कविता में जहाँ व्यंग्य निहित था, दूसरी कविता परिपक्व प्रेम पर आधारित थी और तीसरी कविता में कश्मीर राज्य के कुछ महोहरी दृश्यों और अपने प्रश्नों को विषयवस्तु बनाया गया था! सभी कवितायेँ बहुत ही सुंदर थी और सभी को पसंद आई!

इस प्रकार इस कार्यक्रम में दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, सामाजिक कुरीतियाँ और व्यंग्य आदि सभी विषयों को छूने वाली कवितायेँ पढ़ी गयीं, जिन्हें श्रोताओं ने बहुत सराहा| छात्रों और प्राध्यापकों का उत्साह कविओं के लिए एक अनुभव एक विशिष्ट अनुभव था! श्रोताओं ने न केवल सभी कविताओं को धैर्यपूर्वक सुना अपितु इसके पश्चात कविताओं के सन्दर्भ में श्री विष्णु नगर, मिथिलेश श्रीवास्तव और अंजू शर्मा से उनकी रचनाओ की बाबत चर्चा में भी हिस्सा लिया! और इन लोगों ने छात्रों की जिज्ञासा का समुचित उत्तर देकर समाधान भी किया! मिथिलेश जी ने जहाँ रचनाधर्मिता पर सवाल का उत्तर दिया, वहीँ अंजू शर्मा ने स्त्री-विमर्श पर अपनी कविता 'लक्ष्मणरेखा' पर पौराणिक और वर्तमान परिस्थितियों में समानता और संदर्भ पर छात्रों के प्रश्नों हेतु चर्चा की! विष्णु नगर जी ने इतिहास के प्राध्यापक श्री पी.के. चौधरी जी के एक प्रश्न का उत्तर दिया और कविता की जरूरत और स्वरुप पर अपने विचार प्रकट किये! वहीँ एक छात्र और छात्रा के सवाल पर उन्होंने अपनी कविताओं में निहित व्यंग्य पर अपने विचारों और सोच से सभी को अवगत कराया!

यहाँ हैरत में डालने वाली बात यह रही कि छात्रों की उपस्थिति और उनकी भागेदारी किसी मायने में कम नहीं थी! उन्होंने बहुत ही धैर्य से सभी कविताओं को सुना! जब बैठने के लिए जगह कम पड़ गयी तब भी वे खड़े होकर तल्लीनता से काव्य-पाठ का आनंद लेते रहे! बहुत से छात्रों ने न केवल इस कार्यक्रम में सुनाई जा रही कविताओं के नोट्स लिए अपितु उनसे जुड़े अपने प्रश्नों को भी जाहिर किया और कविताओं पर अपनी पसंदगी जाहिर करते रहे! नयी पीढ़ी का ये उत्साह एक शुभ संकेत माना जाना चाहिए और इसके लिए देशबंधु कॉलेज के प्राचार्य, प्राध्यापकों और छात्रो की प्रशंसा की जानी चाहिए! फेसबुक से जुड़े मेरे कई मित्रों ने भी यहाँ उपस्थिति दर्ज करायी, सुश्री शोभा मिश्रा ने कार्यक्रम के सभी सुंदर फोटोग्राफ्स लिए और इसे यादगार बना दिया! मित्र सीमान्त सोहल भी यहाँ आये थे!

इस प्रकार कविता, कवियों और छात्रो के इस सुंदर समागम का समापन किया गया, इस सन्देश के साथ कि यह आयोजन मंजिल नहीं अपितु मील का एक पत्थर है उस रास्ते का जिसकी मंजिल है कविता और रचनाधर्मिता की विश्वविध्यालय के छात्रों में दूरी को ना केवल कम करना अपितु उन्हें भी इसके लिए उत्साहित करना ताकि भविष्य में कोई भी कविता और साहित्य की विलुप्तता पर कोई चिंता न जाहिर कर सके!