दीमापुर : साम्प्रदायिक ताकतों की शह पर केसरिया उन्माद का आतंक
दीमापुर : साम्प्रदायिक ताकतों की शह पर केसरिया उन्माद का आतंक
दीमापुर - मुद्दा अगर बलात्कार होता तो यह आन्दोलन देशव्यापी होता।
दीमापुर -मालूम होना चाहिए वे कौन लोग हैं, जिन्होंने हत्या में साम्प्रदायिक राजनीति का सफल प्रयोग करने की योजना को अंजाम दिया।
गुलरेज़ ने बताया एक ख़ास विचारधारा का प्रभुत्व राजनीति में होने के बाद से केसरिया कौम के ज़हरीले रंग दीमापुर की हवा में किस तरह फैले। किस तरह असम, नागालैंड के बीच साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की साजिश रची गई और बलात्कार के आरोपी सैयद शरीफ खान की हत्या की गई। यह हत्या किसी जनाक्रोश का नतीजा हरगिज़ नहीं थी, बल्कि सोची समझी रणनीति का हिस्सा था। आप सोच रहे होंगे कि तनाव पैदा करके किसको लाभ होगा? और क्या इस तनाव को पैदा करने के लिए बलात्कार की घटना को सबसे बढ़िया अवसर की तरह देखा जाना चाहिए? क्या आप इस बात को देख पा रहे हैं कि मौके का फायदा उठाने में एक ख़ास तरह के राजनीतिक समुदाय ने पहल नहीं की। बलात्कार के खिलाफ नगा समुदाय के आन्दोलन को बकायदा साम्प्रदायिक राजनीति के लिए इस्तेमाल किया गया।
आपको क्या लगता है। हकीकत में क्या हुआ होगा? हिंसा और अराजकता के रास्ते पर चलकर किसी अपराध और अपराधी को सबक सिखाया जा सकता है? क्या जनाक्रोश का सही इस्तेमाल इस तरह किया जाना चाहिए? आप देखें कि इससे हासिल क्या होगा? दो कौम के बीच लड़ाई की जमीन तैयार की गई। उसे ख़ास विचार से लैस करके उर्वरक बनाया गया। बदला लेने के बीज बोये। किस तरह से आरोपी के खिलाफ बदला लेने को तरजीह दी गई। ऐसा नहीं है कि इसके पहले कभी भी नागालैंड और दीमापुर क्षेत्र में बलात्कार नहीं हुए। मुद्दा अगर बलात्कार होता तो यह आन्दोलन देशव्यापी होता। केवल छात्रों का विरोध और जनसमुदाय का आक्रोश भर बनकर न उभरता। देश के हर हिस्से में रोजाना बलात्कार हो रहे हैं मगर आम नागरिकों को न तो कोई विरोध करने की जमीन मिल रही है। न ही लोग अपने आक्रोश को सड़को पर रोज़ ब रोज़ लाने में सक्षम हैं।
बलात्कार के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलन और एक साझा मुहिम की सख्त जरूरत है, ताकि बलात्कार जैसी घटनाएँ न हों। मगर ऐसा मंजर हर बलात्कार के बाद क्यों नहीं होता? यह सवाल बहुत हद तक उस दिशा में सोचने के लिए मजबूर करता है कि जिस मुल्क में 16 दिसम्बर की बर्बर घटना के बाद जनाक्रोश से उपजा देशव्यापी आन्दोलन हुआ हो। तब भी आन्दोलन का लक्ष्य बलात्कारियों को सार्वजनिक जगह पर ह्त्या करने के लिए प्रेरित नहीं करता। फिर दीमापुर में ऐसा क्या हुआ? जिस ‘सैयद’ आरोपी पर कुछ दिन पहले बलात्कार का केस दर्ज हुआ। बलात्कार हुआ या नहीं इस पर जांच चल रही थी। हत्या के समय तक इसे साबित नहीं किया जा सका। हत्या के बाद जो रिपोर्ट आई उसमें बलात्कार न होने की पुष्टि की गई। बड़ी आसानी से आरोप साबित होने तक हत्या हिंसा और साम्प्रदायिकता को रोका जा सकता था। मगर ऐसा हुआ नहीं। हुआ यह कि हत्या का सार्वजनिक हिंसक आयोजन किया गया। यह बलात्कार के खिलाफ उत्सव था या किसी एक समुदाय का आक्रोश। याकि बहुसंख्यकों की भीड़ का उत्तेजक प्रहार या क्या था?
सैयद अहमद खान की हत्या में यह बात साफतौर पर छिपी हुई है कि आन्दोलन को जन भावना से लैस दिखाते हुए इसमें अराजक और हिंसक तत्व जबरन घुसाए गये। एक और बात, यह घटना इस बात की तरफ भी साफ़ इशारा है कि जनांदोलनों को बिना किसी ठोस नेतृत्व के भविष्य में सड़कों में न उतरने दिया जाय। यानी इसका इस्तेमाल राजनीतिक दखल के बगैर संभव ही न हो। जिन आंदोलनों को राजनीतिक संरक्षण मिले वही कामयाब हो सकें। मतलब यह कि जनता के मुद्दों पर कोई सामाजिक संस्था या कार्यकर्ता चाहकर भी आन्दोलन को भविष्य में खड़ा ही न कर सके।
हमें हर घटना-परिघटना में जनता के साथ हुए अन्याय और शोषण के लिए भविष्य में राजनीतिक संरक्षण का सहारा लेना पड़े। और भी बहुत सारे मायने इस बात के हो सकते हैं। जैसे कि हो सकता है आगे आने वाले समय में यह भी तय हो कि आन्दोलन में जनता के मुद्दे और जनाक्रोश से प्रभावित भीड़ का कितना दखल हो या कि राजनीतिक हस्तक्षेप किस हद तक जरूरी है? यदि जनाक्रोश इतना अधिक उत्तेजक, अराजक, हिंसक हो जाय कि वह खुद में ही अपराधी भावना का पूरक बन जाए तो फिर हर घटना जो समाज में आमतौर पर रोज़ हो रही है उसके खिलाफ आन्दोलन के लिए कई तरह की अड़चनों का भी सामना करने के लिए तैयार रहना होगा। आन्दोलन के लिए इजाजत लेने में प्रशासन के कोप को भी किसी न किसी रूप में झेलना होगा।
यानी भविष्य में होने वाली घटनाओं के खिलाफ शीर्ष नेतृत्व को पूरी तरह जिम्मेदारी लेनी होगी। तभी किसी जन-आन्दोलन को कानूनी मान्यता मिलेगी। इस तरह की तमाम बाध्यतायें लागू होगी। और कुछ भी हिंसात्मक होने की संभावना या उसके ख्याल से ही सड़कों पर उमड़े जनाक्रोश को पूरी तरह गैरकानूनी ठहराया जाएगा। हर तरह से भविष्य में होने वाले जन-आक्रोश से उपजे आन्दोलन को चौकन्ना रहना होगा। इस तरह बहुत हद तक साफ़ है कि दीमापुर की हत्या और योजना के पीछे जनाक्रोश या आन्दोलन नहीं था बल्कि हत्यारों ने भीड़ के बीच घुसकर उपद्रव पैदा करने की कोशिश की। साम्प्रदायिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार में लगे हुए लोग हालात बिगाड़ने की हद तक गये। दंगा भड़काने की भरसक कोशिश हुई। इसकी अनेक वजहें हो सकती हैं।
आप देखिये जब भीड़ जेल के बाहर आ पहुंची, तो जाहिर है यह भीड़ आम रास्ते से ही होकर ही गुजरी होगी। फिर किस वजह से प्रशासन को इसकी खबर होकर भी नहीं थी। यदि खबर लग चुकी थी तो भीड़ को रोकने के लिए क्या इंतजामात किये गये? अगर सब कुछ देखकर भी प्रशासन ने आँखें मूंदे रखीं, तो जाहिर है कोई बड़ा मकसद था और ताकतवर राजनीतिक लोग इसके पीछे काम कर रहे थे। हत्या हो जाने के बाद क्यों प्रशासन हरकत में आया। सारे शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया। हर सन्देश पर पाबंदी लगी। हत्या जेल से तकरीबन कुछ किलोमीटर तक आरोपी को घसीटकर ले जाने के बाद सरेआम सार्वजनिक स्थल में की गई। पूरे इलाके में दहशत का माहौल तैयार हो सके, इसके लिए प्रशासन और आला अफसरों ने पूरा सहयोग किया। अपने पेशे और नैतिकता को जोखिम में डाला। अपराध के खिलाफ कदम उठाने की बजाय अपराध को बढ़ावा दिया। हत्यारों का हर तरीके से साथ दिया। हर तरह के खतरे और कठिन परिस्थितियों को पैदा होने दिया। नतीजा क्या हुआ? एक बेगुनाह की हत्या और आला अधिकारियों का मात्र निलम्बन।
माना कि जिन अधिकारियों को घटना के समय दोषी पाया गया, उनका निलम्बन कर पूरी घटना की जांच का आदेश दिया गया। बजाय इसके क्या यह नहीं होना चाहिए कि जिन अधिकारियों ने कानून को ताक पर रख दिया, उनके खिलाफ भी हत्या की चार्जशीट दाखिल हो। उन पर हत्या में शामिल होने का मुकदमा चलाया जाय। हत्या किन कारणों से हुई? घटना के समय में हुए उपद्रव और हत्या के सच का पता नहीं लगाया जा सकता।
यह पता लगना जरूरी है कि घटना हो जाने तक पुलिस अधिकारी किसके इशारे पर खामोश रहे। हमें जानना होगा कि यह आदेश कहाँ आया।... और ये किस मानसिकता के लोग हैं, जिन्हें हत्या और दंगे में अटूट विश्वास व दिलचस्पी है। अगर वे राजनीतिक लोग हैं तो उन्हें हत्या से क्या फायदा हो सकता है?
ऐसा नहीं है कि हत्या भीड़ और जनाक्रोश की त्वरित प्रतिक्रिया का हिस्सा रही हो, क्योंकि जनता का आक्रोश तो कई दिनों से आंदोलित अवस्था में पीड़ित के लिए न्याय की मांग को लेकर जारी था। मांग थी आरोपी को सज़ा जल्द से जल्द दी जाय। इस मांग में कोई बुराई नहीं है। साम्प्रदायिक मानसिकता भी इसमें कहीं शामिल नहीं दिखती। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि घटना में यह मांग हत्या तक जा पहुंची? जबकि प्रशासन आरोपी के खिलाफ सख्त था। जिसके चलते आरोपी जेल में था।
यहाँ यह देखना महत्वपूर्ण है कि प्रशासन पर आम नागरिक इतना दबाव नहीं बना सकता कि कार्रवाई और सज़ा तुरत हो जाय। और सज़ा के लिए जरूरी कानूनी पड़ताल भी न की जाए। बिना किसी न्यायिक जांच के सज़ा किस आधार पर दी जा सकती है?। सवाल यह भी है कि निष्क्रिय बने रहने का हुक्म कौन दे सकता है? भीड़ जेल में किसकी इजाज़त से घुसी? उसे रोकने का कोई प्रबंध क्यों नहीं किया गया? भीड़ में घुसे हत्यारों को आरोपी की पहचान भी कराई गई। यह सब कुछ कैसे मुमकिन हुआ? न्याय-व्यवस्था को नज़रंदाज़ करके आरोपी को जेल से घसीटते हुए बाहर तक लाने दिया गया। क्या कोई भीड़ कभी इस तरह अपराधी को सज़ा देने के लिए जेल में घुस सकती है? यकीनन इस मामले में हत्या करने के लिए जेल के अधिकारियों ने हत्यारों का सहयोग किया। हर नागरिक को यह मालूम होना चाहिए वे कौन लोग हैं, जिन्होंने हत्या में साम्प्रदायिक राजनीति का सफल प्रयोग करने की योजना को अंजाम दिया।
दूसरी बात, जब उस इलाके से होते हुए पूरे राज्य में हालत बेकाबू हो चुके थे, तब एक मुख्यमंत्री की क्या जिम्मेदारी बनती है? अगर आपको सन 2002 की घटना याद हो, जहाँ सरेआम आगजनी उपद्रव और नरसंहार हुआ। यह घटना गुजरात में हुई जिसमें साम्प्रदायिक दंगे की रणभूमि तैयार की गई थी, जिस तरह राज्य का आरोपी मुख्यमंत्री देश का प्रधानमन्त्री चुना गया, उससे स्पष्ट है कि कहीं न कहीं बड़े पैमाने पर दंगे के लिए साझा शीर्ष नेतृत्व की रणनीति भी दंगे के सापेक्ष काम कर रही थी। इस घटना की जिम्मेदारी तत्कालीन मुख्यमंत्री ने नहीं ली। और जनता के बीच एक घातक साजिश रची गई। इस तरह का माहौल लगातार बनाया गया कि जनसंहार के बाद मुख्यमंत्री कर ही क्या सकता है? मुख्यमंत्री ने यह तक कहा कि सीमा से सटे राज्यों से पुलिस फ़ोर्स मांगी गई थी। मगर कोई सहयोग नहीं मिला। अन्य राज्यों में भी इस नरसंहार की प्रतिक्रिया में छिटपुट घटनाएँ देखने को मिली थीं। गुजरात में अब तक अल्पसंख्यक समुदाय इस हादसे से उबर नहीं सका है। जबकि वहीं पर बहुसंख्यक ताकतवर और समर्थ तबका हर क्षेत्र में अपना रूतबा और हैसियत बढ़ाता नजर आ रहा है। ।
आतंकवादियों ने अब तक जो भी हत्याएं की हैं उसमें यही हुआ है कि बाज़ार और सार्वजनिक जगहों में भीड़ पर जानलेवा विस्फोटक हमले हुए हैं, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गये। इसके विपरीत राजनीतिक तरीके से की जाने वाली हत्याओं में हत्यारे बेहद शातिर और क्रूर होते हैं। ऐसे हत्यारे किसी एक आदमी की सार्वजनिक हत्या के लिए भीड़ का सहारा लेते हैं। भीड़ के बीचोबीच घुसकर चंद राजनीतिक कार्यकर्ता लक्ष्य पूर्ति के लिए आम आदमी को जान से मार देते हैं। इस तरह की हत्याओं में अधिकतर होता यह है कि प्रशासन उन्हें घटनास्थल पर पूरा समर्थन देता है। आतंकवादी हत्या के बाद अपनी पहचान के संकेत हत्या की जगह पर छोड़ देते हैं। मगर राजनीतिक हत्यारे बड़ी कुशलता से सारा इल्जाम भीड़ के सर मढ़ने का माहौल बनाते हैं और खुद हत्या से साफ़ बचकर निकल जाते हैं।
..... जारी ...


