दुर्भाग्यपूर्ण और लज्जास्पद ऐतिहासिक घटनाओं पर भी पन्त प्रधान ही गर्व कर सकते हैं
दुर्भाग्यपूर्ण और लज्जास्पद ऐतिहासिक घटनाओं पर भी पन्त प्रधान ही गर्व कर सकते हैं
दुर्भाग्यपूर्ण और लज्जास्पद ऐतिहासिक घटनाओं पर भी आप गर्व कर सकते हैं, बशर्ते आपकी सोच सकारात्मकता की हद-बेहद को लाँघ चुकी हो.
पन्त प्रधान ने फिलिपिन्स में भाषण देते हुए इतिहास की एक ऐसी ही दुर्भाग्यपूर्ण घटना का सकारात्मक और मनभावन विश्लेषण करके उसे गर्व का विषय बना दिया.
उनका कहना था कि "इतिहास में एक भी घटना ऐसी नहीं जिसमें भारत ने किसी के साथ बुरा काम किया हो. पहले और दूसरे विश्व के दौरान हमारी कोई इलाकाई महत्वाकांक्षा नहीं थी, फिर भी हमारे देश के डेढ़ लाख से ज्यादा सैनिकों ने जान गवाई. कोई भी भारतीय गर्व से कह सकता है कि हमने विश्व के लिए योगदान किया और विश्व से कुछ नहीं लिया."
क्या ही सकारात्मक सोच है!
लेकिन सवाल यह है कि पहले और दूसरे विश्वयुद्ध में दरअसल हुआ क्या था?
भारत उस दौर में अंग्रेजों का गुलाम था. अंग्रेज ही भारत के शासक थे. उनकी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए मरना हमारे देश के सैनिकों की मजबूरी थी. अंग्रेजों की महत्वाकांक्षा दूसरे खेमे के युद्धरत देशों से अपने उपनिवेशों की हिफाजत करना और उन पर अपना कब्ज़ा बरकरार रखना था.
अपने साम्राज्यवादी मंसूबे के लिए अंग्रेजों ने हमारे देश के डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को विश्वयुद्ध में झोंककर उनको तोप का चारा बना दिया था. यह किसके लिए गर्व का विषय हो सकता है?
मैंने अपनी सकारात्मक सोच को खींच-तान के पन्त प्रधान की इस नायाब सोच के स्तर तक लाने की भरपूर कोशिश की. नहीं ला पाया. इतिहास के प्रति उनकी यह सोच हद-बेहद से आगे टप चुकी है. वहाँ तक पहुँचने के लिए किसी भी मतिमन्द को अजपा जाप करना होगा. कबीर ने कहा था-
हद में चले सो मानव, बेहद चले सो साध।
हद बेहद दोनों टपे, ताकी बात अगाध ॥
(दिगंबरजी की फेसबुक टिप्पणी)
नोट – संदर्भ – मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को फिलीपींस की राजधानी मनीला में भारतीय प्रवासियों से मुलाकात की. जहां उन्होंने सभी भारतीयों को संबोधित करते हुए कहा,
“जब मैं दुनिया के विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों से मिलता हूं तो यह बताता हूं कि प्रथम या द्वितीय विश्व युद्ध में न हमें जमीन चाहिए थी न ही हमें किसी देश पर कब्जा करना था, सिर्फ शांति के लिए डेढ़ लाख हिन्दुस्तानियों ने शहादत दे दी थी. हम लोग दुनिया को देने वाले लोग हैं, न लेने नहीं और छीनने वाले तो कतई नहीं.”


